कड़बक — (पद्मावत के प्रारम्भ/उपसंहार से दो छंद)
त्वरित सार
- कवि: मलिक मुहम्मद जायसी (1492–1548), निर्गुण संत परंपरा की प्रेममार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि।
- ग्रंथ: पद्मावत (जायसी की अमर कीर्ति का आधार)
- कड़बक-1 (आरंभिक): कवि-स्वभाव/स्व-छवि—रूप से अधिक गुण का महत्त्व; एक नेत्र होना भी बाधा नहीं—गुण/मेधा से सब सुगंधित होता है।
- कड़बक-2 (उपसंहार): कथा–सृष्टि और कीर्ति—रत्नसेन/पद्मावती/राघव/अलाउद्दीन भले न रहें, पर सुगंध-सी कीर्ति शेष रहती है; कवि चाहता है कि पाठक उसे “दो बोल” याद रखें।
मुख्य भाव/थीम
- रूप बनाम गुण: चाँद पर कलंक होते हुए भी उसकी शीतल प्रभा; घरिया में तपे बिना काँच = सोना नहीं; डाभ (डाँभ) के बिना आम में सुगंध नहीं—प्रतीकों से “गुण-प्रधानता” का प्रतिपादन।
- आत्मविश्वास/स्वाभिमान: एक नेत्र होना कवि-मेधा/निर्मल हृदय पर भारी नहीं—“एक नैन जस दरपन, तेहि निर्मल भाउ…”
- कीर्ति–सुगंध: “धनि सो पुरुख जस कीरति जासू / फूल मरै पै मरै न बासू”—यश/कीर्ति सुगंध की तरह अमर।
- कथा–सत्य: कवि मानता है कि कथा के पात्र प्रतीकात्मक हैं—पर कथा/यश/कीर्ति अमर है—यही उसकी “निशानी” है।
कड़बक-1: संकेतों का मतलब (कलंक–काँच–कंचन)
- चाँद पर कलंक—फिर भी उजियारा: थोड़ा दोष भी महापुरुष की कीर्ति के आगे गौण।
- डाभ (कोयली) के बिना आम में सुगंध नहीं: संघर्ष/आवश्यक कसौटी/अनुभव से ही गुण/सुगंध प्रकट।
- समुद्र का खारापन—असीमता का बोध: “दोष” के साथ भी महत्ता संभव।
- सुमेरु—शिव-त्रिशूल-स्पर्श से कंचन होना: सत्संग/सदाचार/कृपा से रूपांतरण।
- घरिया में तपकर काँच से कंचन: तप/साधना/अनुभव से व्यक्तित्व का निखार।
- दर्पण: कवि का निर्मल मन—जिसमें जैसी छवि वैसा प्रतिबिंब; “रूपवान” भी कवि-मुख निहारें (गुण की महिमा)।
कड़बक-2: कथा/कीर्ति/स्मृति
- “मुहम्मद यहि कबि जोरि सुनावा”—कवि ने “रक्त-लेई” से कथा जोड़ी, “नयनों के जल” से भिगोई—अर्थात् प्राण-पुण्य/हृदय-रस से सृजन।
- “कहाँ सो रतनसेन… कहाँ पद्मावती…”—जन-नायक/नायिका/दुर्जन—सब समय में विलीन; पर कथा/यश शेष—जैसे फूल झड़ता, पर सुगंध रह जाती।
- कवि की लोकैषणा (सकारात्मक): “जो यह पढ़े कहानी—हम सँवरै दुइ बोल”—यानी स्मृति के दो मधुर शब्द ही मेरी पूँजी।
अलंकृत भाषा/छवि
- उपमा: चाँद, दर्पण, समुद्र, सुमेरु, घरिया, आम/डाभ…
- व्यतिरेक: दोष–गुण की तुलना (दोष होते हुए भी गुण का प्रभाव)
- रूपक/उत्प्रेक्षा: रक्त-लेई, नयन-जल—काव्य-सृजन का जीवन-रस
- रस–गुण: शांत–माधुर्य; भाव-स्पष्टता, सहजता, लोक-प्रतीक
बहुविकल्पीय (MCQ — 15)
- जायसी के पिता का नाम — (क) शेख ममरेज (ख) शेख परवेज (ग) शेख मुहम्मद (घ) इक़बाल
उत्तर: (क) - जायसी का जन्म-वर्ष — (क) 1453 (ख) 1445 (ग) 1492 (घ) कोई नहीं
उत्तर: (ग) - ‘कड़बक’ — (क) छप्पय (ख) कड़बक (ग) कवित्त (घ) पद
उत्तर: (ख) - जन्म-स्थान — (क) बनारस (ख) दिल्ली (ग) अजमेर (घ) अमेठी (जायस)
उत्तर: (घ) - जायसी थे — (क) धनवान (ख) बलवान (ग) फक़ीर (घ) विद्वान
उत्तर: (ग) - जायसी किस धारा के कवि? — (क) सगुण-रामभक्ति (ख) निर्गुण–ज्ञानमार्गी/प्रेममार्गी (ग) रीति (घ) छायावाद
उत्तर: (ख) - जायसी की अमर कीर्ति का आधार — (क) अखरावट (ख) आखिरी कलाम (ग) पद्मावत (घ) रतनसेन
उत्तर: (ग) - “धनि सो पुरुख जस कीरति जासू…” का भाव — (क) यश नष्ट (ख) यश अमर (ग) यश व्यर्थ (घ) यश छल
उत्तर: (ख) - “घरिया” का अर्थ — (क) मुहल्ला (ख) सोना गलाने का पात्र (ग) दरांती (घ) गाड़ी
उत्तर: (ख) - “काँच”—यहाँ संकेत — (क) कच्चा सोना (ख) शीशा/काँच (अशुद्ध) (ग) कंस
उत्तर: (ख) [काँच = कच्चा/अशुद्ध धातु] - “डाभ” का आशय — (क) बौर/मंजरी का काँटेदार भाग (ख) पत्ता (ग) छाल
उत्तर: (क) - “दर्पन/दर्पण” कवि-हृदय का प्रतीक—क्योंकि — (क) भारी (ख) स्वच्छ–निर्मल (ग) कठोर
उत्तर: (ख) - “जायसी ग्रंथावली” किसने प्रकाशित की? — (क) शुक्ल–माताप्रसाद गुप्त आदि (ख) हजारीप्रसाद द्विवेदी (ग) रामधारी सिंह
उत्तर: (क) - कवि की “निशानी” से आशय — (क) माला (ख) पद्मावत/काव्य (ग) सिंहासन
उत्तर: (ख) - जायसी: बचपन से — (क) कठोर भाषी (ख) मृदुभाषी/मनस्वी (ग) असंस्कृत
उत्तर: (ख)
रिक्त-स्थान (10)
- मलिक मुहम्मद जायसी … शाखा के कवि हैं — प्रेम/ज्ञान-मार्गी निर्गुण
- ‘कड़बक’ — पद्मावत के … छंद हैं — आरंभ/उपसंहार
- कवि बचपन से … और स्वभावतः … थे — मृदुभाषी; मनस्वी
- “जायसी ग्रंथावली” … विद्वानों ने प्रकाशित की — आचार्य शुक्ल, डॉ. माताप्रसाद गुप्त आदि
- किसान होते हुए भी सदा … का जीवन — फकीरी
- जायसी के उज्ज्वल अमर कीर्ति का आधार — पद्मावत
- “फूल मरै पै मरै न …” — बासू (वायु/सुगंध)
- “घरिया” में तपकर … से … बनना — काँच; कंचन
- “डाभ” के बिना … में सुगंध नहीं आती — आम (अंब)
- “एक नैन जस …, तेहि … भाउ” — दर्पन; निर्मल
सही/गलत (True/False — 10)
- जायसी सगुण-रामभक्ति के कवि हैं। — गलत
- ‘कड़बक’ पद्मावत के दो अलग स्थानों से लिए गए हैं। — सही
- कवि रूप-गौरव को गुण से ऊपर मानते हैं। — गलत
- “धनि सो पुरुख…”—कीर्ति की अमरता का सूक्ति-वचन है। — सही
- “घरिया”—सोना गलाने का पात्र है। — सही
- “डाभ” बिना आम में सुगंध आती है। — गलत
- कवि एक नेत्र होने पर संकोच से ग्रस्त हैं। — गलत (स्वाभिमान)
- “रक्त-लेई”—गांठने/जोड़ने का रूपक है। — सही
- पद्मावत—रीतिकाव्य है। — गलत
- कड़बकों का मुख्य रस—शांत। — सही
मिलान (Match — 10)
A) चाँद पर कलंक — (दोष होते हुए भी उजियारा)
B) डाभ — (मंजरी/काँटेदार भाग; सुगंध हेतु आवश्यक)
C) घरिया — (सोना गलाने का पात्र)
D) काँच → कंचन — (तप/साधना से रूपांतरण)
E) सुमेरु/त्रिशूल — (शिव-स्पर्श से कंचन)
F) दर्पण — (कवि-हृदय की निर्मलता)
G) फूल–बास — (शरीर नश्वर, कीर्ति अमर)
H) रत्नसेन–पद्मावती — (कथा-पात्र; यश सुगंध-सा शेष)
I) प्रेम की पीर — (जायसी का कवि-स्वभाव)
J) जायसी — (निर्गुण–प्रेममार्गी—पद्मावत)
व्याख्या (संक्षेप)
- जौं लहि अंबहि डांभ न होई / तौ लहि सुगंध बसाई न सोई
— आम में डाँभ/मंजरी (डाभ) न हो तो सुगंध नहीं—अर्थात् कसौटी/संघर्ष/अनुभव से ही गुण/सुगंध आती है। - धनि सो पुरुख जस कीरति जासू / फूल मरै पै मरै न बासू
— पुष्प झड़ जाए पर सुगंध रहती है; वैसे ही महान का यश/कीर्ति अमर। - मुहम्मद यहि कबि जोरि सुनावा / जोरी लाइ रकत कै लेई
— कवि ने कथा को “रक्त की लेई” से जोड़ा—हृदय-रस/प्राण-पुण्य से रचना; यही उसकी निशानी। - एक नैन जस दरपन औ / तेहि निर्मल भाउ
— एक नेत्र होते हुए भी कवि का मन दर्पण-सा निर्मल—इसलिए रूपवान भी उसके गुण के आगे शीश नवाएँ।
भाषा की बात
- पर्याय (नमूने): नयन—नेत्र/लोचन; आम—अंब/आम्र; चंद्रमा—शशि/चंद; रक्त—रूधिर/लोहित; फूल—पुष्प/सुमन; राजा—नृप/भूप
- अलंकार: उपमा, व्यतिरेक, रूपक/उत्प्रेक्षा, अनुप्रास (आंशिक), प्रतीक-योजना
- रस/गुण: शांत रस; माधुर्य गुण
- संज्ञाएँ (कड़बक-1): नयन, कवि, मुहम्मद, चाँद, समुद्र, सुमेरु, दर्पण…
- सर्वनाम (कड़बक-2): यह, सो, अस, कहाँ, जो, जेई, कोई, जस, कइ…
- मानक रूप (सुधार): त्रिरसूल→त्रिशूल; दरपन→दर्पण; निरमल→निर्मल; रकत→रक्त; कीरति→कीर्ति; “नखत” का मानक—नक्षत्र (ध्यान दें)
एग्ज़ाम-हैक्स
- एक लाइन में: “गुण–प्रधानता, आत्मविश्वास और कीर्ति-सुगंध—यही कड़बकों का मर्म”
- 2 पंक्तियाँ याद रखें: “जौं लहि अंबहि डांभ न होई…”, “धनि सो पुरुख जस कीरति जासू…”
- व्याख्या-टेम्पलेट: प्रसंग → शब्दार्थ → भावार्थ → अलंकार/प्रतीक → निष्कर्ष (गुण–प्रधानता/कीर्ति)