तिरिछ (उदय प्रकाश) — सम्पूर्ण, समझने लायक नोट्स
- त्वरित सार (Quick Summary)
- विधा: कहानी (आत्मकथात्मक शैली, जादुई यथार्थवाद की छाया)
- लेखक: उदय प्रकाश (ज. 1 जनवरी 1952; सीतापुर, अनूपपुर, म.प्र.)
- एक पंक्ति में: कहानी लेखक के पिता की त्रासदी, लेखक के डरावने सपनों (तिरिछ), और शहर की अमानवीय हिंसा के टकराव से निकलते उस सच की है जिसमें “आधुनिकता” का चेहरा डरावना हो उठता है।
- केंद्र: तिरिछ का सपना = आतंक/मृत्यु का प्रतीक; पिता = ग्रामीण सादगी/संवेदना; शहर = संस्थागत क्रूरता/भीड़ की हिंसा।
- टोन: करुण–आक्रोश–चेतावनी; बेहद संवेदनशील, चुभने वाला यथार्थ।
- थीम/विचार
- शहर बनाम गाँव: शहर का अजनबीपन, संवेदनहीनता; गाँव की सादगी, भरोसा, पर असहायता।
- तिरिछ का प्रतीक: मौत/आतंक/धारणाएँ/दुर्जनता—जिससे आंख मिलते ही वह पीछा नहीं छोड़ता; जड़ीभूत अंध-विश्वासों का रूपक।
- संस्थागत हिंसा: बैंक–पुलिस–कॉलोनी–रेस्टोरेंट—हर जगह रामस्वारथ प्रसाद (लेखक के पिता) को पागल/अपराधी समझकर अपमानित/पीटा जाना।
- सपनों का जादुई यथार्थ: सपना बार-बार उसी स्थल–नाले–कीकर–चट्टान में ले जाता है; अंत में लेखक को उस जगह तिरिछ की लाश मिलना—सपना और यथार्थ का संगम।
- आवाज़ = अस्त्र: डर/दुःस्वप्न में लेखक की अपनी आवाज ही उसे बचाती है (“मेरी आवाज ही मेरा अस्त्र है” तरह का मोटिफ)।
- सत्ता–व्यवस्था की क्रूरता: अग्निहोत्री (कैशियर), थापा (चौकीदार), राघवेंद्र (एसएचओ), कॉलोनी के लड़के—सब मिलकर भीड़/सिस्टम की हिंसा बन जाते हैं।
- प्रतीक/बिंब
- तिरिछ: विषैला जीव—लोकविश्वास/आतंक/मृत्यु/दुर्जनता/आधुनिकता का काला चेहरा।
- नाला–कीकर–छत्ते–भूरी चट्टान: सपनों के सटीक भूगोल का यथार्थ में प्रमाण; जादुई यथार्थवाद।
- “धतूरा का काढ़ा”: अंधविश्वास; मेडिकल/वैज्ञानिक समझ की कमी के कारण त्रासदी।
- “आवाज़”: अपने होने की अंतिम रक्षा; सपने से बाहर आने का संकेत।
- चरित्र-चित्रण (संक्षेप)
- लेखक के पिता (रामस्वारथ प्रसाद): अंतर्मुखी, मितभाषी, ग्रामीण संवेदना; शहर से आतंकित; सहज पर असुरक्षित; संवेदनशील, पर दृढ़/आक्रामक नहीं—इसीलिए बार-बार हिंसा के शिकार।
- लेखक (कथावाचक): संवेदनशील, आत्ममंथनकारी; दुःस्वप्नों में डूबा; अंततः सपने–यथार्थ की पहेली सुलझाने वाला।
- थापा (नेपाली चौकीदार): “कर्तव्यनिष्ठ” पर विवेकहीन; छोटी सत्ता का हिंसक चेहरा।
- अग्निहोत्री (कैशियर): हर अजनबी में डर/लुटेरा देखने की वृत्ति—भय का संस्थागत रूप।
- असिस्टेंट मैनेजर मेहता: थोड़ा विवेकशील, पर सिस्टम का हिस्सा—हिंसा को रोक नहीं पाता।
- एसएचओ राघवेंद्र: निजी मूड/भोजन पर टिका “न्याय”; गैर-जिम्मेदार, संवेदनहीन।
- कॉलोनी/रेस्टोरेंट के लोग: भीड़-हिंसा का अमानवीय चेहरा।
- गणेशवा मोची: अंतिम क्षणों में एकमात्र मानवीयता—पहचान/सहानुभूति।
- कथासार (जैसा पेपर में लिखना हो)
- बाबूजी (लेखक के पिता) को शाम की टहल में “तिरिछ” काट लेता है। लोक-इलाज/धतूरे का काढ़ा पिलाया जाता है। अगले दिन कचहरी के काम से शहर जाते हैं—और शहर के हर पड़ाव पर उन्हें पागल/चोर/उचक्का समझकर बुरी तरह पीटा जाता है—स्टेट बैंक, थाने, इतवारी/नेशनल रेस्टोरेंट। अंततः सिविल लाइन्स में मोचियों की गुमटी में मरनासन्न गिरते हैं—गणेशवा मोची पहचान लेता है—वहीं मृत्यु। लेखक बार-बार तिरिछ के सपने से कांपता है; अंततः वही जगह/चट्टान/कीकर/नाला यथार्थ में मिलते हैं—और तिरिछ की लाश भी। अब सपने बंद—क्योंकि लेखक का भ्रम टूटा: “यह सब सपना है; आँख खुलते ही ठीक हो जाएगा”—पर असल दंश यह कि शहर की अमानवीयता सपने से भी भयानक है।
- हाई-लेवल विश्लेषण (2–3 लाइनों में)
- “तिरिछ” व्यक्तिगत दुःस्वप्न नहीं, सामूहिक सामाजिक दुःस्वप्न है—जहाँ संस्थाएं/भीड़ मिलकर एक व्यक्ति को मार देती हैं। जादुई यथार्थवाद के जरिए कहानी धारणाओं/आधुनिक हिंसा—दोनों की एक साथ बखिया उधेड़ती है।
अति-लघु उत्तरीय (15)
तिरिछ क्या है?—छिपकली/स्किंक-प्रजाति का विषैला जीव (लोकविश्वास अनुसार)
तिरिछ का प्रतीक?—आतंक/मौत/दुर्जनता/अंधविश्वास
कहानी की शैली?—आत्मकथात्मक, जादुई यथार्थवाद
लेखक?—उदय प्रकाश
जन्म-वर्ष/तिथि?—1 जनवरी 1952
जन्म-स्थान?—सीतापुर, अनूपपुर (म.प्र.)
पिता–माता के नाम—प्रेमकुमार सिंह; गंगादेवी
कविता-संग्रह—सुनो कारीगर, अबूतर-कबूतर, रात में हारमोनियम
कहानी-संग्रह—दरियाई घोड़ा, तिरिछ, पीली छतरी वाली लड़की, मोहनदास…
संपादन/पत्रकारिता—दिनमान; संडेमेल (सहायक संपादक)
अध्यापन—जे.एन.यू. भारतीय भाषा विभाग
“अमेद्य” का अर्थ—जिसे भेदा न जा सके
कहानी में “आवाज़” का बिंब—डर/दुःस्वप्न से बाहर लाने वाला अस्त्र
“धतूरा का काढ़ा”—अंधविश्वास/घातक लोक-इलाज
मोची गणेशवा—मानवीयता/पहचान का अंतिम आश्रय
लघु उत्तरीय (8)
लेखक के पिता का चरित्र (2–3 वाक्य)
— अंतर्मुखी, मितभाषी, ग्रामीण सहजता; शहर में अजनबी/असहाय; उनके जरिए सिस्टम की हिंसा/अमानवीयता उजागर।तिरिछ किसका प्रतीक है?
— मौत/आतंक/दुर्जनता/लोक-धारणाएँ—जब उससे “आंख मिलती” है, वह पीछा नहीं छोड़ता—जैसे अंधविश्वास/हिंसा।“तिरिछ से आंख न मिलाना”—आशय?
— दुर्जन/हिंसक शक्तियों से उलझना न—सावधानी और दूरी ही सुरक्षा का उपाय।“परिचित आंखें”—क्या?
— तिरिछ सपने में इतनी आत्मीय नजरों से देखता कि लेखक आकर्षित हो जाता—खतरे का छलावरण।लेखक को जंगल “परिचित” क्यों?
— सपनों में वही नाला–कीकर–चट्टान—यथार्थ में जाकर सब मिलता है—सपना–यथार्थ का संगम।“आवाज़” मेरा अस्त्र—क्यों?
— डर/सांस अटकने पर अपनी आवाज ही उसे जगा लेती—अस्तित्व की अंतिम सुरक्षा।शहर का चरित्र?
— संवेदनहीन/हिंसक; संस्थागत क्रूरता; भीड़-मानस; अजनबीपन—जिसने अंततः जान ले ली।लेखक को अब तिरिछ का सपना क्यों नहीं आता?
— भ्रम टूट चुका—वह समझ चुका: “यह सब सपना है”—सच जान लेने पर भय का प्रभाव घटता है।दीर्घ उत्तरीय (5) — बिंदुवार
तिरिछ का प्रतीकात्मक अर्थ
- लोक-विश्वास का विष + आधुनिक हिंसा का विष; आंख मिलते ही पीछा—यानी दुर्जनता/आतंक का चिपकना; सपने में दीखना = अवचेतन का डर।
- शहर की अमानवीयता: घटनाक्रम
- बैंक–थाना–रेस्टोरेंट–कॉलोनी—हर जगह पिटाई/अपमान; पहचान/संवाद का अभाव; भीड़-हिंसा का चरम।
- जादुई यथार्थवाद का प्रयोग
- सपने के स्थल/तत्व यथार्थ में मिलना; तिरिछ की लाश; कहानी की विश्वसनीयता + रहस्य एक साथ।
- लेखक का बचाव—“आवाज़”
- डर में आवाज निकलती है; मन की रक्षा-प्रणाली; आत्म-संरक्षण का अंतिम उपकरण।
- अंधविश्वास और त्रासदी
- धतूरा का काढ़ा; चौबीस घंटे बाद “करिश्मा”; असल मौत सिस्टम/भीड़ की—विश्वास हिंसा को ढँक देता है—यही आलोचना।
MCQ (20) — उत्तर अंत में
उदय प्रकाश का जन्म—
A) 1/1/1952 B) 5/1/1950 C) 2/3/1940 D) 5/1/1955कविता-संग्रह—
A) मोहनदास, तिरिछ B) सुनो कारीगर, अबूतर-कबूतर C) ईश्वर की आंख D) दिनमानतिरिछ—
A) कुत्ता B) साँप C) छिपकली/स्किंक-प्रजाति का जीव D) बिच्छू“तिरिछ” कहानी—
A) निबंध B) एकांकी C) कहानी D) संस्मरण“तिरिछ” किसका पर्याय बना?
A) प्रेम B) आतंक C) उत्सव D) हास्यपिता की पहचान—
A) शराबी B) अपराधी C) एक्स-हेडमास्टर/ग्राम प्रधान D) ड्राइवरबैंक का चौकीदार—
A) गणेशवा B) थापा C) अग्निहोत्री D) मेहता“आवाज़” का मोटिफ—
A) मज़ाक B) बचाव C) गुस्सा D) रोग“धतूरा”—
A) औषधि B) प्राणघातक नशा (लोक-इलाज में) C) भोजन D) पेय“ठीक 24 घंटे बाद”—
A) चमत्कारिक बचाव B) मृत्यु C) पति-पत्नी मिलन D) कुछ नहींजे.एन.यू. में—
A) लेखन B) अध्यापन C) शोध D) नौकरीसंपादन विभाग—
A) दिनमान B) हंस C) कथादेश D) नया ज्ञानोदय“पीली छतरी वाली लड़की”—
A) नाटक B) कहानी C) कविता D) उपन्यास“ईश्वर की आंख”—
A) कविता B) निबंध/आलोचना C) कहानी D) फिल्म“मोहनदास”—
A) उपन्यासिका/कहानी B) कविता C) संस्मरण D) नाटकगणेशवा मोची—
A) पहचान नहीं पाया B) पहचान कर लाया C) गलत आरोप लगाया D) पुलिस बुला दीशहर में पिता को समझा गया—
A) वैज्ञानिक B) संत C) पागल/चोर D) नेताकहानी का टोन—
A) हास्य B) व्यंग्य C) करुण–आक्रोश D) रोमांसलेखक को जंगल “परिचित”—
A) घूम चुका था B) सपने में देखता रहा C) नकाशा देखा था D) किताब पढ़ी थी“अमेद्य”—
A) जिसे भेदा जा सके B) जिसे भेदा न जा सके C) जिसे देखा न जा सके D) जिसे लिखा न जा सके
उत्तर: 1-A, 2-B, 3-C, 4-C, 5-B, 6-C, 7-B, 8-B, 9-B, 10-B, 11-B, 12-A, 13-B, 14-B, 15-A, 16-B, 17-C, 18-C, 19-B, 20-Bरिक्त-स्थान (12)
उदय प्रकाश का जन्म … (सीतापुर, अनूपपुर, म.प्र.) — हुआ।
जन्म-तिथि — 1 जनवरी … — 1952 ई.
पिता/माता — … सिंह; … देवी — प्रेमकुमार; गंगा
‘तिरिछ’ के लेखक — … — उदय प्रकाश
तिरिछ—छिपकली-प्रजाति का विषैला … — जीव
“तिरिछ” का प्रतीक — … — आतंक/मौत
पिता का परिचय — रामस्वारथ प्रसाद, एक्स स्कूल … — हेडमास्टर
बैंक कैशियर — … — अग्निहोत्री
चौकीदार — … — थापा
एसएचओ — … … सिंह — राघवेंद्र प्रताप
“आवाज़”—मेरा … — अस्त्र
मोची — … — गणेशवा
सत्य/असत्य (10)
तिरिछ का काटना एक वैज्ञानिक तथ्य है—कोई अंधविश्वास नहीं। — असत्य (लोकविश्वास—कथा में प्रतीकात्मक)
शहर का चरित्र संवेदनशील दिखा है। — असत्य
कहानी में जादुई यथार्थवाद है। — सत्य
लेखक की आवाज उसे भय से बाहर लाती है। — सत्य
पिता को अंततः सभी जगह सहानुभूति मिली। — असत्य
गणेशवा मोची ने पहचानकर सहारा दिया। — सत्य
लेखक को अब तिरिछ का सपना नहीं आता। — सत्य
धतूरा का काढ़ा वैज्ञानिक इलाज है। — असत्य
“तिरिछ” में भीड़-हिंसा का चेहरा उभरता है। — सत्य
उदय प्रकाश का कविता-संग्रह—सुनो कारीगर। — सत्य
मिलान (10)
A) रामस्वारथ प्रसाद — (वयोवृद्ध, एक्स-हेडमास्टर)
B) अग्निहोत्री — (कैशियर—भयग्रस्त)
C) थापा — (नेपाली चौकीदार—हिंसक कर्तव्य)
D) मेहता — (असिस्टेंट मैनेजर—थोड़ा विवेकशील)
E) राघवेंद्र — (एसएचओ—मूड-आधारित “न्याय”)
F) गणेशवा — (मोची—पहचान/सहानुभूति)
G) धतूरा — (अंधविश्वास/लोक-इलाज)
H) तिरिछ — (आतंक/मौत का प्रतीक)
I) आवाज़ — (बचाव/जगाने वाला अस्त्र)
J) शहर — (भीड़-हिंसा/संवेदनहीनता)भाषा की बात — अभ्यास
समास पहचान
- जन्मजात (तत्पुरुष), भारी-भरकम (द्वंद्व), संवाददाता (तत्पुरुष), बीचो-बीच (द्वंद्व), नीलकंठ (बहुव्रीहि), चौराहा (द्विगु), टेढ़ा-मेढ़ा (द्वंद्व), इधर-उधर (वैकल्पिक द्वंद्व), चुंगीनाका (तत्पुरुष)
- व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ
- थापा, अग्निहोत्री, मेहता, राघवेंद्र प्रताप सिंह, गणेशवा (मोची), रामस्वारथ प्रसाद
- संज्ञा/सर्वनाम (वाक्यों से)
- संज्ञा: नाला, तिरिछ, घंटी, पिताजी, शहर, बैंक
- सर्वनाम: मैं, वह, उसे, हमें, मेरा, उसने
- वाक्य-प्रकृति
- “लेकिन बहुत जल्द हमें वह नाला मिल गया।” — सरल
- “तिरिछ उसमें जल रहा था।” — सरल
- “मेरा अनुमान है कि उस समय पिताजी को बहुत प्यास लगी होगी।” — मिश्र
- “उसने घंटी भी बजा दी।” — सरल
- एग्ज़ाम-हैक्स
- एक लाइन में थीम: “तिरिछ = जादुई यथार्थ से सामाजिक हिंसा का अनावरण”
- उद्धरण: “आवाज़ ही ऐसे मौके पर मेरा सबसे बड़ा अस्त्र है।” और “आंख मिलते ही तिरिछ पीछा नहीं छोड़ता।”
- दीर्घ-उत्तर फार्मूला: प्रस्तावना → प्रतीक/घटनाएँ → सिस्टम/भीड़-हिंसा विश्लेषण → निष्कर्ष (मानवता बनाम आधुनिकता)