रचना-परिचय
- रचनाकार: सुभद्रा कुमारी चौहान (1904–1948)
- विधा: करुण-गीत (शोकगीत), छंदबद्ध, तुकांत
- स्रोत: काव्य-संकलन “मुकुल”
- केन्द्रीय भाव: पुत्र के असमय निधन के बाद ममता से भरी माँ का गहन शोक, असहायता, और टूटते मन की मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति
कवयित्री-परिचय (संक्षेप)
- जन्म: 16 अगस्त 1904, निहालपुर (इलाहाबाद)
- शिक्षा: क्राइस्ट चर्च/थियोसोफिकल स्कूल; असहयोग में पढ़ाई छोड़ी
- जीवन: स्वतंत्रता-आंदोलन में सक्रिय; कई बार जेल; मध्य प्रदेश विधानसभा सदस्य
- कृतियाँ: मुकुल (कविता), त्रिधारा (कविता-चयन), बिखरे मोती (कहानी-संग्रह), सभा के खेल (कहानी-संग्रह)
- विशेष: सरल, ओजस्वी, करुण–राष्ट्रीय संवेदना से भरी भाषा
कथ्य/विषय-वस्तु (सार)
- कविता एक माँ के अंदर टूटते समुद्र की लहरों जैसी है—बेटे के असमय जाने पर उसका मन बार-बार पूर्व स्मृतियों में लौटता है: गोद, थपकी, लोरियाँ, जपा–तपा–मन्नतें, सब करके भी वह उसे न बचा सकी.
- बाहर दुनिया हँस रही है; माँ के भीतर सूना मरुस्थल है. वह स्वीकार करती है: मृत्यु के आगे कोई नहीं, लेकिन ममता फिर भी मानती नहीं—मन बार-बार रो उठता है.
- अंतिम झांक: माँ अपने “खोए हुए” से कहती है—अब कभी मुझे छोड़कर मत जाना; इससे माँ–पुत्र के बंधन की चरम, सार्वभौम अभिव्यक्ति सामने आती है.
केन्द्रीय भाव/संदेश
- मातृत्व बंधन जीवन का सबसे मजबूत संवेदनात्मक रिश्ता है; मृत्यु को समझ लेने पर भी ममता “मन” को समझा नहीं पाती. यह शोक न निजी रहकर सार्वभौम बन जाता है.
भावपक्ष (रसा/संवेदना)
- प्रमुख रस: करुण
- उपरस: शृंगार (ममता के कोमल स्पर्श में), शांति (क्षण-भर की स्वीकार्यता)
- मनोवैज्ञानिक यथार्थ: शोक के चरण—अस्वीकार → स्मृति → अपराध-बोध/असहायता → स्वीकार का ठहरा हुआ दर्द
कलापक्ष (भाषा–शैली–अलंकार)
- भाषा: सरल, प्रवाहमयी, आत्मीय; लोक-वाक्यों/मुहावरों का सहज प्रयोग
- बिंब/प्रतीक: खिलौना (बेटा), छौना (हिरण-शावक-सी चंचलता/कोमलता), गोद/थपकी/लोरी (ममता की क्रियाएँ), पत्थर को देव बनाना (आस्था की पराकाष्ठा)
- अलंकार (उदाहरण):
- रूपक: “खिलौना” (पुत्र के लिए)
- पुनरुक्ति-प्रकाश: “सूना–सूना”, “सहला–सहला”
- अनुप्रास: “हँसती हैं... है”; “मानता है मेरा मन”
- व्यंजना: “पत्थर को भी देव बनाया”—स्थिति की चरम विवशता
- छंद: छंदबद्ध, तुकांत (करुण भाव के अनुकूल धीमा प्रवाह)
प्रतीक और ध्वनियाँ
- घंटों की तरह लौटती लोरियाँ: शांत करने की कोशिश—जो अब असंभव
- “खिलौना”: मासूमियत, लगाव, क्षणभंगुरता
- “दिशाएँ हँसती हैं”: बाहर की दुनिया बनाम भीतर की त्रासदी—द्वंद्व
आज के संदर्भ में महत्व
- शोक का यह बयान निजी होते हुए भी सार्वभौम है; विपदा में भी भाषा की सादगी पाठक को सीधे हृदय तक ले जाती है. यह कविता सहानुभूति और भाव-संयम की सीख देती है.
पद्यांश-वार आशय (संक्षेप)
- “आज दिशाएँ भी हँसती हैं...”
– चारों ओर उल्लास है, पर माँ का “खिलौना” (बेटा) खो गया; बाह्य-उत्सव और भीतर का शोक—कठोर विरोधाभास. - “थपकी दे दे जिसे सुलायी...”
– ममता की स्मृतियाँ: थपकी, लोरी, रातभर जागना; बेटे की सलामती हेतु पूजा–मन्नत—आस्था की चरम हदें. - “फिर भी कोई कुछ न कर सका...”
– मृत्यु-अनिवार्यता; असहाय माँ का टूटा बैठना; “धन” खो गया—यह लौटने वाला नहीं. - “फिर भी रोता ही रहता है...”
– जानते हुए भी मन नहीं मानता; जीवन जटिल–नीरस; एक पल को मिल पाता तो छाती से लगा कर समझाती. - “मेरे भैया, मेरे बेटे...”
– आत्म–सम्बोधन: अब कभी छोड़कर मत जाना; भाई–बहन/पिता भूल सकते हैं, पर “रात-दिन की साथिन” माँ कैसे भूल जाए?
अति-लघु उत्तरीय (15)
- कवयित्री कौन? — सुभद्रा कुमारी चौहान
- रचना-स्रोत? — “मुकुल” (काव्य-संग्रह)
- “खिलौना” किसका बिंब है? — पुत्र
- “छौना” शब्द का संकेत? — शावक-सी चंचलता/भोलेपन का चित्र
- कविता का रस — करुण
- “पत्थर को भी देव बनाया” का भाव — चरम विवशता में आस्था
- माँ के लिए मन समझाना कठिन कब? — पुत्र-मृत्यु पर
- कवयित्री की काव्य-भाषा — सरल, भावसमर्थ, लोक-सुगंधी
- “उल्लास विश्व पर छाया” का अर्थ — सर्वत्र खुशी का वातावरण
- लोरियाँ क्यों? — सुलाने/सांत्वना के लिए
- “खोया धन” कौन? — पुत्र
- “हँसती हैं” पंक्ति में अलंकार — अनुप्रास (ह ध्वनि-संयोग)
- कविता का प्रमुख प्रतीक — खिलौना/छौना
- “रात-दिन की साथिन” किसे कहा? — माँ
- “भाई-बहिन भूल सकते हैं...” का आशय — माँ की स्मृति सबसे अटूट
लघु उत्तरीय (10)
- कवयित्री स्वयं को असहाय क्यों कहती है?
— पुत्र की सलामती हेतु सब उपाय/मन्नत करने पर भी उसे न बचा सकी; नियति के आगे असहाय. - माँ पुत्र के लिए क्या-क्या करती है?
— गोद में रखना, लोरियाँ, रातभर जागना, पूजा–मन्नत, हर दुख-सुख में साया बनना. - “दिशाएँ हँसती हैं” का विरोधाभास क्या दिखाता है?
— संसार की सामान्य गति बनाम व्यक्ति-जीवन का शोक; निजी दुःख का अकेलापन. - “खिलौना” रूपक क्यों प्रभावी है?
— मासूमियत, लगाव और क्षणभंगुरता—तीनों एक साथ व्यंजित. - “पत्थर को भी देव बनाया” से क्या ध्वनि?
— विवश आस्था/ममता की प्रार्थना—हर सीमा का अतिक्रमण. - “मन नहीं मानता”—मनोवैज्ञानिक अर्थ?
— बौद्धिक स्वीकार के बावजूद भावनात्मक अस्वीकार; शोक-चक्र का यथार्थ. - कविता का स्वर कैसा है?
— करुण, आत्मालापी, स्मृतिमय, मर्मस्पर्शी. - “रात-दिन की साथिन”—लोकोक्ति का सार?
— माँ हर क्षण साथ—जन्म से शैशव तक निरंतर सान्निध्य. - “लोरियाँ गाईं”—काव्य-फलक में क्या जोड़ता है?
— पारिवारिक/लोक-संस्कृति का आत्मीय रंग—यथार्थता. - इस कविता की सार्वभौमिकता?
— मातृत्व/शोक—मानव अनुभव का साझा सत्य; समय–स्थान से परे.
दीर्घ उत्तरीय (5)
- “पुत्र-वियोग” का करुण सौंदर्य—विश्लेषण
- मातृत्व की स्मृति-श्रृंखला; भाषा की सादगी; रूपक–प्रतीकों का सटीक प्रयोग; व्यक्तिगत शोक का सार्वभौमिक विस्तार.
- कविता का मनोवैज्ञानिक पक्ष
- शोक-चक्र के चरण, “मन–बुद्धि” का द्वंद्व; अवसाद/अस्वीकार/स्वीकार; आत्मालाप में सांत्वना की खोज.
- मातृत्व के बिंब/प्रतीकों का विवेचन
- गोद, थपकी, लोरी, खिलौना, छौना, शीश नवाना—ममता का लोक-संसार; संवेदना को मूर्त करते हैं.
- भाषा–शैली–अलंकार
- सहज–प्रभावी शैली; रूपक, अनुप्रास, पुनरुक्ति–प्रकाश; बिंबों की ठोसता; छंद–तुक का सधा संगीत.
- “रात-दिन की साथिन माँ...”—इस पंक्ति पर केन्द्रित चर्चा
- माँ–संतान बंधन की महत्ता; पारिवारिक रिश्तों की तुलना; शाश्वतता का बोध.
MCQ (20) — उत्तर अंत में
- “मुकुल”, “त्रिधारा” हैं— A) काव्य-कृतियाँ B) नाटक C) कहानियाँ D) एकांकी
- “पुत्र-वियोग” की कवयित्री— A) महादेवी B) सुभद्रा C) शिवमंगल D) निराला
- “बिखरे मोती” — A) उपन्यास B) कहानी-संग्रह C) संस्मरण D) आलोचना
- “खिलौना” का बिंब— A) पिता B) पुत्र C) भाई D) मित्र
- माँ के लिए मन समझाना कठिन— A) पति-मृत्यु B) पुत्र-मृत्यु C) पिता-मृत्यु D) धन-हानि
- कविता का प्रमुख रस— A) शृंगार B) वीर C) करुण D) हास्य
- “छौना” का अर्थ— A) चिड़िया B) शावक/बालक C) वाद्य D) अन्न
- “पत्थर को देव बनाया”—किसका संकेत? A) विज्ञान B) अविश्वास C) आस्था/विवशता D) विलास
- “लोरियाँ”— A) कथा B) गीत C) निबंध D) संस्मरण
- “उल्लास विश्व पर छाया”— A) व्यक्तिगत दु:ख B) सार्वजनिक खुशी C) भय D) उपहास
- “सूना–सूना”—अलंकार— A) उपमा B) पुनरुक्ति-प्रकाश C) अनुप्रास D) उत्प्रेक्षा
- “खिलौना”—अलंकार— A) रूपक B) अनुप्रास C) मानवीकरण D) सलेश
- “रात–दिन की साथिन”—कौन? A) बहन B) पिता C) माँ D) पड़ोसी
- कविता की भाषा— A) अपभ्रंश B) लोक-सुगंधी सरल हिन्दी C) उर्दू मिश्रित D) संस्कृतनिष्ठ जटिल
- “शीश नवाना”—अर्थ— A) शोर करना B) प्रणाम करना C) रोना D) खेलना
- “मन नहीं मानता”—ध्वनि— A) बौद्धिकता B) जड़ता C) भाव-आवेग D) तर्क
- “दिशाएँ हँसती हैं”— A) उपमा B) मानवीकरण C) रूपक D) श्लेष
- “खोया धन”— A) पैसा B) पुत्र C) कपड़ा D) पुस्तक
- “थपकी”— A) बर्तन B) ललना C) प्यार से थपथपाना D) वस्त्र
- “मुकुल” का अर्थ— A) अंकुर/कली B) पत्र C) तना D) फल
उत्तर: 1-A, 2-B, 3-B, 4-B, 5-B, 6-C, 7-B, 8-C, 9-B, 10-B, 11-B, 12-A, 13-C, 14-B, 15-B, 16-C, 17-B, 18-B, 19-C, 20-A
रिक्त स्थान (15)
- मेरा खोया हुआ … अब तक मेरे पास न आया। — खिलौना
- आज दिशाएँ भी हँसती हैं, है उल्लास … पर छाया। — विश्व
- शीत न लग जाए, इस भय से नहीं … से जिसे उतारा। — गोद
- छोड़ काम दौड़कर आई, … कहकर जिस समय पुकारा। — “माँ”
- … दे दे जिसे सुलाया, जिसके लिए लोरियाँ गाई। — थपकी
- … को भी देव बनाया। — पत्थर
- कहीं नारियल, दूध, … — बताशे
- फिर भी कोई … न कर सका। — कुछ
- छिन ही गया … मेरा। — खिलौना/धन
- … रहे हैं विकल प्राण ये। — तड़प
- बड़ा … नीरस लगता है। — जटिल
- …-भर को उसको पा जाती। — पल
- … से लगा प्यार से सर सहला सहला उसको समझाती। — जी
- “रात–दिन की … माँ”— — साथिन
- माँ को … छोड़ न जाना। — यों
सत्य/असत्य (10)
- कविता का केन्द्रीय रस वीर है। — असत्य
- “खिलौना” पुत्र का रूपक है। — सत्य
- कवयित्री पूजा–मन्नत की बात नहीं करती। — असत्य
- “मन नहीं मानता”—शोक का मनोवैज्ञानिक सत्य है। — सत्य
- “रात-दिन की साथिन”—पिता कहा गया है। — असत्य
- भाषा जटिल और अलंकार-प्रधान है। — असत्य (सरल, प्रभावी)
- कवयित्री मृत्यु की अनिवार्यता स्वीकार करती है। — सत्य
- “उल्लास विश्व पर छाया”—माँ के भीतर का उल्लास है। — असत्य (बाहरी)
- “सूना–सूना”—पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार है। — सत्य
- “छौना” = शावक/बालक—ममता का संबोधन। — सत्य
मिलान (10)
A) खिलौना — (iv) पुत्र का रूपक
B) छौना — (viii) शावक/भोला-चंचल
C) लोरी — (ii) सुलाने का गीत
D) गोद — (ix) ममता/आश्रय
E) पत्थर को देव — (i) विवश आस्था
F) शीश नवाना — (vi) प्रणाम/भक्ति
G) दिशाएँ हँसती — (x) बाहरी उल्लास
H) खोया धन — (iii) पुत्र
I) सूना–सूना — (v) पुनरुक्ति-प्रकाश
J) मन नहीं मानता — (vii) भाव–बुद्धि द्वंद्व
भाषा की बात — अभ्यास
- सर्वनाम (उदाहरण)
- मेरा, मेरे, जिसे, तुम्हें—सर्वनाम
- ‘ता’ प्रत्यय वाले शब्द
- मानवता, आवश्यकता, सरलता, दानवता, मनुष्यता, वास्तविकता
- विलोम
- मलिनता–स्वच्छता, देव–दानव, असहाय–समर्थ, जटिल–सरल, नीरस–सरस, कठिन–सरल, विकल–अविकल
- मुहावरे (वाक्य सहित)
- आँखों में रात बिताना: माँ ने बेटे के लिए आँखों में रात बिताई.
- शीश नवाना: मंदिर में शीश नवाया.
- समानार्थी
- गोद—अंक; छौना—शावक/बालक; बहन—भगिनी; विश्व—जगत/संसार; दूध—पय/सुधा
- सन्धि–विच्छेद/व्युत्पत्ति
- उल्लास = उत् + लास (व्युत्पत्ति-आधारित विग्रह)
- संसार = सम् + सार (व्युत्पत्तिगत संकेत)
- अलंकार पहचान
- “सूना–सूना”, “सहला–सहला”—पुनरुक्ति-प्रकाश
- “दिशाएँ हँसती हैं”—मानवीकरण
- “खिलौना”—रूपक
लिखने के छोटे टिप्स (एग्ज़ाम-हैक)
- 2–3 पंक्तियों में केंद्रीय भाव लिखो, फिर 3–4 बिंदु मातृत्व-बिंब/अलंकार/भाषा के, और अंत में 1 पंक्ति “सार्वभौमिकता” की—उत्तर दमदार लगेगा.
- पद्यांश-व्याख्या में: प्रसंग → व्याख्या → विशेष (रस/अलंकार/भाषा)—यही क्रम रखो.
- उद्धरण चुनिंदा: “मेरा खोया हुआ खिलौना…”, “रात–दिन की साथिन माँ…”—इनको उद्धृत करो.