शिक्षा और संस्कृति – विस्तृत प्रश्न-उत्तर (कक्षा 10, बिहार बोर्ड)
प्रश्न 1: महान शिक्षा किसे कहते हैं?
उत्तर:
महान शिक्षा वह है जो अहिंसा, प्रेम और आत्मा की समझ सिखाए। यह केवल अक्षर ज्ञान या लेखन-लिखाई तक सीमित नहीं है। बच्चों से मुलाकात साधारण पढ़ाई से पहले होनी चाहिए ताकि वे आत्मा की शक्ति, प्रेम और नैतिक मूल्यों को समझ सकें। शिक्षा का उद्देश्य यह होना चाहिए कि बच्चा जीवन-संग्राम में सत्य और असत्य, प्रेम और घृणा, अहिंसा और हिंसा को सही ढंग से समझकर जीत सके। यही वास्तविक और महान शिक्षा है।
प्रश्न 2: इंद्रियों और बुद्धि का सही उपयोग क्यों जरूरी है?
उत्तर:
इंद्रियों का बुद्धि से सही और संतुलित उपयोग करना आवश्यक है क्योंकि यह बुद्धि के सर्वांगीण विकास का सबसे उत्तम तरीका है। केवल मस्तिष्क या शरीर का विकास आध्यात्मिक शक्ति के बिना अधूरा रहता है। इसलिए शिक्षा में हृदय और आत्मा की शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब बच्चे के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास का ध्यान रखा जाएगा, तभी उसकी बुद्धि का सही विकास संभव होगा।
प्रश्न 3: गांधीजी के अनुसार शिक्षा का अभिप्राय
उत्तर:
गांधीजी के अनुसार, शिक्षा का मुख्य उद्देश्य शरीर, बुद्धि और आत्मा के श्रेष्ठ गुणों का विकास है। साक्षरता केवल शिक्षा का माध्यम है, उसका अंत या मूल उद्देश्य नहीं। बच्चों को शिक्षा के साथ उपयोगी दस्तकारी सिखाना चाहिए, ताकि वे सीखते समय उत्पादन और समाजसेवा में भी योगदान दे सकें। अधर्म या केवल ज्ञान का संचय शिक्षा नहीं है।
प्रश्न 4: मस्तिष्क और आत्मा का सर्वोत्तम विकास कैसे संभव है?
उत्तर:
मस्तिष्क और आत्मा का सर्वोत्तम विकास व्यावहारिक और वैज्ञानिक शिक्षा के माध्यम से संभव है। हर शिक्षा गतिविधि का कारण समझाना आवश्यक है। प्रारंभिक शिक्षा में बच्चों को सफाई, तंदुरुस्ती, भोजनशास्त्र, कार्य-संयम और माता-पिता की सहायता से सीखने के मूल सिद्धांत सिखाने चाहिए। संगीत और शारीरिक व्यायाम के माध्यम से शारीरिक और मानसिक तालीम भी दी जानी चाहिए। इस प्रकार शिक्षा संपूर्ण और सर्वांगीण बनती है।
प्रश्न 5: ग्रामोद्योगों द्वारा सामाजिक क्रांति
उत्तर:
गांधीजी के अनुसार, कटाई, धुनाई और अन्य ग्रामोद्योग केवल काम का साधन नहीं, बल्कि शांत और नैतिक सामाजिक क्रांति के माध्यम हैं। इससे गाँव और शहर के स्वास्थ्य, नैतिकता और आपसी सहयोग को बढ़ावा मिलता है। इससे ग्रामीण जीवन विकसित होता है और गरीब और अमीर के बीच प्राकृतिक भेदभाव कम होता है। ग्रामोद्योग समाज में स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का मार्ग खोलते हैं।
प्रश्न 6: गांधीजी के अनुसार शिक्षा का ध्येय
उत्तर:
गांधीजी के अनुसार, शिक्षा का मुख्य उद्देश्य चरित्र-निर्माण है। शिक्षा से मनुष्य में साहस, बल, सदाचार और नैतिकता का विकास होना चाहिए। ऐसा व्यक्ति समाज में सही निर्णय लेने और संगठन का कार्य निभाने में सक्षम होता है।
प्रश्न 7: देशी माध्यम में ज्ञान प्राप्ति
उत्तर:
गांधीजी मानते थे कि मातृभाषा में ज्ञान प्राप्त करना सबसे आसान और प्रभावी है। अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाओं के माध्यम से ज्ञान हासिल करना कठिन है। अपनी भाषा में शिक्षा से ज्ञान ग्रहण करना और उसे व्यावहारिक जीवन में लागू करना सरल हो जाता है।
प्रश्न 8: अपनी संस्कृति की महत्ता
उत्तर:
किसी भी अन्य संस्कृति को समझने और ग्रहण करने से पहले अपनी संस्कृति का ज्ञान और मूल्य समझना आवश्यक है। केवल जब हम अपनी संस्कृति को पूरी तरह से जान लेते हैं और अपनाते हैं, तभी हम दूसरी संस्कृति से कुछ सीख सकते हैं। इससे चरित्र निर्माण और जीवन में संतुलन संभव होता है।
प्रश्न 9: मातृभाषा और संस्कृति का आधार
उत्तर:
गांधीजी के अनुसार, मातृभाषा और संस्कृति शिक्षा का मूल आधार हैं। अपनी भाषा और संस्कृति के माध्यम से हम ज्ञान, नैतिकता और सामाजिक मूल्य सीखते हैं। दूसरी संस्कृति की अच्छी चीज़ों को अपनाने से पहले अपनी संस्कृति को समझना जरूरी है। इस दृष्टि से शिक्षा समग्र और प्रभावी बनती है।
प्रश्न 10: सामंजस्य और भारतीय जीवन
उत्तर:
गांधीजी मानते थे कि भिन्न-भिन्न संस्कृति और परंपराओं का सामंजस्य भारत के लिए सर्वश्रेष्ठ है। यह सामंजस्य भारतीय जीवन में संतुलन, सहयोग और विविधता में एकता लाता है। प्रत्येक संस्कृति का स्थान सुरक्षित रहना चाहिए और शिक्षा में इसे शामिल किया जाना चाहिए।
प्रश्न 11: रोजगार और दस्तकारी
उत्तर:
गांधीजी के अनुसार, सच्ची शिक्षा वही है जो आत्मनिर्भर और सहकारी जीवन सिखाए। दस्तकारी और कारीगरों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा बच्चों को स्वावलंबी बनाती है। इससे गाँवों में बेरोजगारी कम होती है, आर्थिक विकास बढ़ता है और हस्तकला और ग्राम उद्योग के प्रति रुचि पैदा होती है। इस प्रकार शिक्षा शारीरिक, मानसिक, आत्मिक और सामाजिक रूप से सम्पूर्ण बनती है।
निष्कर्ष
गांधीजी की शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं है। यह सत्य, अहिंसा, स्वावलंबन, चरित्र निर्माण, सामाजिक सहयोग और आत्मा की उन्नति सिखाती है। शिक्षा और संस्कृति का उद्देश्य मानव को सम्पूर्ण, नैतिक, सक्षम और समाजोपयोगी बनाना है। ग्रामोद्योग, मातृभाषा और अपनी संस्कृति का पालन शिक्षा की नींव हैं। इस प्रकार गांधीजी का दृष्टिकोण शिक्षा को व्यावहारिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समग्र बनाता है।