सिपाही की माँ — सम्पूर्ण, समझने लायक नोट्स
रचना-परिचय
- विधा: एकांकी (One-act play)
- रचनाकार: मोहन राकेश (ज. 8 जनवरी 1925, अमृतसर)
- अन्य रचनाएँ (प्रासंगिक): अषाढ़ का एक दिन (नाटक), लहरों के राजहंस (नाटक), आधे-अधूरे (नाटक), आख़िरी चट्टान तक (यात्रा-वृत्तांत)
- पृष्ठभूमि: द्वितीय विश्वयुद्ध; बर्मा (अब म्यांमार) मोर्चा; गाँव की निर्धन गृहस्थी
कहानी का सार (सीधे शब्दों में)
- बिशनी/विशनी (माँ) और मुन्नी (बेटी) डाकिए का इंतजार करती हैं—इकलौता बेटा “मानक” फौज में बर्मा में है.
- घर में तंगी है; मुन्नी की शादी करनी है; इसी मजबूरी में माँ ने बेटे को भर्ती कराया.
- गाँव की कुन्ती आती है—रिश्ता देखने की बात; पर बिशनी साफ़ कहती है—“मानक आए, तब कुछ हो.” शादी में बहुत खर्च है.
- बर्मा से भागते दो शरणार्थी लड़कियाँ आती हैं; युद्ध की वीभत्सता बताती हैं—“फौजी भागते नहीं, भागे तो गोली मार दी जाती है.”
- दूसरी कड़ी (स्वप्न–सन्निकट दृश्य): मानक घायल-सा घर की ओर भागता आता है; दुश्मन सिपाही पीछे है; माँ बेटे को बचाती है, बेटे को भी रोकती है—“तू इसे नहीं मारेगा; यह भी हमारी तरह गरीब आदमी है.”
- माँ का मन: एक तरफ बेटे के लिए ममता; दूसरी तरफ दुश्मन सिपाही के लिए भी मानवीयता. युद्ध में मरने–मारने वाले दोनों गरीब/मजबूर इंसान हैं.
- नतीजा: यह एकांकी युद्ध की क्रूरता, गरीबी की मार और माँ की करुणा—तीनों को एक साथ उभारता है.
मुख्य थीम/विचार
- युद्ध बनाम आम आदमी: असल पीड़ा सिपाहियों/परिवारों की है; नीतियाँ/लाभ कहीं और तय होते हैं.
- गरीबी और मजबूरी: मुन्नी की शादी—खर्च/दहेज़/रिवाज; मजबूरी में भर्ती—यह भी एक “अंदरूनी लड़ाई”.
- माँ की ममता = सार्वभौमिक करुणा: माँ बेटे को भी बचाना चाहती है, दुश्मन सिपाही को भी; “मानवता” युद्ध से बड़ी.
- अफवाह/दूरी/अज्ञात भय: “बर्मा कई सौ कोस”—अज्ञात का डर, चौधरी की “बताई दूरी”—लोक-गाँव का नज़रिया.
- प्रतीक्षा का यथार्थ: पत्र/डाकिया = जीवन-सूत्र; उम्मीद की पतली डोर.
प्रतीक/बिंब
- डाकिया/चिट्ठी: आशा/जिंदगी की खबर; प्रतीक्षा का केन्द्र.
- कड़े (चूड़े): मुन्नी के सपने; शादी/भविष्य/आकांक्षा.
- कटोरा-भर चावल: अभाव में भी बाँटने की मानवीयता.
- बन्दूक/बोटी-बोटी: युद्ध की क्रूरता/हिंस्रता का भयावह रूपक.
- “कई सौ कोस” और “बर्मा”: दूरस्थ/अनजान का समेटा भय.
दृश्य-दर-दृश्य (सीन-बाय-सीन) समझ
- घर के आँगन में: बिशनी–मुन्नी—डाकिए का इंतजार, घर की तंगी, शादी की चिंता.
- कुन्ती का आना: रिश्ता देखने की बात, पर पैसे/खर्च/समय—सारी कठिनाइयाँ उभरती हैं.
- बर्मा से आई दो लड़कियाँ: युद्ध की सच्चाई, भागने पर गोली; गाँव–युद्ध का सेतु.
- रात/स्वप्न-जैसा: मानक बनाम दुश्मन सिपाही; माँ का हस्तक्षेप; “यह भी गरीब है”—मानवीय समानता का शिखर.
चरित्र-चित्रण (संक्षेप, पर सटीक)
- बिशनी/विशनी (माँ): केन्द्र; ममता + विवेक + करुणा. बेटा/दुश्मन दोनों की रक्षा की बात—“तू इसे नहीं मारेगा.” सबसे सशक्त पात्र.
- मुन्नी: भाई-प्रेम, भोली/आशावान—“भैया कड़े लाएँगे—तारो-बंतो से अच्छे.” युद्ध उसके सपनों से टकराता है.
- मानक: फौजी; क्रोध/स्वाभिमान (वहशी/जानवर जैसा कह गुजरना), पर वही सामान्य गरीब युवा भी—जिसे घर/माँ/बहन की चिंता है.
- सिपाही (दुश्मन): दुश्मन कम—गरीब/मजबूर ज्यादा; युद्ध-व्यवस्था का मोहरा; “हम भी इंसान हैं”—माँ के संवाद से उभरता.
- कुन्ती: पड़ोसन; व्यावहारिक; रिश्ते/समाजिक बेचैनी/सहानुभूति का चेहरा.
- बर्मा की दोनों लड़कियाँ: युद्ध के त्रास की जीवित गवाही.
- चौधरी: अफवाह/दूरी/लोक-नेतृत्व का प्रतीक—एक “जानकारी देने वाला” किंतु संवेदनहीन-सा उपस्थिति.
उद्धरण—उत्तर में चमक लाने के लिए
- “यह भी हमारी तरह गरीब आदमी है.” — युद्ध के परे मानवता
- “फौजी वहाँ लड़ने के लिए हैं, वे नहीं भाग सकते.” — व्यवस्था का अनुशासन/कठोरता
- “वर-घर देखकर ही क्या करना है, कुंती? मानक आए तो कुछ हो भी.” — गरीबी/शादी की विवशता
- “मैं इसे अभी मार दूंगा... बोटी-बोटी अलग कर दूंगा.” — युद्ध की वहशी मनोवृत्ति (क्षणिक उन्माद)
लेखक-परिचय (1 पैराग्राफ)
- मोहन राकेश (1925–1972): हिंदी रंगमंच के प्रमुख स्तंभ; नए रंग-संवेग/मनोवैज्ञानिकता/आधुनिक शिल्प; नाटक—अषाढ़ का एक दिन, आधे-अधूरे; यात्रा—आख़िरी चट्टान तक; उपन्यास—अंधेरे बंद कमरे, न आने वाला कल, अंतराल; संपादन—सारिका.
एकांकी और नाटक—अंतर (एक नज़र)
- एकांकी = एक अंक; एक केंद्रीय स्थिति/द्वंद्व; समय/चरित्र/प्रसंग का संकुचित, एकरेखीय विकास.
- नाटक = बहु-अंक; उपकथाएँ/विस्तार; समय/स्थान विस्तार; व्यवस्थित नाट्य-सन्धियाँ.
- एकांकी में भटकने की गुंजाइश कम; सघनता–तीव्रता–कथा-केंद्रितता अधिक.
परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तरी (एग्ज़ाम-रेडी)
अति-लघु उत्तरीय (12)
- एकांकीकार — मोहन राकेश
- मानक की माँ — बिशनी/विशनी
- मानक कहाँ लड़ने गया? — बर्मा, द्वितीय विश्वयुद्ध
- “आख़िरी चट्टान तक” — यात्रा-वृत्तांत (मोहन राकेश)
- मानक को क्यों भेजा? — घर की तंगी/मुन्नी की शादी के लिए
- “यह भी हमारी तरह गरीब है”—किसका संवाद? — बिशनी
- “मैं इसे बोटी-बोटी कर दूंगा”—कौन? — मानक (उन्माद में)
- दो लड़कियाँ कहाँ से? — बर्मा (रंगून)
- ब्रम्मा/बर्मा की दूरी—चौधरी के अनुसार — कई सौ कोस (लोक-अफवाह)
- संपादक रहे— — सारिका
- मुन्नी को किस चीज़ की चाह? — कड़े (भैया लाएँगे)
- डाकिया/चिट्ठी—प्रतीक — प्रतीक्षा/आशा
लघु उत्तरीय (10)
- बिशनी और मुन्नी डाकिए की राह क्यों देखते हैं?
— मानक की चिट्ठी—कुशलता/जीवन-धारा का संकेत. - बिशनी ने मानक को क्यों भेजा?
— तंगहाली; मुन्नी की शादी का बोझ; मजदूरी/रोज़गार का अभाव. - “यह भी हमारी तरह गरीब है”—अर्थ?
— दुश्मन सिपाही भी गरीब/मजदूर घर का; युद्ध उनके ऊपर थोपे गए. - “फौजी भागते नहीं”—संदर्भ?
— बर्मा से आई लड़कियाँ बताती हैं—भागने पर गोली. - मुन्नी का चरित्र-चित्रण (2-3 वाक्य)
— भोली, स्वप्नशील, भाई-प्रेम से भरी; कड़े/शादी उसके छोटे-छोटे सपने. - कुन्ती की भूमिका
— व्यावहारिक पड़ोसन; सांत्वना/रिश्ता-खोज, समाज की आवाज. - चौधरी का “कई सौ कोस”—ध्वनि?
— गाँव-राजनीति की जानकारी/अफवाह/दूरी का भय. - युद्ध और आम आदमी—निष्कर्ष
— लड़ाई नेताओं/राष्ट्रों की; कीमत गरीब/परिवार चुकाते हैं. - बिशनी का मानवीय आदर्श
— बेटे को भी रोकना, दुश्मन को भी बचाना—माँ/मानव का वृहद् हृदय. - शीर्षक “सिपाही की माँ”—औचित्य
— केंद्र माँ है; युद्ध/गरीबी/करुणा—सब माँ की नज़र से.
दीर्घ उत्तरीय (6) — बिंदुवार मॉडल
- सिपाही की माँ—केन्द्रीय विचार/महत्ता
- युद्ध बनाम मानवीयता; गरीबी–प्रतीक्षा–ममता; “यह भी गरीब है”—मानववाद का शिखर.
- बिशनी—सबसे सशक्त पात्र क्यों?
- कथा-केंद्र; निर्णय/करुणा/विवेक; अपने/दूसरे के बेटे के लिए समान हृदय—असाधारण.
- युद्ध की त्रासदी—एकांकी में प्रस्तुति
- बर्मा-लड़कियाँ/खून/भागने पर गोली; घर की तंगी; मानक–सिपाही भिड़ंत; व्यवस्था की हिंसा.
- प्रतीक और बिंब-विधान
- चिट्ठी/डाकिया, कटोरा-चावल, कड़े, बन्दूक; कैसे कथा-भाव को गाढ़ा करते हैं.
- एकांकी बनाम नाटक—रचना-शिल्प
- सघनता/एकता/एकरेखीय द्वंद्व; दृश्य-निर्माण—संक्षिप्त पर प्रभावी.
- “चिन्ता भी लड़ाई है”—मुन्नी की शादी-चिन्ता और मानक का युद्ध
- बाहरी युद्ध (मोर्चा) + भीतरी युद्ध (गरीबी/रिवाज/जिम्मेदारी); दोनों समान थकाऊ/त्रासद.
प्रसंग-व्याख्या (3)
(क) “यह भी हमारी तरह गरीब आदमी है।”
— माँ द्वारा युद्ध के पार मानवीयता का उद्घोष; दुश्मन भी इंसान—उसी पीड़ा का साझीदार.
(ख) “वर-घर देखकर ही क्या करना है, कुंती?... आजकल लोगों के हाथ कितने बढ़े हुए हैं।”
— शादी-खर्च/दहेज/समाज-रिवाज की मार; गरीबी की विवशता.
(ग) “फौजी... भागता है, उसे गोली मार दी जाती है।”
— सैन्य अनुशासन की कठोरता; व्यक्तिगत इच्छा/जीवित रहने का अधिकार—व्यवस्था से कुचलता.
प्रैक्टिस सेट
MCQ (20) — उत्तर अंत में
- मोहन राकेश का जन्म — A) 8 जन 1925 B) 7 फर 1920 C) 7 मार्च 1921 D) 2 जन 1922
- “आख़िरी चट्टान तक” — A) उपन्यास B) नाटक C) यात्रा-वृत्तांत D) संस्मरण
- मानक — A) खिलाड़ी B) फौजी C) शिक्षक D) पहलवान
- “विशनी/बिशनी” — A) पड़ोसन B) माँ C) बहन D) सिपाही
- “सिपाही की माँ” — A) कहानी B) एकांकी C) उपन्यास D) संस्मरण
- मानक किस युद्ध में? — A) प्रथम B) द्वितीय C) चीन युद्ध D) 1965
- बर्मा से आईं — A) दो लड़कियाँ B) दो लड़के C) चौधरी D) डाकिया
- “कई सौ कोस” — A) तहसीलदार B) चौधरी C) डाकिया D) पटवारी
- “बोटी-बोटी...” — A) सिपाही B) मानक C) चौधरी D) डाकिया
- “तू इसे नहीं मारेगा...” — A) मुन्नी B) बिशनी C) कुन्ती D) लड़की
- मुन्नी चाहती है — A) किताब B) कड़े C) चूड़ी D) घुंघरू
- फौजी भागे तो — A) पुरस्कार B) पदोन्नति C) गोली D) छुट्टी
- संपादन— — A) धर्मयुग B) सारिका C) हंस D) कल्पना
- “अषाढ़ का एक दिन” — A) उपन्यास B) नाटक C) संस्मरण D) कविता
- चिट्ठी — प्रतीक है — A) दुःख B) आशा C) भय D) शौर्य
- कटोरा-चावल — A) युद्ध B) भूख/मानवता C) संपन्नता D) तिरस्कार
- एकांकी का स्वर — A) हास्य B) व्यंग्य C) करुण-यथार्थ D) फंतासी
- मानक की बहन — A) तारा B) बंतो C) मुन्नी D) कुन्ती
- कुन्ती — A) माँ B) बहन C) पड़ोसन D) चौधरी की पत्नी
- एकांकी की धुरी — A) चौधरी B) सिपाही C) बिशनी D) डाकिया
उत्तर: 1-A, 2-C, 3-B, 4-B, 5-B, 6-B, 7-A, 8-B, 9-B, 10-B, 11-B, 12-C, 13-B, 14-B, 15-B, 16-B, 17-C, 18-C, 19-C, 20-C
रिक्त-स्थान (15)
- “सिपाही की माँ” के लेखक … — मोहन राकेश
- मानक की माँ का नाम … — बिशनी/विशनी
- मानक … युद्ध में गया — द्वितीय विश्व
- बिशनी–मुन्नी … की राह देखती हैं — डाकिए/चिट्ठी
- मुन्नी के … की चिंता है — विवाह
- “आखिरी चट्टान तक” — …-वृत्तांत — यात्रा
- बर्मा से आई … — दो लड़कियाँ
- “भागे फौजी को … मार दी जाती है” — गोली
- “यह भी हमारी तरह … आदमी है” — गरीब
- कटोरा-भर … — चावल
- “बोटी-बोटी…” — … का संवाद — मानक
- “कई सौ कोस”—किसका कहना — चौधरी
- माँ का मन — … बराबर याद करता है — मानक को
- मुन्नी चाहती है — … — कड़े
- एकांकी — … अंक का नाटक — एक
सत्य/असत्य (12)
- “सिपाही की माँ”—नाटक है, एकांकी नहीं — असत्य
- मानक बर्मा मोर्चे पर है — सत्य
- बिशनी केवल अपने बेटे को बचाना चाहती है; दुश्मन से उसे घृणा है — असत्य
- दो लड़कियाँ पाकिस्तान से आती हैं — असत्य
- “फौजी भागे तो गोली”—लड़कियाँ बताती हैं — सत्य
- कुन्ती मुन्नी के रिश्ते की बात करती है — सत्य
- चौधरी वैज्ञानिक दूरी बताते हैं — असत्य (लोक-अफवाह/अनुमान)
- डाकिया—आशा/प्रतीक्षा का प्रतीक — सत्य
- कटोरा-चावल—स्वार्थ का प्रतीक — असत्य (मानवता)
- एकांकी का स्वर करुण-यथार्थ है — सत्य
- “आखिरी चट्टान तक”—उपन्यास है — असत्य (यात्रा-वृत्तांत)
- “बोटी-बोटी...”—बिशनी का संवाद है — असत्य
मिलान (10)
A) बिशनी — (माँ/करुणा)
B) मुन्नी — (कड़े/शादी)
C) मानक — (फौजी/उन्माद)
D) सिपाही — (दुश्मन/मोहरा)
E) कुन्ती — (पड़ोसन/रिश्ता)
F) दो लड़कियाँ — (बर्मा/शरणार्थी)
G) चौधरी — (अफवाह/दूरी)
H) डाकिया/चिट्ठी — (आशा/प्रतीक्षा)
I) कटोरा-चावल — (मानवता/साझा)
J) बन्दूक — (युद्ध/हिंसा)
भाषा की बात — अभ्यास
- संज्ञा-पदबंध (उदाहरण)
- “मानक की माँ”, “बर्मा की लड़कियाँ”, “डाकिए की राह”, “कई सौ कोस”
- कारक-चिह्न पहचान
- “मानक को मार दूँगा” — को (सम्प्रदान/कर्म)
- “बिशनी से मिलकर” — से (करण/अपाद���न–प्रसंगानुसार)
- “चिट्ठी की प्रतीक्षा” — की (सम्बन्ध)
- “घर में तंगी” — में (अधिकरण)
- अव्यय छाँटिए
- अभी, भी, नहीं, फिर, तो, ही
- मुहावरे (वाक्य सहित)
- बोटी-बोटी करना — “क्रोध में मानक बोला—मैं इसकी बोटी-बोटी कर दूँगा.”
- राह देखना — “बिशनी डाकिए की राह देखती रही.”
- शीश नवाना — “मन्नत में शीश नवाना भी एक औजार बन जाता है.”
- पर्याय/विलोम
- गरीब: निर्धन/दरिद्र; विलोम—समृद्ध
- युद्ध: रण/लड़ाई; विलोम—शांति
- करुणा: दया/ममता; विलोम—निर्दयता
- आशा: उम्मीद; विलोम—निराशा
लिखने के छोटे टिप्स (एग्ज़ाम हैक्स)
- 5-पंक्तियों का टेम्पलेट: विषय (1) → कथ्य/संघर्ष (2) → पात्र/संवाद (3) → प्रतीक/थीम (4) → निष्कर्ष (5).
- व्याख्या में “प्रसंग → आशय → सन्देश/विशेष (अलंकार/प्रतीक)”—यह क्रम रखो.
- 1–2 उद्धरण डालो—उत्तर प्रोफेशनल लगेगा (“यह भी हमारी तरह गरीब आदमी है…”).