श्रम विभाजन और जाति प्रथा – Class 10 Bihar Board
1. लेखक परिचय
-
नाम: डॉ. भीमराव अंबेदकर
-
जन्म: 14 अप्रैल 1891, मध्यप्रदेश, दलित परिवार
-
शिक्षा: न्यूयॉर्क (अमेरिका), लंदन (इंग्लैंड) – संस्कृत, वैदिक साहित्य, इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र
-
प्रमुख योगदान: भारतीय संविधान निर्माता, समाज सुधारक, दलित, महिलाओं और मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्षरत
-
प्रेरक व्यक्ति: बुद्ध, कबीर, ज्योतिबा फूले
-
मुख्य रचनाएँ:
-
द कास्ट्स इन इंडिया
-
द अनटचेबल्स
-
हू आर शूद्राज
-
बुद्धिज्म एंड कम्युनिज्म
-
द राइज एंड फॉल ऑफ द हिन्दू वीमेन
-
एनीहिलेशन ऑफ कास्ट
-
2. पाठ का सारांश
-
जाति प्रथा के कारण समाज में रूढ़िवादिता और लोकतंत्र पर खतरा।
-
आज भी जातिवाद के पोषक मौजूद हैं।
-
तर्क: आधुनिक समाज ‘कार्य-कुशलता’ के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानता है।
-
विडंबना: जाति प्रथा भी श्रम विभाजन का ही रूप है पर इसमें अस्वाभाविक विभाजन और ऊँच-नीच की भावना शामिल है।
मुख्य बिंदु:
-
जाति प्रथा से व्यक्ति स्वतंत्र रूप से पेशा नहीं चुन सकता।
-
माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार पेशा पहले से तय।
-
जीवनभर एक ही पेशे में बँधना – भले ही वह अनुपयुक्त हो।
-
जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का मुख्य कारण।
-
आर्थिक दृष्टि से हानिकारक – स्वाभाविक प्रेरणा और आत्मशक्ति दब जाती है।
-
आदर्श समाज – स्वतंत्रता, समता, भ्रातृत्व पर आधारित।
3. प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1. लेखक किस विडंबना की बात करते हैं?
उत्तर: आधुनिक युग में भी जातिवाद के पोषक मौजूद हैं। विडंबना यह कि आधुनिक समाज श्रम विभाजन की आवश्यकता मानता है, पर जाति प्रथा इस विभाजन को अस्वाभाविक और अनुचित रूप देती है।
प्रश्न 2. जातिवाद के पोषक क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
-
आधुनिक समाज कार्य-कुशलता के लिए श्रम विभाजन आवश्यक मानता है।
-
जाति प्रथा भी श्रम विभाजन का रूप है।
-
माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार पेशा पहले से तय।
-
व्यक्ति परंपरागत पेशा अपनाए, भले भूख से मरे।
-
पारंपरिक पेशे में दक्षता हासिल होती है।
-
इससे सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है।
प्रश्न 3. लेखक की आपत्तियाँ
उत्तर:
-
श्रम विभाजन व्यक्ति की स्वेच्छा पर नहीं।
-
व्यक्तिगत रुचि का कोई स्थान नहीं।
-
आर्थिक दृष्टि से हानिकारक।
-
प्रेरणा और आत्मशक्ति दब जाती है।
प्रश्न 4. जाति श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप क्यों नहीं?
उत्तर: मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है; बच्चों को अनिच्छा से पैतृक पेशा अपनाना पड़ता है।
प्रश्न 5. जातिप्रथा और बेरोजगारी
उत्तर: व्यक्ति जीवनभर एक ही पेशे में बंधा रहता है। तकनीकी बदलाव और उद्योगों में परिवर्तन के बावजूद पेशा बदलने की अनुमति नहीं।
प्रश्न 6. आज के उद्योगों में बड़ी समस्या
उत्तर: गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या – जाति प्रथा। पेशा चुनने की स्वतंत्रता नहीं, व्यक्तिगत रुचि दबती है।
प्रश्न 7. जाति प्रथा के हानिकारक पहलू
उत्तर:
-
अस्वाभाविक श्रमिक विभाजन।
-
ऊँच-नीच की भावना।
-
अनिच्छा से पेशा अपनाना।
-
आर्थिक विकास में बाधक।
प्रश्न 8. सच्चे लोकतंत्र की विशेषताएँ
उत्तर:
-
स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व।
-
समाज में गतिशीलता, वांछित परिवर्तन की सुविधा।
-
बहुविध हितों में भागीदारी।
-
अबाध संपर्क के साधन और अवसर।
-
दूध-पानी की तरह भाईचारा।
4. शब्दार्थ
-
विडंबना: उपहास
-
पोषक: समर्थक
-
पूर्वनिर्धारण: पहले से तय
-
अकस्मात: अचानक
-
प्रतिकूल: विपरीत
-
स्वेच्छा: अपनी इच्छा
-
उत्पीड़न: पीड़ा देना
-
संचारित: प्रवाहित
-
बहुविध: अनेक प्रकार
-
प्रत्यक्ष: सामने
-
भ्रातृत्व: भाईचारा
-
वांछित: आकांक्षित
5. महत्वपूर्ण वाक्य
-
सरल: पेशा परिवर्तन की अनुमति नहीं।
-
संयुक्त: मैं जातियों के विरुद्ध हूँ, फिर मेरी दृष्टि में आदर्श समाज क्या है?
-
मिश्र: विडंबना की बात है कि इस युग में भी जातिवाद के पोषक मौजूद हैं।
6. वस्तुनिष्ठ प्रश्न – उत्तर
-
श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा के लेखक – भीमराव अम्बेदकर
-
भारतीय संविधान निर्माण – भीमराव अंबेदकर
-
सभ्य समाज की आवश्यकता – श्रम-विभाजन
-
डॉ. अम्बेदकर की रचनाएँ – सभी
-
प्रेरक व्यक्ति – सभी (बुद्ध, कबीर, ज्योतिबा फूले)
7. रिक्त स्थान
-
इस युग में भी जातिवाद के पोषकों की कमी नहीं है।
-
जाति-प्रथा मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है।
-
भारत में जाति-प्रथा बेरोजगारी का कारण है।
-
भाई-चारे का दूसरा नाम लोकतंत्र है।
8. अतिलघु उत्तर
-
श्रम-विभाजन आज के सभ्य समाज की आवश्यकता।
-
जाति-प्रथा स्वाभाविक विभाजन नहीं – रुचि पर आधारित नहीं।
-
आदर्श समाज – स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व पर आधारित।
-
जन्म – दलित परिवार।
-
“बुद्धिज्म एंड कम्युनिज्म” – भीमराव अम्बेदकर।
श्रम विभाजन और जाति प्रथा – Long Answer Notes
1. लेखक किस विडंबना की बात करते हैं?
उत्तर:
लेखक डॉ. भीमराव अंबेदकर बताते हैं कि आज के वैज्ञानिक युग में भी जातिवाद के पोषक मौजूद हैं। यह विडंबना इसलिए है क्योंकि आधुनिक सभ्य समाज में श्रम विभाजन को कार्य-कुशलता के लिए आवश्यक माना जाता है।
जाति प्रथा भी श्रम विभाजन का एक रूप है, लेकिन इसमें अस्वाभाविक विभाजन और सामाजिक ऊँच-नीच की भावना शामिल होती है। जबकि किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन में यह ऊँच-नीच नहीं होती। इस प्रकार, आधुनिक समाज की आवश्यकता और जाति प्रथा की वास्तविकता में विरोधाभास ही विडंबना है।
2. जातिवाद के पक्ष में तर्क
उत्तर:
जातिवाद के पोषक निम्नलिखित तर्क देते हैं:
-
आधुनिक समाज कार्य-कुशलता के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानता है।
-
जाति प्रथा भी श्रम विभाजन का ही रूप है।
-
व्यक्ति का पेशा माता-पिता के सामाजिक स्तर और जाति के अनुसार पहले से निर्धारित किया जाता है।
-
हिन्दू धर्म व्यक्ति को पेशा बदलने की अनुमति नहीं देता।
-
पारंपरिक पेशे में व्यक्ति दक्ष बनता है और कार्य सफलतापूर्वक संपन्न करता है।
-
इससे समाज में व्यवस्था बनी रहती है और अराजकता नहीं फैलती।
3. लेखक की आपत्तियाँ
उत्तर:
लेखक जातिवाद के तर्कों के प्रति कई आपत्तियाँ उठाते हैं:
-
जाति प्रथा स्वतंत्रता का हनन करती है। व्यक्ति अपनी इच्छा और रुचि से पेशा नहीं चुन सकता।
-
यह आर्थिक दृष्टि से हानिकारक है क्योंकि मनुष्य अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाता।
-
व्यक्ति की स्वाभाविक प्रेरणा, रुचि और आत्मशक्ति दब जाती है।
-
यह अस्वाभाविक नियमों में जकड़कर निष्क्रिय बनाती है।
-
सामाजिक ऊँच-नीच की भावना पैदा करती है, जिससे भाईचारा और समानता प्रभावित होती है।
4. जाति श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप क्यों नहीं?
उत्तर:
भारतीय जाति प्रथा में श्रमिकों का विभाजन मनुष्य की रुचि और क्षमता पर आधारित नहीं है। बच्चों को अनिच्छा से पैतृक पेशा अपनाना पड़ता है। जबकि किसी सभ्य समाज में श्रमिक अपने स्वेच्छा और क्षमता के अनुसार कार्य चुनता है। इस प्रकार जाति प्रथा को स्वाभाविक श्रम विभाजन नहीं माना जा सकता।
5. जातिप्रथा और बेरोजगारी
उत्तर:
जातिप्रथा व्यक्ति को जीवनभर एक ही पेशे में बाँध देती है।
-
भले ही वह पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त हो।
-
तकनीकी और उद्योग में बदलाव होने पर भी पेशा बदलने की अनुमति नहीं।
-
इससे भारतीय समाज में बेरोजगारी और असंतोष बढ़ता है।
6. उद्योगों में बड़ी समस्या
उत्तर:
लेखक के अनुसार आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या जाति प्रथा है।
-
जाति प्रथा व्यक्ति को पेशा चुनने की स्वतंत्रता नहीं देती।
-
व्यक्ति मजबूरी में कार्य करता है, जिससे कुशलता विकसित नहीं होती।
-
आर्थिक दृष्टि से यह प्रथा हानिकारक है क्योंकि यह स्वाभाविक प्रेरणा और आत्मशक्ति को दबा देती है।
7. जाति प्रथा के हानिकारक पहलू
उत्तर:
-
अस्वाभाविक श्रमिक विभाजन करता है।
-
समाज में ऊँच-नीच की भावना पैदा करता है।
-
व्यक्ति को अनिच्छा से पेशा अपनाना पड़ता है।
-
व्यक्ति की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं होता।
-
आर्थिक और सामाजिक विकास में बाधक।
-
मनुष्य को टालू काम करने और कम करने के लिए प्रेरित करता है।
8. आदर्श समाज और लोकतंत्र
उत्तर:
-
आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृत्व पर आधारित होना चाहिए।
-
समाज में इतनी गतिशीलता हो कि वांछित परिवर्तन एक छोर से दूसरे छोर तक संचरित हो सके।
-
बहुविध हितों में सभी का भाग होना चाहिए और उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए।
-
सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के साधन उपलब्ध होने चाहिए।
-
भ्रातृत्व का स्वरूप दूध-पानी के मिश्रण जैसा होना चाहिए – सभी विविधताओं के बावजूद एकजुट।
-
लोकतंत्र केवल शासन की पद्धति नहीं, बल्कि सामूहिक जीवनचर्या और अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है।
9. लेखक की दृष्टि में आदर्श समाज
उत्तर:
-
स्वतंत्र, समता और भ्रातृत्व पर आधारित।
-
जाति प्रथा से ऊपर उठकर सभी को बराबरी और समान अवसर मिले।
-
समाज में सहयोग, श्रद्धा और सम्मान का भाव बना रहे।
-
व्यक्ति अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार पेशा चुन सके।
-
भाईचारा मजबूत हो और किसी भी तरह की सामाजिक असमानता न हो।
