प्रगीत और समाज — सम्पूर्ण, समझने लायक नोट्स
परिचय और सार
- लेखक: नामवर सिंह (ज. 28 जुलाई 1927, जियनपुर—वाराणसी)
- स्वर/उद्देश्य: गीत (प्रगीत/लिरिक) की “निजता–आत्मपरकता” के भीतर छिपी “सामाजिकता” की खोज; साथ ही आचार्य शुक्ल के “प्रबंध-काव्य” आदर्श का संदर्भ और आधुनिक कविता की नई प्रगीतात्मकता की दिशा।
- बड़ा निष्कर्ष: प्रबंध-काव्य “समग्र जीवन-चित्र” देता है; पर प्रगीत (जब नव-चेतना, नाट्य-धर्मिता, आत्म-संघर्ष से जुड़ता है) तो वह भी समाज का यथार्थ प्रतिध्वनित कर सकता है। “कविता जो कह रही है उसे वही समझेगा जो उसके अकेलेपन में मानवता की आवाज़ सुन सके।”
मुख्य अवधारणाएँ (Short and sweet)
- प्रबंध-काव्य: घटनाओं की क्रमबद्ध श्रृंखला, समग्र जीवन-चित्र, राष्ट्रीय/आदर्श प्रेरणा (उदा. प्रसाद–निराला–तुलसीदास के आख्यानक काव्य)
- प्रगीत/लिरिक: अल्पविस्तृत, आत्मपरक, वैयक्तिक, गीत-धर्मी; पर आधुनिक कवियों (मुक्तिबोध/समकालीन) में यही “निजता” सामाजिक अर्थों से भरी हुई
- नाट्यधर्मी कविता: आत्मगत होते हुए भी नाटकीय रचना-विन्यास; “कथा का आभास, नाटकीयता का मरीचिका; पर यथार्थ भाव/विचार/बिंब बनकर”
- “कला–कला के लिए”: यूरोप से आया सिद्धांत—लंबी कविताओं का विराम, मुक्तक/प्रगीत का ज़ोर; शुक्लजी को इससे शिकायत थी
- “मितकथन बनाम अतिकथन”: कम शब्दों में अधिक अर्थ—आधुनिक प्रगीत की शक्ति
पाठ-आधारित मॉडल उत्तर
अति-लघु उत्तरीय (केवल निशाने पर)
- ‘शेर सिंह का शस्त्र-समर्पण’ किसका आख्यानक काव्य है? — जयशंकर प्रसाद
- शुक्लजी का काव्य-आदर्श? — प्रबंध-काव्य
- किस काव्य में “समग्र जीवन-चित्र” मिलता है? — प्रबंध-काव्य
- “हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान” किसकी कृति है? — डॉ. त्रिभुवन सिंह
- नामवर सिंह का जन्म — 28 जुलाई 1927
लघु उत्तरीय (2–3 पंक्तियाँ)
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काव्य-आदर्श
— प्रबंध-काव्य: यथार्थ जीवन-आधारित कथा, घटनाओं की स्वाभाविक श्रृंखला, राष्ट्रीय/नीतिपरक प्रेरणा। ‘सूरसागर’ उन्हें सीमित लगा क्योंकि वह गीतिकाव्य है; इसलिए प्रसाद–निराला–तुलसी के आख्यानक काव्यों से वे संतुष्ट हुए। - “कला–कला के लिए” सिद्धांत
— कविता का लक्ष्य “कला का रस” माना; मुक्तक/लिरिक का प्रचलन बढ़ा; लंबी आख्यानक कविताएँ उपेक्षित हुईं—शुक्ल को इसी पर आपत्ति थी। - “प्रगीत” की परिभाषा व धारणा
— वैयक्तिक/आत्मपरक लयात्मक कविता; सामान्य धारणा—“समाज-निरपेक्ष”; पर आधुनिक प्रगीत में आत्म-स्वर के भीतर सामाजिक सच बोलता है। - वस्तुपरक नाट्यधर्मी बनाम आत्मपरक प्रगीत—अंतर
— नाट्यधर्मी लंबी कविताएँ कथात्मक/वस्तुगत दिखती हैं, फिर भी “भाव-नाटकीयता” रहती है; आत्मपरक प्रगीत में वस्तुगत यथार्थ अंतर्जगत में घुलकर प्रकट होता है—दोनों यथार्थ का ही स्वर हैं, बस प्रस्तुति भिन्न। - हिन्दी कविता में प्रगीत का स्थान (उदाहरण सहित)
— प्रसाद (शेरसिंह…), निराला (राम की शक्तिपूजा/तुलसीदास), मुक्तिबोध (नाट्यधर्मी प्रगीत), त्रिलोचन (सॉनेट–गीत में प्रकृति/जन–जीवन), नागार्जुन (व्यक्तिगत–सामाजिक तीव्रता)—प्रगीत नया सामाजिक आयाम रचता है।
दीर्घ उत्तरीय (संक्षिप्त बिंदु-रूप)
- आधुनिक प्रगीत बनाम भक्ति व गुप्त-युग प्रबंध
- भक्ति: तन्मयता/परमानुभूति; आधुनिक: आत्म-संघर्ष, ऐन्द्रियता, समाज-आलोचना
- गुप्त का प्रबंध: राष्ट्रीय मुक्ति का घोष; आधुनिक प्रगीत: उसी युग-चेतना को “व्यक्ति के भीतर” जगाना—अलग रूप में सामाजिकता
- निष्कर्ष: आधुनिक प्रगीत भक्ति से भिन्न, गुप्त के प्रबंध से विशिष्ट—मितकथन/आत्मानुभूति के माध्यम से समाज-स्वर देता है
- “कविता जो कुछ कह रही है…”—आशय
— प्रगीत का अकेलापन “अकेले की रुदन” नहीं, मानवता की सामूहिक गूँज है। एडोर्नो की दृष्टि में—व्यक्ति का आत्म-संघर्ष सामाजिक रूप से प्रतिफलित होता है। इसलिए निज-कथा असल में समाज-कथा भी है। - मुक्तिबोध पर पुनर्विचार—क्यों?
— नई कविता में आत्मपरकता को “समाज-निरपेक्ष” मानने की प्रवृत्ति थी। मुक्तिबोध ने आत्म-संघर्ष को नाट्यधर्मी विन्यास में रखकर सामाजिक अर्थ दिए; इसलिए नए, व्यापक काव्य-सिद्धांत के लिए उनका समावेश आवश्यक। - त्रिलोчен–नागार्जुन के प्रगीत
— त्रिलोचन: सॉनेट–गीत में जन–जीवन/प्रकृति के रंग; प्रगीत-नायक का निर्वैयक्तिक आत्मचित्र—व्यक्तिगत में भी “प्रतिनिधि”
— नागार्जुन: बहिर्मुख, आक्रामक; पर प्रेम/ममता/अनुचिंतन में तीव्र आत्मपरक प्रगीतात्मकता; सामाजिक अर्थ स्पष्ट। - “मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति”—प्रमाण
— कम शब्दों में अधिक अभिधा–व्यंजना; केदारनाथ सिंह/“हिमालय” जैसे पाठों में सूक्ष्म, पर गहरे स्तर खुलते हैं। आधुनिक प्रगीत की यही खासियत उसे सामाजिक तौर पर गहरा बनाती है।
लेखक-परिचय: नामवर सिंह (एक पैराग्राफ)
- जन्म: 28 जुलाई 1927, जियनपुर (वाराणसी), पिता—शिक्षक; माँ—वानेश्री देवी
- कर्म: आचार्य, आलोचक; काशी विश्वविद्यालय में अस्थायी व्याख्याता; पत्रिका ‘आलोचना’ के संपादक
- सम्मान: ‘कविता के नए प्रतिमान’ पर साहित्य अकादमी सम्मान का उल्लेख (पाठ्य-पुस्तक संदर्भ)
- योगदान: आधुनिक हिन्दी आलोचना में नए प्रतिमान—कविता, समाज और आलोचना की नई दृष्टि
MCQ (25) — उत्तर अंत में
- ‘प्रगीत और समाज’ के लेखक —
A) भट्ट B) जे.पी. C) नामवर सिंह D) उदय प्रकाश - नामवर सिंह किस पत्रिका के संपादक रहे?
A) समन्वय B) आलोचना C) गंगा D) माधुरी - ‘सूरसागर’ है —
A) प्रबंध काव्य B) गीति काव्य C) चंपू काव्य D) खंड काव्य - ‘कामायनी’—
A) बच्चन B) श्यामनारायण पांडेय C) नागार्जुन D) जयशंकर प्रसाद - ‘प्रगीत और समाज’—विधा —
A) आलोचना B) निबंध C) एकांकी D) आत्मकथा - “राम की शक्तिपूजा”—
A) वियोगी B) दिनकर C) बच्चन D) निराला - शुक्ल का काव्य-आदर्श —
A) मुक्तक B) प्रबंध काव्य C) गद्य-काव��य D) छंद-छंद - ‘शेर सिंह का शस्त्र-समर्पण’ —
A) निराला B) प्रसाद C) महादेवी D) नागार्जुन - “कला–कला के लिए”—जोर किस पर?
A) समाज B) मुक्तक/प्रगीत C) आख्यान D) उपन्यास - आधुनिक प्रगीत में प्रमुख —
A) केवल निजता B) आत्म-संघर्ष की सामाजिक गूँज C) वर्ण-व्यवस्था D) पुराण - नाट्यधर्मी लंबी कविता —
A) कथा नहीं B) कथा-आभास/भाव-नाटकीयता C) केवल लोरी D) केवल मुक्तक - “मितकथन” का अर्थ —
A) अधिक कहना B) कम शब्दों में अधिक अर्थ C) केवल वर्णन D) अलंकार - जिन कवियों पर चर्चा —
A) प्रसाद/निराला/मुक्तिबोध/त्रिलोचन/नागार्जुन B) तुलसी/सूर/केशव C) केवल बच्चन D) केवल पंत - ‘आख्यानक काव्य’—
A) प्रबंध-काव्य का रूप B) मुक्तक C) षट्पदी D) सानेट - “व्यक्ति का अकेलापन = मानवता की आवाज”—यह दृष्टि किसकी?
A) पाश B) एडोर्नो C) इलियट D) हाइट - “अकाल और उसके बाद”—
A) नागार्जुन B) शमशेर C) निराला D) त्रिलोचन - त्रिलोचन का प्रमुख रूप —
A) ग़ज़ल B) सॉनेट–गीत C) महाकाव्य D) रस-गंधर्भ - “वही त्रिलोचन है वह” —
A) भक्ति-गीत B) आत्मपरक प्रगीत C) खंडकाव्य D) आलोचना - “तन गई रीढ़” —
A) मुक्तिबोध B) नागार्जुन C) केदार D) धूमिल - ‘कविता के नए प्रतिमान’ —
A) शोध-ग्रंथ B) आलोचना-पुस्तक C) काव्य-संग्रह D) नाटक - “पेथोला की प्रतिध्वनि” —
A) निराला B) प्रसाद C) पंत D) बच्चन - “तुलसीदास” (कविता) —
A) पंत B) निराला C) शमशेर D) त्रिलोचन - “प्रलय की छाया” —
A) प्रसाद B) अज्ञेय C) बच्चन D) नागार्जुन - “सूरसागर”—शुक्ल की दृष्टि में —
A) परिसीमित (गीतिकाव्य) B) प्रबंध-काव्य आदर्श C) गद्यकाव्य D) खंडकाव्य - “नई प्रगीतात्मकता”—
A) केवल भावुकता B) आत्म–समाज रिश्ते का नया रूप C) छंद-विन्यास D) अलंकार-केन्द्रित
उत्तर: 1-C, 2-B, 3-C, 4-D, 5-B, 6-D, 7-B, 8-B, 9-B, 10-B, 11-B, 12-B, 13-A, 14-A, 15-B, 16-A, 17-B, 18-B, 19-B, 20-B, 21-B, 22-B, 23-A, 24-A, 25-B
रिक्त-स्थान (12)
- नामवर सिंह का जन्म-स्थान … (वाराणसी, उ.प्र.) — जियनपुर
- काशी वि.वि. में वे अस्थायी … थे — व्याख्याता
- जन्म-तिथि — 28 जुलाई … — 1927 ई. को
- ‘कविता के नए प्रतिमान’ पर साहित्य … सम्मान — अकादमी
- पिता—एक … थे — शिक्षक
- माता— … — वानेश्री देवी
- “सूरसागर” को शुक्ल ने … कहा — गीतिकाव्य/परिसीमित
- “कला–कला के लिए” प्रवृत्ति से … का ज़ोर — प्रगीत/मुक्तक
- “राम की शक्तिपूजा” — … की रचना — निराला
- “कामायनी” — … की— — जयशंकर प्रसाद
- “शेरसिंह का शस्त्र-समर्पण” — … का — प्रसाद का
- “नई प्रगीतात्मकता” में … की शक्ति— — मितकथन
सत्य/असत्य (10)
- शुक्ल का आदर्श—मुक्तक था। — असत्य
- ‘सूरसागर’ उन्हें गीतिकाव्य/परिसीमित लगा। — सत्य
- “कला–कला के लिए” से प्रबंध-काव्य को बल मिला। — असत्य
- प्रगीत केवल समाज-निरपेक्ष होते हैं। — असत्य (आधुनिक प्रगीत सामाजिक भी)
- मुक्तिबोध की कविताएँ आत्मपरक होते हुए नाट्यधर्मी विन्यास में हैं। — सत्य
- “मितकथन” आधुनिक प्रगीत की कमजोरी है। — असत्य
- “तुलसीदास” कविता निराला की है। — सत्य
- “पेथोला की प्रतिध्वनि” प्रसाद की रचना मानी जाती है। — सत्य
- त्रिलोचन के यहाँ सॉनेट–गीत प्रमुख हैं। — सत्य
- “एडोर्नो” का संदर्भ प्रगीत और समाज में आता है। — सत्य
मिलान (10)
A) नामवर सिंह — (आलोचना/प्रगीत-समाज दृष्टि)
B) रामचंद्र शुक्ल — (प्रबंध-काव्य आदर्श)
C) निराला — (राम की शक्तिपूजा/तुलसीदास)
D) प्रसाद — (कामायनी/शेरसिंह/पेथोला/प्रलय की छाया)
E) मुक्तिबोध — (नाट्यधर्मी प्रगीत/ब्राह्मराक्षस)
F) त्रिलोचन — (सॉनेट–गीत/जन–जीवन)
G) नागार्जुन — (अकाल और उसके बाद/तन गई रीढ़)
H) ‘कविता के नए प्रतिमान’ — (आलोचना-ग्रंथ)
I) “कला–कला के लिए” — (यूरोपीय सौंदर्यशास्त्र)
J) मितकथन — (आधुनिक प्रगीत की शक्ति)
“भाषा की बात” — विशेषण बनाइए
- तीव्रता → तीव्र
- समाज → सामाजिक
- व्यक्ति → वैयक्तिक/व्यक्तिगत
- आत्मा → आत्मीय/आध्यात्मिक (प्रसंगानुसार)
- प्रसंग → प्रासंगिक
- विचार → वैचारिक
- इतिहास → ऐतिहासिक
- स्मरण → स्मरणीय/स्मरणात्मक
- शर्म → शर्मनाक/लज्जाजनक/शर्मीला (व्यक्ति-गुण हेतु)
- लक्षण → लाक्षणिक
- इन्द्रिय → इन्द्रियगत/इन्द्रियात्मक
एग्ज़ाम-हैक (तेज़ याद करने के लिए)
- एक लाइन: “शुक्ल = प्रबंध; नामवर = प्रगीत का सामाजिक अर्थ”
- तीन उद्धरण याद रखें:
- “कला–कला के लिए”—प्रगीत का उभार
- “मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति”
- “कविता के अकेलेपन में मानवता की आवाज”
- दीर्घ-उत्तर का टेम्पलेट: प्रस्तावना → तर्क/उदाहरण (प्रसाद/निराला/मुक्तिबोध/त्रिलोचन/नागार्जुन) → निष्कर्ष (आधुनिक प्रगीत = सामाजिक आवाज)