क्विक सम्मरी
- कवि: सूरदास (भक्तिकाल; कृष्ण-भक्ति; ब्रजभाषा)
- पद 1 (जागिए ब्रजराज…): भोर के प्राकृतिक संकेतों से बालक कृष्ण को प्यार से जगाना—वात्सल्य-रस।
- पद 2 (जेंवत श्याम…): नंद की गोद में बैठकर कृष्ण का भोजन—बच्चों जैसे खा-गिरा देना, माता–पिता को खिलाना—बाल-स्वभाव का सजीव चित्र।
MCQ – उत्तर-कुंजी
- 1478 ई. — (क)
- अभिरुचि—पर्यटन — (क)
- भक्ति—कृष्ण भक्ति — (क)
- रचना—पद — (ग)
- गुरु—महाप्रभु वल्लभाचार्य — (क)
- ‘साहित्य लहरी’—सूरदास — (ख)
रिक्त स्थान – उत्तर
- ब्रजराज कुँवर
- रवि प्रकाश
- बछरा
- दधि (दही)
- जेंवत श्याम नंद की कनियाँ
अति-लघु उत्तरीय
- काल—भक्तिकाल
- जन्म—1478 ई., रुमकता (मतान्तर भी हैं)
- भाषा—ब्रजभाषा
- प्रधान रस—वात्सल्य (उप-प्रसंगों में भक्ति/शृंगारानुभूति भी)
लघु उत्तरीय (मॉडल)
- प्रथम पद का रस
— वात्सल्य-रस: यशोदा बालक कृष्ण को भोर की स्थिति (कमल खिलना, पक्षियों का कलरव, गऊओं का रंभाना, चंद्र का मलिन होना, रवि का उदय) बताकर दुलार से जगाती है। - गायें किस ओर दौड़ीं?
— अपने-अपने बछड़ों की ओर दूध पिलाने हेतु; सुबह का संकेत। - प्रथम पद का भावार्थ
— यशोदा: “उठो ब्रजकुमार! कमल खिल गए, कुमुद बंद हो रहे, मुर्ग बाँग दे रहे, वन-पक्षी बोल रहे, गाएँ बछड़ों के पास जा रही हैं; चंद्र फीका, सूर्य प्रकाशित—हे अंबुज-कर-धारी (कमल-हस्त) कृष्ण! प्रात उठो!” - सूर के वात्सल्य-वर्णन की विशेषताएँ
— बाल-स्वभाव का सूक्ष्म और स्वाभाविक अंकन; सहज भाषा, कोमल भाव; बाल-क्रियाएँ—खाना, गिराना, मुँह में लगाना, माता-पिता को खिलाना—सब अत्यंत जीवंत। (शुक्ल/हजारीप्रसाद/भगवानदीन आदि ने सराहा।) - कृष्ण खाते समय क्या-क्या करते हैं?
— नंद की गोद में बैठकर विविध व्यंजन लेते हैं—कुछ खाते, कुछ धरती पर गिरा देते, कुछ नंद को खिलाते; दही–माखन–मिश्री में विशेष रुचि; बाल-सुलभ शरारतें—मनोहर दृश्य।
काव्य-सौन्दर्य (रस–अलंकार–भाषा)
- रस: मुख्यतः वात्सल्य; भक्ति-भाव अंत:सलिला की तरह।
- अलंकार (चयन):
- मानवीकरण/व्यंजना: पक्षियों का पुकारना, कमल–कुमुद से समय-चक्र दिखाना।
- रूपक/उत्प्रेक्षा: “अंबुज-कर-धारी”—कृष्ण का कमल-हस्त।
- अनुप्रास/लयात्मकता: ध्वनियाँ/दोहराव—गान-योग्यता।
- भाषा: ब्रजभाषा; गेय, माधुर्य-लालित्य से युक्त; छंद-गत लय (पदावली की सगुण परंपरा)।
- चित्रण: प्रकृति-चित्र (भोर), गोचारण (गाएँ–बछड़े), गृह-परिसर (भोजन)—सब वात्सल्य में रंगे।
पंक्ति-दर-पंक्ति (की-वाक्य अर्थ)
- “जागिए, ब्रजराज कुँवर”—हे ब्रज के राजकुमार (कृष्ण), उठो।
- “कँवल-कुसुम फूले / कुमुद-वृन्द संकुचित भए”—कमल खिले, कुमुद (रात के फूल) बंद—प्रभात।
- “तमचुर खग-रोर”—अँधेरा मिटा; पक्षियों का कलरव।
- “राँभति गो… बछरा हित धाई”—गाएँ बछड़ों की ओर दौड़ रही हैं।
- “बिधु मलीन, रवि प्रकाश”—चंद्र मंद, सूर्य उजाला; नर-नारी गान; “अंबुज-कर-धारी”—कमल-हस्त कृष्ण, उठो।
- “जेंवत श्याम नंद की कनियाँ”—नंद की गोद में श्याम खा रहे; “कछुक खात, कछु धरनि गिरावत”—कुछ खा रहे, कुछ गिरा रहे।
- “बरी–बरा–बेसन… व्यंजन बिविध”—कई पकवान; “रुचि मानत दधि दोनियाँ”—दही का स्वाद अधिक प्रिय।
- “मिसरी, दधि, माखन… मुख नावत”—मिश्री-दही-मक्खन मुँह में लग रहे—बाल-छवि अनुपमेय।
- “आपुन खात, नंद-मुख नावत”—कृष्ण स्वयं खाएँ, नंद के मुँह में भी डालें।
- “भोजन करि नंद अचमन लीन्हौ / माँगत सूर जुठनियाँ”—नंद कुल्ला करें; सूरदास जूठन माँगते—भक्ति का चरम भाव।
काव्य-सौन्दर्य: चुनी पंक्तियाँ
(क) “कछुक खात, कछु धरनि गिरावत, छवि निरखति नंद-रनियाँ”—बाल-स्वभाव का सजीव अंकन; गेयता/लय; वात्सल्य की तीव्रता।
(ख) “भोजन करि नंद अचमन लीन्हौ, माँगत सूर जुठनियाँ”—भक्ति की अनन्य भावभूमि; कवि का दास्य–प्रेम।
(ग) “आपुन खात, नंद-मुख नावत, सो छबि कहत न बनियाँ”—कृष्ण–नंद के पारस्परिक प्रेम की अनुपमेय छवि—कथ्य से परे रसानुभूति।
भाषा–अभ्यास (टेक्स्ट के अनुरूप)
- विलोम: मलिन–निर्मल; नार–नारायण; संकुचित–विस्तृत; धरणी–आकाश; विधु–रवि
- पर्याय:
- धरनि—धरा/भू/धरती
- रवि—भास्कर/भानु/सूर्य
- अम्बुज—कमल/पंकज/जलज
- कमल—अंबुज/पंकज/सरोज
- मानक रूप:
- धरनी→धरती; गो→गाय; कँवल→कमल; विधु→विधु (चंद्र); स्याम→श्याम; प्रकास→प्रकाश; बनराई→वनराई
- समास–विग्रह:
- नंद–जसोदा—द्वंद्व (नंद और जसोदा)
- ब्रजराज—तत्पुरुष (ब्रज का राज/राजा)
- खग–रोर—तत्पुरुष (खग का रोर/शोर)
- अम्बुज–कर–धारी—बहुव्रीहि (जिसके हाथ में कमल है)
कवि-परिचय (संक्षेप)
- सूरदास (1478–1583): वल्लभाचार्य के शिष्य; अष्टछाप के अग्रणी; ब्रजभाषा के अप्रतिम कृष्ण–भक्ति कवि; प्रमुख ग्रंथ—सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी; वात्सल्य, मुरली-माधुरी, गोपी-उद्धव संवाद—इनका वैशिष्ट्य।
एक्स्ट्रा प्रैक्टिस
- नया MCQ (5)
- सूर की भाषा—A) अवधी B) ब्रज C) खड़ीबोली D) मिश्रित (उत्तर: B)
- प्रथम पद का मुख्य भाव—A) शृंगार B) भयानक C) वात्सल्य D) वीर (उत्तर: C)
- “अंबुज-कर-धारी”—किसके लिए? A) नंद B) यशोदा C) कृष्ण D) बलराम (उत्तर: C)
- “कुमुद-वृंद संकुचित भए”—दर्शाता है—A) रात्रि B) प्रभात C) संध्या D) मध्याह्न (उत्तर: B)
- “दधि दोनियाँ”—किसका रूपक? A) कटोरा B) पत्तल C) मिट्टी की छोटी दोनी D) थाली (उत्तर: C)
- नए रिक्त स्थान (5):
- ________-कुसुम फूले—कँवल/कमल
- ________ खग-रोर सुनहु—तमचुर (अँधेरा हटने पर)
- ________ मलीन, रवि प्रकाश—विधु
- जेंवत ________ नंद की कनियाँ—श्याम
- ________–दही–माखन—मिसरी
- सत्य/असत्य (5):
- प्रथम पद में सांझ का चित्र है। — असत्य
- सूरदास ने बाल-स्वभाव का सूक्ष्म अंकन किया। — सत्य
- “जुठनियाँ” माँगना कवि-भक्ति का संकेत है। — सत्य
- “बछरा हित धाई”—गाएँ बछड़ों से दूर जा रही हैं। — असत्य
- भाषा—ब्रजभाषा, गेय–लयात्मक। — सत्य
एग्ज़ाम टिप्स
- वात्सल्य की पहचान: मातृ/पितृ-स्वर, बालक की सहज हरकतें, घर–आँगन की सहजता।
- चित्र-सूत्र: कमल–कुमुद–भोर; खग–रोर; गऊ–बछड़ा; चंद्र–सूर्य—इन संकेतों से “प्रभात” दिखाइए।
- उद्धरण 1–2 पंक्तियाँ ज़रूर दें; फिर भावार्थ/रस/अलंकार जोड़ें; अंत में भाषा–शैली—ब्रजभाषा/गेयता—का एक वाक्य।