जूठन — सम्पूर्ण, समझने लायक नोट्स
परिचय और केंद्रीय सार
- रचनाकार: ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून 1950, बरला—मुज़फ्फरनगर, उ.प्र.)
- विधा: आत्मकथा (आत्मकथांश)
- स्वर: दलित अनुभव का साक्ष्य—स्कूल, समाज, श्रम, भूख और अपमान का यथार्थ
- केंद्रीय बात: “जूठन” सिर्फ बचे-खुचे भोजन का नाम नहीं; यह जाति–वर्चस्व, बेगार, भूख और अमानवीय सामाजिक ढाँचे का प्रतीक है। लेखक बताता है कि कैसे श्रम का मूल्य नहीं—“दिन-रात मर-खप कर भी पसीने की कीमत मात्र जूठन।”
कथा–सार (मुख्य प्रसंग)
- स्कूल की त्रासदी: हेडमास्टर कालीराम ने बालक ओमप्रकाश से कक्षा/मैदान झाड़ू लगवाया—“यह तुम्हारा खानदानी काम है” कहकर। तीसरे दिन पिता मैदान में देख लेते हैं—झाड़ू फेंक देते हैं, कड़ी आपत्ति करते हैं।
- बेगार और जूठन: माँ–भाई–भाभी दिन भर तगाओं के यहाँ काम करें—बदले में बची-खुची रोटी/जूठन, फसल के समय थोड़ा अनाज। बारात की जूठी पत्तलों से भोजन जुटाना—कभी सूखी पूरियाँ बचाकर बरसात में नमक–मिर्च/गुड़ डालकर खाना—यही रोजमर्रा।
- मरे जानवर की खाल: गाँव में बैल की खाल उतारने भेजा जाना—खून, दुर्गंध, बोझ—बाल मन पर गहरी चोट। भाभी की पुकार—“इनसे ये न कराओ… इन्हें इस गंदगी में न घसीटो!”—लेखक-जीवन का निर्णायक मोड़।
- सुरेन्द्र का प्रसंग: उसी तगा परिवार का लड़का (सुरेन्द्र) लेखक के घर खाना खाता है और तारीफ़ करता है; लेखक की स्मृतियों में “जूठे” दिन उभर आते हैं—विडंबना और समय का पलटाव।
शीर्षक का औचित्य (प्रतीक/अर्थ)
- जूठन = शोषण/असमानता का रूपक: श्रम के बदले सम्मानित वेतन नहीं, “बची-खुची जूठी पत्तलों” का सहारा।
- सामाजिक आलोचना: “वर्ण” के नाम पर “कार्य-विभाजन” असल में सत्ता–ढाँचे को बचाए रखने की रणनीति है।
मुख्य थीम/विचार
- जाति-आधारित अपमान और बेगार (अनपेड लेबर)
- शिक्षा बनाम जाति: स्कूल में “कक्षा” छोड़ “झाड़ू”—प्रतिभा का दमन
- भूख/गरीबी/जूठन: शरीर-मन पर पड़ता स्थायी प्रभाव
- मानवीय प्रतिरोध: पिता का हस्तक्षेप, भाभी की आवाज़—मोराल करेज
- स्मृति का नैतिक वितान: अतीत की चुभन वर्तमान में सामाजिक प्रश्न बनकर लौटती है
चरित्र-झलक
- लेखक (ओमप्रकाश): संवेदनशील, संघर्षशील; अपमान की स्मृतियों से समाज-चेतना जगाता है।
- पिता (छोटनलाल): साहसी—हेडमास्टर से सीधा सवाल; पुत्र-गरिमा सर्वोपरि।
- माँ (मकुंदी देवी): श्रम-साधिका; परिवार का सहारा; जूठन–संस्कृति का साक्ष्य।
- भाभी: निर्णायक स्वर—“इनसे ये न कराओ…”—लेखक-जीवन को नई दिशा देती है।
- हेडमास्टर कालीराम: व्यवस्था की सामंती मानसिकता का प्रतीक।
- सुरेन्द्र: समय-पलटाव का पात्र; विडंबना कि जूठन खिलाने वाले घर में आज वही बैठकर खा रहा है।
भाषा/शैली/प्रभाव
- भाषा: सरल, सजीव, मारक
- शिल्प: आत्मकथात्मक–वृत्तांत; बिंब—“जूठी पत्तल, सूखी पूरियाँ, लुगदी-सा गुड़”
- प्रभाव: करुण–रोष–चकित—तीनों मिलकर सामाजिक विवेक जगाते हैं
याद रखने लायक पंक्तियाँ (उत्तर में उद्धृत करो)
- “लम्बा-चौड़ा मैदान मेरे वजूद से कई गुना बड़ा था…”
- “दिन-रात मर-खप कर भी हमारे पसीने की कीमत मात्र जूठन…”
- “कितने क्रूर समाज में रहे हैं हम, जहाँ श्रम का कोई मोल नहीं…”
अति-लघु उत्तरीय (15)
- ‘जूठन’ के लेखक कौन?—ओमप्रकाश वाल्मीकि
- हेडमास्टर का नाम?—कालीराम
- ‘जूठन’ किस विधा का अंश है?—आत्मकथा
- जूठन शब्द का सांकेतिक अर्थ—श्रम का अपमान/सामाजिक शोषण
- पिता ने झाड़ू क्यों फेंका?—पुत्र का अपमान/जातिगत बेगार का विरोध
- भाभी के वाक्य—“इनसे ये न कराओ…” का प्रभाव—लेखक की जीवन-दिशा बदली
- बारात के बाद भोजन कैसे मिलता?—जूठी पत्तलों से
- स्कूल में बच्चे से क्या कराया गया?—कक्षा/मैदान की सफ़ाई (झाड़ू)
- लेखक की माँ का नाम—मकुंदी देवी
- पिता का नाम—छोटनलाल
- लेखक ने किस नाट्यशाला की स्थापना की?—मेघदूत
- दलित आंदोलन से जुड़ी आलोचना-कृति—दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र
- ‘जूठन’ का सामाजिक सन्देश—मानव-गरिमा/समानता/श्रम का मूल्य
- सुरेन्द्र के प्रसंग का सार—समय-पलटाव; विडंबना/नैतिक असुविधा
- लेखक का जन्म-स्थान—बरला (मुज़फ्फरनगर)
लघु उत्तरीय (10)
- विद्यालय में लेखक के साथ क्या हुआ?
— हेडमास्टर ने जाति-आधार पर झाड़ू लगवाया; पढ़ाई से रोका; यह शिक्षा-तंत्र की सामंती मानसिकता का संकेत है। - पिता ने क्या देखा/किया?
— बेटे को झाड़ू लगाते देखा; झाड़ू छीनकर फेंका; हेडमास्टर से टकराए—यह प्रतिरोध लेखक के आत्म-सम्मान की नींव है। - “जूठन” क्यों प्रतीक है?
— श्रम का अनादर, जाति-वर्चस्व, भूख और बेगार—चारों का समेकित रूपक। - किन बातों से “मन में काँटे” उगते?
— दस-पंद्रह मवेशियों की सेवा/गोबर/दुर्गंध के बदले पाँच सेर अनाज; जूठी पत्तल—असंगत प्रतिफल। - भाभी की बात का महत्व
— बाल-मन को दलदल से बचाती है; आत्म-गरिमा/शिक्षा की राह सुझाती है। - सुरेन्द्र का प्रसंग—विचलित क्यों?
— जिसने बचपन में जूठन दी, वही आज लेखक के घर भोजन की तारीफ कर रहा—सामाजिक इतिहास की कचोट। - “क्रूर समाज”—किस अर्थ में?
— जहाँ श्रम का मोल नहीं; बेगार/अपमान सामान्य; गरीबी-स्थिर रखने का षड्यंत्र। - भाषा/शैली का प्रभाव
— साक्ष्यपूर्ण, मार्मिक—पाठक को भावुक करने के साथ सोचने पर मजबूर करती है। - शीर्षक की सार्थकता
— “जूठन” पूरे जीवन-अनुभव का तंज है—व्यक्ति से समाज तक। - जाति और शिक्षा—टकराव
— जातिवादी मानसिकता शिक्षा-समानता को रोकती है; “कक्षा के बजाय झाड़ू” इसी का प्रतीक है।
दीर्घ उत्तरीय (5)
- “जूठन” का सामाजिक अर्थ-चिंतन
- जूठन = शोषण/अपमान का सिस्टम; बेगार = नीतिगत हिंसा; कहानी निजी है, पर सामूहिक सच्चाई का बयान।
- स्कूल-प्रसंग का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
- डांट/झाड़ू/अपमान से बाल-मन में भय/ग्रंथि; पर पिता का हस्तक्षेप—आत्म-विश्वास की लौ।
- भाभी–वाक्य का जीवन-परिवर्तनात्मक अर्थ
- “इनसे ये न कराओ…”—बालक का स्वत्व/संभावना बची; शिक्षा/सम्मान का रास्ता खुला।
- “सुरेन्द्र” प्रसंग की विडंबना
- वही घर अब “भोजन के स्वाद” का गुणगान करता है; समय-पलटाव, पर लेखक-मन की चुभन नहीं मिटती।
- शीर्षक, शैली, प्रतीक—समग्रता
- “जूठन” का व्यंग्यात्मक रूपक; सहज-भाषा; बिंब—सहसा साहित्य से बाहर समाज में ले जाते हैं।
MCQ (20) — उत्तर अंत में
- ‘जूठन’ के लेखक — A) कँवल भारती B) ओमप्रकाश वाल्मीकि C) निराला D) दयाराम पँवार
- लेखक का जन्म — A) 30 जून 1950 B) 30 मई 1950 C) 30 मार्च 1950 D) 30 जुलाई 1950
- वाल्मीकि जुड़े— A) समाजवादी B) दलित आंदोलन C) नई कविता D) अकविता
- “रोते-रोते मैदान झाड़ू”—कौन? A) ओमप्रकाश B) कँवल भारती C) दयाराम D) ओम भारती
- झाड़ू किसने छीनी? A) श्यामचरण B) कालीराम C) कलीराम D) बाबूलाल
- कमरे में बुलाने वाले हेडमास्टर— A) चंदूराम B) गरीबराम C) अकलूराम D) कालीराम
- ‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ — A) कँवल B) वाल्मीकि C) किरण B) जोशी
- ‘जूठन’—विधा — A) उपन्यास B) आत्मकथा C) संस्मरण D) निबंध
- ‘मेघदूत’— A) कविता B) नाट्य संस्था C) पत्रिका D) कहानी
- परिवेश सम्मान — A) 1995 B) 1993 C) 1996 D) 2000
- जयश्री सम्मान — A) 1993 B) 1995 C) 1996 D) 2001
- बरला—किस जिले में? A) अलीगढ़ B) मुज़फ्फरनगर C) मेरठ D) बुलंदशहर
- “जूठन” का मूल प्रतीक— A) संपन्नता B) शोषण/भूख C) शिक्षा D) राजनीति
- पिता का नाम — A) छोटनलाल B) चौतनलाल C) चेतनलाल D) छोटेलाल
- माँ का नाम — A) मुँजरी B) मुकुंदी/मकुंदी C) मंजरी D) मनोरी
- बारात के बाद भोजन— A) पत्तल पर बैठकर B) जूठी पत्तल से C) रसोई में D) मेज़ पर
- स्कूल-हेडमास्टर की सोच— A) समानतावादी B) प्रगतिशील C) सामंती/जातिवादी D) उदार
- भाभी का कथन— A) निरर्थक B) निर्णायक/प्रेरक C) औपचारिक D) रूखा
- लेखक-जीवन की सीख— A) समझौता B) पलायन C) संघर्ष/शिक्षा D) हिंसा
- “दिन-रात मर-खप…”—किसका भाव? A) श्रम का सम्मान B) श्रम का अपमान C) दान D) उत्सव
उत्तर: 1-B, 2-A, 3-B, 4-A, 5-C, 6-A, 7-B, 8-B, 9-B, 10-A, 11-C, 12-B, 13-B, 14-A, 15-B, 16-B, 17-C, 18-B, 19-C, 20-B
रिक्त-स्थान (12)
- पर पाठ के लेखक … हैं — वाल्मीकि
- जन्म-स्थान — … (मुज़फ्फरनगर) — बरला
- पिता — … — छोटनलाल
- परिवेश सम्मान — … — 1995
- जयश्री सम्मान — … — 1996
- माता — … — मकुंदी देवी
- ‘जूठन’ — … की आत्मकथा — ओमप्रकाश वाल्मीकि
- हेडमास्टर — … — कालीराम
- बारात के बाद भोजन — … — जूठी पत्तल
- नाट्य संस्था — … — मेघदूत
- दलित आलोचना-कृति — … — दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र
- “दिन-रात मर-खप…” — पसीने की कीमत … — जूठन
सत्य/असत्य (10)
- ‘जूठन’ एक कहानी है। — असत्य (आत्मकथा)
- हेडमास्टर ने बालक से झाड़ू लगवाया। — सत्य
- पिता ने बेइज्जती सह ली। — असत्य
- “जूठन” का प्रतीक—सम्मानित मजदूरी। — असत्य
- भाभी का कथन लेखक-जीवन में निर्णायक है। — सत्य
- बारात की जूठी पत्तलों का प्रसंग आता है। — सत्य
- सुरेन्द्र प्रसंग—समय-पलटाव की विडंबना दिखाता है। — सत्य
- “जूठन” में भाषा कठिन और अलंकार-प्रधान है। — असत्य (सरल/मार्मिक)
- लेखक दलित आंदोलन के महत्त्वपूर्ण स्वर हैं। — सत्य
- “मेघदूत”—कविता-संग्रह है। — असत्य (नाट्य संस्था)
मिलान (10)
A) कालीराम — (i) हेडमास्टर)
B) छोटनलाल — (ii) पिता)
C) मकुंदी देवी — (iii) माँ)
D) भाभी — (iv) निर्णायक/प्रेरक स्वर)
E) जूठी पत्तल — (v) भूख/अपमान का प्रतीक)
F) मेघदूत — (vi) नाट्य संस्था)
G) दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र — (vii) आलोचना-कृति)
H) परिवेश/जयश्री — (viii) सम्मान)
I) बरला — (ix) लेखक का गाँव)
J) झाड़ू — (x) स्कूल-अपमान/बेगार)
भाषा की बात — अभ्यास
- सर्वनाम (वाक्य से छाँटिए)
- “लम्बा-चौड़ा मैदान मेरे वजूद से कई गुना बड़ा था।” — मेरे
- “उनकी दहाड़ सुनकर मैं थर-थर काँपा।” — उनकी, मैं
- “निगाह मुझ पर टिकी थी।” — मुझ
- “मेरी हिचकियाँ बँध गई थीं।” — मेरी
- उपयुक्त विशेषण दीजिए
- खाई—गहरी/चौड़ी; कक्षा—खुली/छोटी; मैदान—लम्बा-चौड़ा; बारात—धूमधामी; जिन्दगी—संघर्षमय; टाँगें—थकी/काँपती; चादर—मैली/खूनी; गठरी—भारी; छुरी—तेज़; खाल—गन्दी/गीली
- पर्यायवाची
- चाव—शौक/रुचि; अक्सर—अधिकतर/प्रायः; कीमत—मूल्य/प्रतिफल; तकलीफदेह—पीड़ादायक/कष्टप्रद; इसलिए—अतः/इस कारण
- विलोम
- सम्मान—अपमान; समृद्धि—दरिद्रता; सत्य—असत्य; समानता—असमानता; करुण—निर्दयी; श्रम—आलस्य
- वाक्य-प्रकृति
- “चाचा ने खाल उतारना शुरू किया।” — सरल
- “उस रोज मैंने चाचा से बहुत कहा, लेकिन वे नहीं माने।” — संयुक्त
- “जैसे-जैसे खाल उतर रही थी, मेरे भीतर रक्त जम रहा था।” — संयुक्त
- “जाते ही हेडमास्टर ने फिर झाड़ू के काम पर लगा दिया।” — संयुक्त
- “एक त्यागी लड़के ने चिल्लाकर कहा—मास्साब, वो कोने में बैठा है।” — संयुक्त
- मुहावरे (वाक्य सहित)
- आँखों में रात काटना: “माँ ने भूख में कई बार आँखों में रात काटी।”
- जिगर का टुकड़ा: “पिता के लिए बेटा जिगर का टुकड़ा है; अपमान कैसे सहें!”
- प्रत्यय/उपसर्ग
- श्रमिक (श्रम + इक), निर्धनता (निर्धन + ता), मानवीय (मानव + ईय), अमानवीय (अ + मानव + ईय), बेगार (बे + गार)
लेखक-परिचय (संक्षेप)
- ओमप्रकाश वाल्मीकि (1950–2013): दलित आंदोलन के अग्रणी स्वर। रचनाएँ—आत्मकथा: जूठन; कहानी: सलाम, घुसपैठिए; कविता: सदियों का संताप, बस! हो चुका…; आलोचना: दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र। सम्मान—डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार (1993), परिवेश (1995), जयश्री (1996), कथाक्रम (2000)। नाट्य संस्था—मेघदूत (महा.)।
एग्ज़ाम-हैक (एक पन्ने की याद)
- एक-लाइनर: “जूठन = श्रम का अपमान; पिता–भाभी = प्रतिरोध; स्कूल = जाति–व्यवस्था का चेहरा”
- उद्धरण डालना: “दिन-रात मर-खप… जूठन”, “यह भी हमारी तरह…” (दूसरे पाठों में), “लम्बा-चौड़ा मैदान…”
- दीर्घ-उत्तर का ढाँचा: प्रस्तावना → प्रसंग/उद्धरण → सामाजिक अर्थ/विश्लेषण → निष्कर्ष (मानव-गरिमा)