क्विक समरी (Chapter 4: छप्पय)
- कवि: नाभादास (अनुमानित 1570–1600), सगुणोपासक रामभक्त, स्वामी अग्रदास के शिष्य, तुलसीदास के समकालीन।
- ग्रन्थ: भक्तमाल—भक्त-चरित्रों की पुष्पमाला (छप्पयों में), 6 पंक्तियों के गेय पद।
- प्रस्तुति: यहाँ दो छप्पय—एक कबीर पर (निर्गुण-धारा के सिद्धान्तवादी कवि), दूसरा सूरदास पर (कृष्ण-भक्ति/वात्सल्य के अमर गायक)।
- दृष्टि: नाभादास ने “सहृदय आलोचक” की तरह संक्षेप में, पर बहुत सारगर्भित तरीके से दोनों कवियों का काव्य-स्वभाव, सिद्धान्त और विशेषताएँ पकड़ी हैं।
वस्तुनिष्ठ (MCQ) – उत्तर सहित
नाभादास का जन्म (अनुमानित) — (क) 1570 ई.
उत्तर: (क)नाभादास किसके शिष्य थे? — (घ) अग्रदास
उत्तर: (घ)कबीरदास किस शाखा के कवि? — (ग) निर्गुण शाखा
उत्तर: (ग)नाभादास का समाज (प्रचलित मान्यता अनुसार) — (क) दलित वर्ग
उत्तर: (क)नाभादास कैसे संत थे? — (क) विरक्त जीवन जीते हुए
उत्तर: (क)‘भक्तमाल’ किस प्रकार की रचना? — (क) भक्त-चरित्रों की माला
उत्तर: (क)रिक्त-स्थान – उत्तर
नाभादास सगुणोपासक … कवि थे। — रामभक्त
‘संपूर्ण भक्तमाल’ … छन्द में निबद्ध है। — छप्पय
छप्पय 6 पंक्तियों का … पद होता है। — गेय
नाभादास गोस्वामी तुलसीदास के … थे। — समकालीन
नाभादास जी स्वामी रामानंद की शिष्य … में शिक्षित थे। — परंपरा
… विमुख जे धर्म सो सब अधर्म करि गाए। — भगति योग यज्ञ व्रत दान भजन बिनु तुच्छ दिखाए
अति-लघु उत्तरीय
‘भक्तमाल’—किसकी रचना? — नाभादास
नाभादास—किसके समकालीन? — तुलसीदास
नाभादास—किसके शिष्य? — अग्रदास
किसकी कविता सुन कवि शिर हिलाते हैं? — सूरदास की
नाभादास—किस धारा के कवि? — सगुणोपासक रामभक्त
पाठ-आधारित लघु/दीर्घ उत्तर
(अ) कबीर के छप्पय में उलेखित मुख्य विशेषताएँ (क्रमवार)
- कबीर का अन्त:करण भक्ति-रस से सरस; मति अतिगंभीर।
- जाति–पाँति/वर्णाश्रम का खंडन; “मुख देखी नाहीं भनी”—सिद्धान्तवादी वचन।
- भगवद्भक्ति सर्वोपरि—भक्ति-विमुख धर्म = अधर्म।
- सच्चे प्रेम-भजन के बिना तप, योग, यज्ञ, व्रत, दान—सब तुच्छ।
- ‘हिन्दू–तुर्क’ सभी से समभाव; सबके हित की वाणी—पक्षपातरहित।
- षड्दर्शन की रूढ़ियों, पाखंड व सामाजिक विकृतियों का तीखा प्रतिवाद।
(आ) “मुख देखी नाहीं भनी”—अर्थ और कबीर पर अनुप्रयोग
- अर्थ: व्यक्ति का चेहरा/पहचान देखकर ‘मनभावनी’ बात न कहना; सत्य/सिद्धान्त कहना।
- कबीर: जाति–पाँति/धर्म–मजहब से ऊपर उठकर सभी के हित की बात; पाखंड-विरोध; सत्य-उद्घाटन।
(इ) सूर के छप्पय में उलेखित काव्य-विशेषताएँ
- उक्ति–चातुर्य–अनुप्रास–वर्ण-अस्थिति—अतिभारी (समृद्ध शिल्प)।
- काव्य में वचन–प्रेम का निर्वाह आरम्भ से अन्त तक।
- “तुक” का अद्भुत अर्थ-विस्तार; प्रवाहमयी पद-रचना।
- “दिव्य दृष्टि” का प्रतिबिम्ब—जन्म, कर्म, गुण, रूप—सब रसना से प्रकाशित।
- ऐसा कौन कवि जो सूर का कवित्त सुनकर प्रशंसा में शिर न हिलाए!
(ई) अर्थ-व्याख्या
- “सूर कवित्त सुनि कौन कवि, जो नहिं शिरचालन करै।”
भाव: सूर के पदों में ऐसी माधुरी/शक्ति है कि बड़े-बड़े कवि भी प्रशंसापूर्वक सिर हिलाए बिना नहीं रह सकते—काव्य-रसभाव का सार्वजनीन स्वीकार। - “भगति विमुख जे धर्म सो सब अधर्म करि गाए।”
भाव: भक्ति से विमुख, पाखंड/रूढ़ि/रिवाज के नाम पर चलने वाले सारे “धर्म”—अधर्म; प्रभु-भक्ति ही सार।
(उ) “पक्षपात नहीं, वचन सबहि के हित की भाषी”—कबीर का गुण
- समदर्शिता, समभाव, सभी के हित का सिद्धान्त—हिन्दू/मुस्लिम/आर्य/अनार्य के भेदों से ऊपर उठकर “सार” कहना; सत्य-प्रतिपादन में निडर।
(ऊ) कविता में “तुक” का महत्व—छप्पय के सन्दर्भ में
- हिन्दी छन्द में “तुक” (अन्त्य-वर्ण/ध्वनि-साम्य) काव्य का प्राण; गेयता, प्रवाह, स्मरणीयता का आधार;
- छप्पय—छः पंक्तियों का गेय पद; प्रथम चार चरण ‘रोला’ (मात्रिक संयोजन), अंतिम दो ‘उल्लाला’ (आम तौर पर 15+13=28 मात्राएँ) — अतः तुक/लय अनिवार्य।
(ए) “कबीर कानि राखी नहीं”—अर्थ
- कबीर ने “सुन-सुनाकर” रूढ़ियाँ नहीं अपनाईं; षड्दर्शन/वर्णाश्रम की जड़ताओं पर प्रश्नचिन्ह; पाखंड-भंजन; भीतरी अनुभूति-आधारित सत्य।
(ऐ) कबीर—भक्ति का महत्त्व
- कबीर ने निर्गुण भक्ति का सत्य स्वरूप रखा; योग–यज्ञ–व्रत–दान—भक्ति-रस/प्रेम भाव के बिना—व्यर्थ; भक्ति = समन्वय, सत्य, प्रेम, साहस; पाखंड-विरोध।
- छन्द-ज्ञान: “छप्पय” क्या है?
- छप्पय = 6 पंक्तियों का गेय छन्द।
- संरचना (प्रचलित रूप):
- प्रथम 4 पंक्तियाँ—रोला-लय (मात्रिक बंध: 24 मात्राएँ—प्रसिद्ध रूप)
- अंतिम 2 पंक्तियाँ—उल्लाला (अधिक प्रचलन 15+13 = 28 मात्राएँ; सम–विषम चरण-युग्म)
- विशेषता: तुक-योजना सघन; गेयता/लय/आवृत्ति से भावप्रवणता; कथ्य का संक्षिप्त किन्तु मारक प्रस्तुतीकरण।
- भाषा की बात – अभ्यास
(क) विलोम
- तुच्छ–महान, हित–अहित, पक्षपात–तटस्थता/समता, गुण–अवगुण, उक्ति–अनुक्ति
(ख) लिंग-निर्णय (वाक्य सहित)
- वचन (पु.)/स्त्री. — प्रायः “वचन” (पु.) मान्य; उदा. “तुम्हारा वचन अमूल्य है।”
- मुख्य (पु.) — “यह मुख्य पात्र है।”
- यज्ञ (पु.) — “आज यज्ञ है।”
- अर्थ (पु.) — “इस पद का अर्थ सहज है।”
- कवि (पु.) — “सूरदास श्रेष्ठ कवि हैं।”
- बुद्धि (स्त्री.) — “उसकी बुद्धि तीक्ष्ण है।”
(ग) उपसर्ग “वि–” से शब्द
- विमल, विमुक्त, विनाश, विशाल, विहित, विश्वास, विकल्प (नोट: विकल्प में “वि” + “कल्प”)
(घ) अनुप्रास (छप्पय से चुने उदाहरण)
- उक्ति–चोज–अनुप्रास–वर्ण (व–व ध्वनियाँ)
- अर्थ–अद्भुत
- दिवि–दृष्टि
- हृदय–हरि
- कौन–कवि
(ध्यान: छन्द-लालित्य हेतु ध्वन्यात्मक आवृत्ति)
(ङ) पर्याय—“रसना”
- रसना: जीभ, जिह्वा, जुबान, स्वादेन्द्रिय
- कवि-परिचय (संक्षेप)
- नाभादास (अनु. 1570–1600): वैष्णव रामभक्त, स्वामी अग्रदास के शिष्य; विरक्त जीवन; तुलसीदास के समकालीन;
- कृतियाँ: भक्तमाल (मुख्य), अष्टयाम (ब्रज गद्य), रामचरित सम्बन्धी प्रकीर्ण पद।
- विशेषता: सहृदय आलोचक; संक्षेप में सार ग्रहण करने की विलक्षण क्षमता; भाषा में माधुर्य/सरलता।
- अतिरिक्त प्रैक्टिस
(A) 5 नए MCQ
- ‘छप्पय’ में कुल पंक्तियाँ — A) 4 B) 6 C) 8 D) 10
उत्तर: B - नाभादास की दृष्टि—
A) समालोचनात्मक B) मात्र प्रशंसात्मक C) प्रहसन D) सूक्तिपरक
उत्तर: A - “भक्ति-विमुख धर्म”—कबीर ने किसके बराबर माना?
A) धर्म B) अधर्म C) शास्त्र D) तप
उत्तर: B - “प्रतिबिम्बित दिवि दृष्टि”—किसके लिए?
A) तुलसी B) सूर C) नाभा D) कबीर
उत्तर: B - “मुख देखी नाहीं भनी”—किसका कथन-स्वभाव?
A) सूर B) कबीर C) नाभा D) तुलसी
उत्तर: B
(B) 5 नए रिक्त-स्थान
- “उक्ति–चोज–…–वर्ण अस्थिति”—अनुप्रास
- “वचन प्रीति …”—निर्वही
- “जन्म–कर्म–गुण–रूप—सबहि … परकासी”—रसना
- “कबीर … राखी नहीं”—कानि
- “वर्णाश्रम … दर्शनी”—षट्
(C) 5 सत्य/असत्य
- नाभादास सगुणोपासक रामभक्त कवि हैं। — सत्य
- कबीर ने षड्दर्शन को शिरोधार्य किया। — असत्य
- सूरदास के छप्पय में दिव्य-दृष्टि का उल्लेख है। — सत्य
- ‘छप्पय’ में 8 पंक्तियाँ होती हैं। — असत्य
- नाभादास तुलसीदास के समकालीन हैं। — सत्य
एग्ज़ाम टिप्स
- कबीर-छप्पय: भक्ति–विमुख धर्म = अधर्म; प्रेम-भजन के बिना सब तुच्छ; समभाव/निडर वाणी—3–4 बिंदु याद रखो।
- सूर-छप्पय: उक्ति–चातुर्य–अनुप्रास–तुक–प्रवाह, “दिवि दृष्टि”—2–3 सूक्त पंक्तियाँ उद्धृत करो।
- छप्पय-छन्द: 6 पंक्तियाँ; रोला + उल्लाला; तुक/लय का महत्त्व—एक पंक्ति में बताओ।
- भाषा: उदाहरण देकर अनुप्रास/पक्षपात-रहित वचन/दिव्य-प्रतीति दिखाओ—उत्तर में चमक आएगी।