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Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 10 जूठन

 

जूठन — सम्पूर्ण, समझने लायक नोट्स

परिचय और केंद्रीय सार

  • रचनाकार: ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून 1950, बरला—मुज़फ्फरनगर, उ.प्र.)
  • विधा: आत्मकथा (आत्मकथांश)
  • स्वर: दलित अनुभव का साक्ष्य—स्कूल, समाज, श्रम, भूख और अपमान का यथार्थ
  • केंद्रीय बात: “जूठन” सिर्फ बचे-खुचे भोजन का नाम नहीं; यह जाति–वर्चस्व, बेगार, भूख और अमानवीय सामाजिक ढाँचे का प्रतीक है। लेखक बताता है कि कैसे श्रम का मूल्य नहीं—“दिन-रात मर-खप कर भी पसीने की कीमत मात्र जूठन।”

कथा–सार (मुख्य प्रसंग)

  1. स्कूल की त्रासदी: हेडमास्टर कालीराम ने बालक ओमप्रकाश से कक्षा/मैदान झाड़ू लगवाया—“यह तुम्हारा खानदानी काम है” कहकर। तीसरे दिन पिता मैदान में देख लेते हैं—झाड़ू फेंक देते हैं, कड़ी आपत्ति करते हैं।
  2. बेगार और जूठन: माँ–भाई–भाभी दिन भर तगाओं के यहाँ काम करें—बदले में बची-खुची रोटी/जूठन, फसल के समय थोड़ा अनाज। बारात की जूठी पत्तलों से भोजन जुटाना—कभी सूखी पूरियाँ बचाकर बरसात में नमक–मिर्च/गुड़ डालकर खाना—यही रोजमर्रा।
  3. मरे जानवर की खाल: गाँव में बैल की खाल उतारने भेजा जाना—खून, दुर्गंध, बोझ—बाल मन पर गहरी चोट। भाभी की पुकार—“इनसे ये न कराओ… इन्हें इस गंदगी में न घसीटो!”—लेखक-जीवन का निर्णायक मोड़।
  4. सुरेन्द्र का प्रसंग: उसी तगा परिवार का लड़का (सुरेन्द्र) लेखक के घर खाना खाता है और तारीफ़ करता है; लेखक की स्मृतियों में “जूठे” दिन उभर आते हैं—विडंबना और समय का पलटाव।

शीर्षक का औचित्य (प्रतीक/अर्थ)

  • जूठन = शोषण/असमानता का रूपक: श्रम के बदले सम्मानित वेतन नहीं, “बची-खुची जूठी पत्तलों” का सहारा।
  • सामाजिक आलोचना: “वर्ण” के नाम पर “कार्य-विभाजन” असल में सत्ता–ढाँचे को बचाए रखने की रणनीति है।

मुख्य थीम/विचार

  • जाति-आधारित अपमान और बेगार (अनपेड लेबर)
  • शिक्षा बनाम जाति: स्कूल में “कक्षा” छोड़ “झाड़ू”—प्रतिभा का दमन
  • भूख/गरीबी/जूठन: शरीर-मन पर पड़ता स्थायी प्रभाव
  • मानवीय प्रतिरोध: पिता का हस्तक्षेप, भाभी की आवाज़—मोराल करेज
  • स्मृति का नैतिक वितान: अतीत की चुभन वर्तमान में सामाजिक प्रश्न बनकर लौटती है

चरित्र-झलक

  • लेखक (ओमप्रकाश): संवेदनशील, संघर्षशील; अपमान की स्मृतियों से समाज-चेतना जगाता है।
  • पिता (छोटनलाल): साहसी—हेडमास्टर से सीधा सवाल; पुत्र-गरिमा सर्वोपरि।
  • माँ (मकुंदी देवी): श्रम-साधिका; परिवार का सहारा; जूठन–संस्कृति का साक्ष्य।
  • भाभी: निर्णायक स्वर—“इनसे ये न कराओ…”—लेखक-जीवन को नई दिशा देती है।
  • हेडमास्टर कालीराम: व्यवस्था की सामंती मानसिकता का प्रतीक।
  • सुरेन्द्र: समय-पलटाव का पात्र; विडंबना कि जूठन खिलाने वाले घर में आज वही बैठकर खा रहा है।

भाषा/शैली/प्रभाव

  • भाषा: सरल, सजीव, मारक
  • शिल्प: आत्मकथात्मक–वृत्तांत; बिंब—“जूठी पत्तल, सूखी पूरियाँ, लुगदी-सा गुड़”
  • प्रभाव: करुण–रोष–चकित—तीनों मिलकर सामाजिक विवेक जगाते हैं

याद रखने लायक पंक्तियाँ (उत्तर में उद्धृत करो)

  • “लम्बा-चौड़ा मैदान मेरे वजूद से कई गुना बड़ा था…”
  • “दिन-रात मर-खप कर भी हमारे पसीने की कीमत मात्र जूठन…”
  • “कितने क्रूर समाज में रहे हैं हम, जहाँ श्रम का कोई मोल नहीं…”

अति-लघु उत्तरीय (15)

  1. ‘जूठन’ के लेखक कौन?—ओमप्रकाश वाल्मीकि
  2. हेडमास्टर का नाम?—कालीराम
  3. ‘जूठन’ किस विधा का अंश है?—आत्मकथा
  4. जूठन शब्द का सांकेतिक अर्थ—श्रम का अपमान/सामाजिक शोषण
  5. पिता ने झाड़ू क्यों फेंका?—पुत्र का अपमान/जातिगत बेगार का विरोध
  6. भाभी के वाक्य—“इनसे ये न कराओ…” का प्रभाव—लेखक की जीवन-दिशा बदली
  7. बारात के बाद भोजन कैसे मिलता?—जूठी पत्तलों से
  8. स्कूल में बच्चे से क्या कराया गया?—कक्षा/मैदान की सफ़ाई (झाड़ू)
  9. लेखक की माँ का नाम—मकुंदी देवी
  10. पिता का नाम—छोटनलाल
  11. लेखक ने किस नाट्यशाला की स्थापना की?—मेघदूत
  12. दलित आंदोलन से जुड़ी आलोचना-कृति—दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र
  13. ‘जूठन’ का सामाजिक सन्देश—मानव-गरिमा/समानता/श्रम का मूल्य
  14. सुरेन्द्र के प्रसंग का सार—समय-पलटाव; विडंबना/नैतिक असुविधा
  15. लेखक का जन्म-स्थान—बरला (मुज़फ्फरनगर)

लघु उत्तरीय (10)

  1. विद्यालय में लेखक के साथ क्या हुआ?
    — हेडमास्टर ने जाति-आधार पर झाड़ू लगवाया; पढ़ाई से रोका; यह शिक्षा-तंत्र की सामंती मानसिकता का संकेत है।
  2. पिता ने क्या देखा/किया?
    — बेटे को झाड़ू लगाते देखा; झाड़ू छीनकर फेंका; हेडमास्टर से टकराए—यह प्रतिरोध लेखक के आत्म-सम्मान की नींव है।
  3. “जूठन” क्यों प्रतीक है?
    — श्रम का अनादर, जाति-वर्चस्व, भूख और बेगार—चारों का समेकित रूपक।
  4. किन बातों से “मन में काँटे” उगते?
    — दस-पंद्रह मवेशियों की सेवा/गोबर/दुर्गंध के बदले पाँच सेर अनाज; जूठी पत्तल—असंगत प्रतिफल।
  5. भाभी की बात का महत्व
    — बाल-मन को दलदल से बचाती है; आत्म-गरिमा/शिक्षा की राह सुझाती है।
  6. सुरेन्द्र का प्रसंग—विचलित क्यों?
    — जिसने बचपन में जूठन दी, वही आज लेखक के घर भोजन की तारीफ कर रहा—सामाजिक इतिहास की कचोट।
  7. “क्रूर समाज”—किस अर्थ में?
    — जहाँ श्रम का मोल नहीं; बेगार/अपमान सामान्य; गरीबी-स्थिर रखने का षड्यंत्र।
  8. भाषा/शैली का प्रभाव
    — साक्ष्यपूर्ण, मार्मिक—पाठक को भावुक करने के साथ सोचने पर मजबूर करती है।
  9. शीर्षक की सार्थकता
    — “जूठन” पूरे जीवन-अनुभव का तंज है—व्यक्ति से समाज तक।
  10. जाति और शिक्षा—टकराव
    — जातिवादी मानसिकता शिक्षा-समानता को रोकती है; “कक्षा के बजाय झाड़ू” इसी का प्रतीक है।

दीर्घ उत्तरीय (5)

  1. “जूठन” का सामाजिक अर्थ-चिंतन
  • जूठन = शोषण/अपमान का सिस्टम; बेगार = नीतिगत हिंसा; कहानी निजी है, पर सामूहिक सच्चाई का बयान।
  1. स्कूल-प्रसंग का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
  • डांट/झाड़ू/अपमान से बाल-मन में भय/ग्रंथि; पर पिता का हस्तक्षेप—आत्म-विश्वास की लौ।
  1. भाभी–वाक्य का जीवन-परिवर्तनात्मक अर्थ
  • “इनसे ये न कराओ…”—बालक का स्वत्व/संभावना बची; शिक्षा/सम्मान का रास्ता खुला।
  1. “सुरेन्द्र” प्रसंग की विडंबना
  • वही घर अब “भोजन के स्वाद” का गुणगान करता है; समय-पलटाव, पर लेखक-मन की चुभन नहीं मिटती।
  1. शीर्षक, शैली, प्रतीक—समग्रता
  • “जूठन” का व्यंग्यात्मक रूपक; सहज-भाषा; बिंब—सहसा साहित्य से बाहर समाज में ले जाते हैं।

MCQ (20) — उत्तर अंत में

  1. ‘जूठन’ के लेखक — A) कँवल भारती B) ओमप्रकाश वाल्मीकि C) निराला D) दयाराम पँवार
  2. लेखक का जन्म — A) 30 जून 1950 B) 30 मई 1950 C) 30 मार्च 1950 D) 30 जुलाई 1950
  3. वाल्मीकि जुड़े— A) समाजवादी B) दलित आंदोलन C) नई कविता D) अकविता
  4. “रोते-रोते मैदान झाड़ू”—कौन? A) ओमप्रकाश B) कँवल भारती C) दयाराम D) ओम भारती
  5. झाड़ू किसने छीनी? A) श्यामचरण B) कालीराम C) कलीराम D) बाबूलाल
  6. कमरे में बुलाने वाले हेडमास्टर— A) चंदूराम B) गरीबराम C) अकलूराम D) कालीराम
  7. ‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ — A) कँवल B) वाल्मीकि C) किरण B) जोशी
  8. ‘जूठन’—विधा — A) उपन्यास B) आत्मकथा C) संस्मरण D) निबंध
  9. ‘मेघदूत’— A) कविता B) नाट्य संस्था C) पत्रिका D) कहानी
  10. परिवेश सम्मान — A) 1995 B) 1993 C) 1996 D) 2000
  11. जयश्री सम्मान — A) 1993 B) 1995 C) 1996 D) 2001
  12. बरला—किस जिले में? A) अलीगढ़ B) मुज़फ्फरनगर C) मेरठ D) बुलंदशहर
  13. “जूठन” का मूल प्रतीक— A) संपन्नता B) शोषण/भूख C) शिक्षा D) राजनीति
  14. पिता का नाम — A) छोटनलाल B) चौतनलाल C) चेतनलाल D) छोटेलाल
  15. माँ का नाम — A) मुँजरी B) मुकुंदी/मकुंदी C) मंजरी D) मनोरी
  16. बारात के बाद भोजन— A) पत्तल पर बैठकर B) जूठी पत्तल से C) रसोई में D) मेज़ पर
  17. स्कूल-हेडमास्टर की सोच— A) समानतावादी B) प्रगतिशील C) सामंती/जातिवादी D) उदार
  18. भाभी का कथन— A) निरर्थक B) निर्णायक/प्रेरक C) औपचारिक D) रूखा
  19. लेखक-जीवन की सीख— A) समझौता B) पलायन C) संघर्ष/शिक्षा D) हिंसा
  20. “दिन-रात मर-खप…”—किसका भाव? A) श्रम का सम्मान B) श्रम का अपमान C) दान D) उत्सव
    उत्तर: 1-B, 2-A, 3-B, 4-A, 5-C, 6-A, 7-B, 8-B, 9-B, 10-A, 11-C, 12-B, 13-B, 14-A, 15-B, 16-B, 17-C, 18-B, 19-C, 20-B

रिक्त-स्थान (12)

  1. पर पाठ के लेखक … हैं — वाल्मीकि
  2. जन्म-स्थान — … (मुज़फ्फरनगर) — बरला
  3. पिता — … — छोटनलाल
  4. परिवेश सम्मान — … — 1995
  5. जयश्री सम्मान — … — 1996
  6. माता — … — मकुंदी देवी
  7. ‘जूठन’ — … की आत्मकथा — ओमप्रकाश वाल्मीकि
  8. हेडमास्टर — … — कालीराम
  9. बारात के बाद भोजन — … — जूठी पत्तल
  10. नाट्य संस्था — … — मेघदूत
  11. दलित आलोचना-कृति — … — दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र
  12. “दिन-रात मर-खप…” — पसीने की कीमत … — जूठन

सत्य/असत्य (10)

  1. ‘जूठन’ एक कहानी है। — असत्य (आत्मकथा)
  2. हेडमास्टर ने बालक से झाड़ू लगवाया। — सत्य
  3. पिता ने बेइज्जती सह ली। — असत्य
  4. “जूठन” का प्रतीक—सम्मानित मजदूरी। — असत्य
  5. भाभी का कथन लेखक-जीवन में निर्णायक है। — सत्य
  6. बारात की जूठी पत्तलों का प्रसंग आता है। — सत्य
  7. सुरेन्द्र प्रसंग—समय-पलटाव की विडंबना दिखाता है। — सत्य
  8. “जूठन” में भाषा कठिन और अलंकार-प्रधान है। — असत्य (सरल/मार्मिक)
  9. लेखक दलित आंदोलन के महत्त्वपूर्ण स्वर हैं। — सत्य
  10. “मेघदूत”—कविता-संग्रह है। — असत्य (नाट्य संस्था)

मिलान (10)

A) कालीराम — (i) हेडमास्टर)
B) छोटनलाल — (ii) पिता)
C) मकुंदी देवी — (iii) माँ)
D) भाभी — (iv) निर्णायक/प्रेरक स्वर)
E) जूठी पत्तल — (v) भूख/अपमान का प्रतीक)
F) मेघदूत — (vi) नाट्य संस्था)
G) दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र — (vii) आलोचना-कृति)
H) परिवेश/जयश्री — (viii) सम्मान)
I) बरला — (ix) लेखक का गाँव)
J) झाड़ू — (x) स्कूल-अपमान/बेगार)

भाषा की बात — अभ्यास

  1. सर्वनाम (वाक्य से छाँटिए)
  • “लम्बा-चौड़ा मैदान मेरे वजूद से कई गुना बड़ा था।” — मेरे
  • “उनकी दहाड़ सुनकर मैं थर-थर काँपा।” — उनकी, मैं
  • “निगाह मुझ पर टिकी थी।” — मुझ
  • “मेरी हिचकियाँ बँध गई थीं।” — मेरी
  1. उपयुक्त विशेषण दीजिए
  • खाई—गहरी/चौड़ी; कक्षा—खुली/छोटी; मैदान—लम्बा-चौड़ा; बारात—धूमधामी; जिन्दगी—संघर्षमय; टाँगें—थकी/काँपती; चादर—मैली/खूनी; गठरी—भारी; छुरी—तेज़; खाल—गन्दी/गीली
  1. पर्यायवाची
  • चाव—शौक/रुचि; अक्सर—अधिकतर/प्रायः; कीमत—मूल्य/प्रतिफल; तकलीफदेह—पीड़ादायक/कष्टप्रद; इसलिए—अतः/इस कारण
  1. विलोम
  • सम्मान—अपमान; समृद्धि—दरिद्रता; सत्य—असत्य; समानता—असमानता; करुण—निर्दयी; श्रम—आलस्य
  1. वाक्य-प्रकृति
  • “चाचा ने खाल उतारना शुरू किया।” — सरल
  • “उस रोज मैंने चाचा से बहुत कहा, लेकिन वे नहीं माने।” — संयुक्त
  • “जैसे-जैसे खाल उतर रही थी, मेरे भीतर रक्त जम रहा था।” — संयुक्त
  • “जाते ही हेडमास्टर ने फिर झाड़ू के काम पर लगा दिया।” — संयुक्त
  • “एक त्यागी लड़के ने चिल्लाकर कहा—मास्साब, वो कोने में बैठा है।” — संयुक्त
  1. मुहावरे (वाक्य सहित)
  • आँखों में रात काटना: “माँ ने भूख में कई बार आँखों में रात काटी।”
  • जिगर का टुकड़ा: “पिता के लिए बेटा जिगर का टुकड़ा है; अपमान कैसे सहें!”
  1. प्रत्यय/उपसर्ग
  • श्रमिक (श्रम + इक), निर्धनता (निर्धन + ता), मानवीय (मानव + ईय), अमानवीय (अ + मानव + ईय), बेगार (बे + गार)

लेखक-परिचय (संक्षेप)

  • ओमप्रकाश वाल्मीकि (1950–2013): दलित आंदोलन के अग्रणी स्वर। रचनाएँ—आत्मकथा: जूठन; कहानी: सलाम, घुसपैठिए; कविता: सदियों का संताप, बस! हो चुका…; आलोचना: दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र। सम्मान—डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार (1993), परिवेश (1995), जयश्री (1996), कथाक्रम (2000)। नाट्य संस्था—मेघदूत (महा.)।

एग्ज़ाम-हैक (एक पन्ने की याद)

  • एक-लाइनर: “जूठन = श्रम का अपमान; पिता–भाभी = प्रतिरोध; स्कूल = जाति–व्यवस्था का चेहरा”
  • उद्धरण डालना: “दिन-रात मर-खप… जूठन”, “यह भी हमारी तरह…” (दूसरे पाठों में), “लम्बा-चौड़ा मैदान…”
  • दीर्घ-उत्तर का ढाँचा: प्रस्तावना → प्रसंग/उद्धरण → सामाजिक अर्थ/विश्लेषण → निष्कर्ष (मानव-गरिमा)
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