एक लेख और एक पत्र — बड़े, आसान, परीक्षा-तैयार नोट्स
रचना-परिचय
- लेखक: शहीद-ए-आज़म भगत सिंह (1907–1931)
- अध्याय में क्या है:
- “एक लेख” = विद्यार्थी और राजनीति (छात्रों की राजनीति-भागीदारी पर तर्क)
- “एक पत्र” = जेल से वैचारिक पत्र (आत्महत्या, कष्ट-सहन, आदर्श मृत्यु, औचित्य, रूसी साहित्य—इन पर साफ़ बातें)
- केंद्रीय स्वर: वैचारिक स्पष्टता, राष्ट्र-सेवा, सामाजिक न्याय, क्रांतिकारी अनुशासन
लेखक की वैचारिक पृष्ठभूमि (संक्षेप)
- प्रभाव: करतार सिंह सराभा, ग़दर पार्टी, रूस की क्रांति, मार्क्स/लेनिन, गणेश शंकर विद्यार्थी
- संगठन: नौजवान भारत सभा (1926), हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)
- प्रमुख घटनाएँ: जालियाँवाला बाग की मिट्टी (संकल्प), असेम्बली बम (1929—बिना जनहानि), लाहौर षड्यंत्र केस (1931—फाँसी)
कथ्य-सार (बहुत सरल)
- “विद्यार्थी और राजनीति”: छात्र देश के भावी कर्णधार हैं; राजनीति केवल सत्ता-लड़ाई नहीं, बल्कि भूख-महंगाई-अन्याय-शिक्षा-रोज़गार—सबकी चिंता है। छात्रों को सोचना-सिखना-भाग लेना होगा, तभी भविष्य संभलेगा।
- “जेल से पत्र”: आत्महत्या कायरता है; संघर्ष में दी गई शहादत “सुंदर/आदर्श” मृत्यु है। विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाती हैं; औचित्य के साथ विधियों का उल्लंघन न्यायपूर्ण हो सकता है; रूसी साहित्य से कष्ट-सहन की शिक्षा मिलती है।
केंद्रिय विचार (10 पंक्तियों में)
- छात्र राजनीति से दूर रखने की सलाह औपनिवेशिक षड्यंत्र थी; छात्र जागेंगे तो शासन की नींव हिलेगी।
- राजनीति = लोक-जीवन के प्रश्नों पर सक्रिय भागीदारी।
- नैतिक अनुशासन: गलत कानूनों का प्रतिरोध हो, पर जनता-हित और औचित्य सर्वोपरि।
- आत्महत्या = पलायन; शहादत = आदर्श—जब उद्देश्य मानव-मुक्ति/राष्ट्रीय स्वराज हो।
- संघर्ष में कष्ट सहना ही चरित्र-निर्माण है; “विपत्ति व्यक्ति को पूर्ण बनाती है।”
- समय की जरूरत नेता नहीं, समर्पित कार्यकर्ता हैं—तन-मन-धन समर्पित करने वाले।
- लक्ष्य-निष्ठा: “व्यक्ति नहीं, देश/समाज की वरीयता”—जब राष्ट्र का निर्णय हो, व्यक्तिगत स्वार्थ गौण।
- क्रांति विचारों की धार से—सिर्फ हिंसा नहीं, अन्याय-व्यवस्था का वैकल्पिक नैतिक प्रतिरोध।
प्रमुख तर्क—विद्यार्थी और राजनीति
- क्यों भाग लें?
- भविष्य की बागडोर उनके हाथ; अभी से समझेंगे तो कल निर्णय कर पाएँगे।
- राजनीति से दूरी = समस्याओं से दूरी (रोज़गार, शिक्षा, न्याय—सब राजनीति से तय होते हैं)।
- कैसे भाग लें?
- अध्ययन+जागरूकता+बहस+लोक-कार्य (रिलीफ़, श्रमिक/किसान मुद्दे), शांतिपूर्ण जन-भागीदारी
- परीक्षा-समय में प्राथमिकता पढ़ाई को—अनुशासन बना रहे (संतुलन)
प्रमुख तर्क—जेल का पत्र (आत्महत्या/कष्ट/औचित्य)
- आत्महत्या कायरता क्यों?
- दुख से भागना—एक क्षण में अर्जित मूल्य खोना; इससे मानवता/आदर्श की सेवा नहीं होती।
- “सुंदर/आदर्श मृत्यु” क्या?
- जब जन-आंदोलन अपने चरम पर हो और देश के हित में शहादत प्रेरक बने—ऐसी मृत्यु आदर्श।
- “औचित्य” का नियम:
- अन्यायपूर्ण कानून/व्यवस्था का विरोध न्यायपूर्ण है—पर साधन भी न्यायपूर्ण/जनहितकारी हों।
- रूसी साहित्य क्यों महत्त्वपूर्ण?
- दुख/विपत्ति-सहन की आचार-शक्ति देता है; चरित्र की ऊँचाई—यहीं से आती है।
- क्रांतिकारी का आचार-संहिता:
- कष्ट सहकर भी लक्ष्य-निष्ठ; सजा हो तो हँसते-हँसते स्वीकार; “दूसरे करेंगे” कहकर दायित्व मत टालो।
भाषा-शैली/कला-पक्ष
- शैली: तर्कप्रधान, अनुशासित, व्यावहारिक; वाक्य-ऊर्जा, नैतिक आग्रह, उदाहरण-समर्थित
- उपकरण: युक्ति-तर्क (लॉजिक), विरोधाभास-उद्घाटन, संदर्भ (रूस/अदालत/जेल)
- स्वर: आवेग नहीं—स्पष्ट विवेक; क्रोध नहीं—दृढ़ता
उद्धरण (उत्तर में चमक बढ़ाने के लिए)
- “विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाने वाली होती हैं।”
- “जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो, तो व्यक्तियों के भाग्य को भुला देना चाहिए।”
- “आत्महत्या कायरता है; संघर्ष में शहादत आदर्श मृत्यु है।”
- “औचित्य का ध्यान रखकर विधियों का उल्लंघन न्यायपूर्ण है।”
अति-लघु उत्तरीय (15)
- “एक लेख और एक पत्र” के लेखक — भगत सिंह
- “सुंदर मृत्यु” किसे कहा? — देश-सेवा/आदर्श हेतु शहादत (फाँसी)
- आत्महत्या पर विचार — कायरता/पलायन
- छात्र-राजनीति पर रुख — छात्रों को भाग लेना चाहिए
- आदर्श क्रांतिकारी का गुण — कष्ट-सहन, औचित्य, अनुशासन
- औचित्य का अर्थ — साधनों/विधियों का न्यायपूर्ण होना
- संगठन (1926) — नौजवान भारत सभा
- असरदार साहित्य — रूसी साहित्य (कष्ट-सहन की शिक्षा)
- असेम्बली बम का उद्देश्य — संदेश/प्रतिरोध (बिना जनहानि)
- फाँसी की तिथि — 23 मार्च 1931
- केस — लाहौर षड्यंत्र केस
- प्रारम्भिक शिक्षा — लाहौर/नेशनल कॉलेज (F.A.)
- पारिवारिक पृष्ठभूमि — संपूर्ण परिवार स्वाधीनता-सेनानी
- आदर्श पुरुष — करतार सिंह सराभा
- छात्र क्यों? — भावी कर्णधार, नीति-निर्णयों के समझदार नागरिक
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ — 25)
- “एक लेख और एक पत्र” के लेखक —
A) नेहरू B) सुभाष C) भगत सिंह D) सावरकर - “सुंदर मृत्यु” का आशय —
A) दुर्घटना B) आत्महत्या C) शहादत D) बीमारी - “आत्महत्या” पर भगत सिंह —
A) साहस B) कायरता C) वीरता D) आवश्यकता - छात्र-राजनीति पर ब्रिटिश राय —
A) बढ़ाओ B) तटस्थ C) दूर रखो D) अनिवार्य करो - छात्र राजनीति में क्यों?
A) समय कटे B) भविष्य-निर्माण C) मनोरंजन D) नौकरी की गारंटी - औचित्य का तात्पर्य —
A) लाभ B) जन-हित/न्याय C) भय D) बहुमत - “विपत्तियाँ … बनाती हैं।”
A) गरीब B) सफल C) पूर्ण D) कायर - पसंदीदा साहित्य —
A) रोमांस B) रूसी यथार्थ C) पुराण D) फिक्शन - भगत सिंह का जन-आंदोलन दृष्टिकोण —
A) अराजकता B) अनुषासन/औचित्य C) स्वार्थ D) पलायन - HSRA के साथी —
A) चंद्रशेखर आज़ाद B) गाँधी C) तिलक D) गोखले - “नौजवान भारत सभा” स्थापना —
A) 1923 B) 1926 C) 1928 D) 1930 - असेम्बली बम (साल) —
A) 1927 B) 1929 C) 1931 D) 1934 - फाँसी का केस —
A) दिल्ली-षड्यंत्र B) लाहौर-षड्यंत्र C) काकोरी D) मीटर-गेज - “छात्र = …”
A) मतदाता B) भावी कर्णधार C) दर्शक D) उदासीन - आत्महत्या क्यों गलत?
A) जल्दी है B) मूल्य खोना C) कानून D) फैशन - शहादत कब “सुंदर”?
A) निजी लाभ B) जन-हित/आंदोलन-चरम C) राजनीतिक लाभ D) प्रचार - जब देश का भाग्य तय हो रहा हो…
A) अपने लाभ देखो B) पढ़ाई करो C) व्यक्तियों का भाग्य भूलो D) कुछ नहीं - रूसी साहित्य से शिक्षा —
A) सुखप्रधानता B) पलायन C) कष्ट-सहन/चरित्र D) उपहास - “औचित्य” के साथ “विधि उल्लंघन” —
A) अन्याय B) न्यायपूर्ण प्रतिरोध C) अपराध D) स्वार्थ - छात्र-भागीदारी का ढंग —
A) हिंसा B) संतुलन/जागरूकता C) परीक्षा छोड़ना D) अफवाह - भगत सिंह का कॉलेज —
A) नेशनल कॉलेज, लाहौर B) हिंदू कॉलेज C) विलिंगडन D) अलीगढ़ - फाँसी का वर्ष —
A) 1929 B) 1931 C) 1935 D) 1942 - जलियाँवाला बाग का असर —
A) प्रभावहीन B) पलायन C) संकल्प/मिट्टी उठाना D) उदासीनता - पत्र का स्वर —
A) भावुक B) तर्कप्रधान/विवेकपूर्ण C) व्यंग्य D) हल्का-फुल्का - “क्रांति” उनके अनुसार —
A) हिंसा-प्रधान B) विचार-प्रधान/अन्याय-प्रतिरोध C) महज़ सत्ता D) दंगा
उत्तर: 1-C, 2-C, 3-B, 4-C, 5-B, 6-B, 7-C, 8-B, 9-B, 10-A, 11-B, 12-B, 13-B, 14-B, 15-B, 16-B, 17-C, 18-C, 19-B, 20-B, 21-A, 22-B, 23-C, 24-B, 25-B
रिक्त स्थान (15)
- भगत सिंह का जन्म … को हुआ — 28 सितम्बर 1907
- पैतृक गाँव … (पंजाब) — खटकड़कलाँ
- पिता का नाम — सरदार किशन सिंह
- “लाहौर … केस” में फाँसी — षड्यंत्र
- … कॉलेज, लाहौर से F.A. — नेशनल
- 1926 में बनाया संगठन — नौजवान भारत सभा
- “सुंदर मृत्यु” = देश-हित में … — शहादत/फाँसी
- आत्महत्या = … — कायरता
- “विपत्तियाँ … बनाती हैं।” — पूर्ण
- छात्र = देश के भावी … — कर्णधार
- “औचित्य” = साधनों का … होना — न्यायपूर्ण
- पसंदीदा साहित्य — … (देश: रूस) — रूसी
- असेम्बली बम (बिना …) — जनहानि
- शहादत का समय—आंदोलन की … — चरम सीमा
- केस का शहर — … — लाहौर
सत्य/असत्य (12)
- छात्र-राजनीति से दूर रहना चाहिए — असत्य
- आत्महत्या आदर्श मृत्यु है — असत्य
- शहादत तब सुंदर है जब जन-हित सर्वोपरि — सत्य
- औचित्य के बिना विधि-उल्लंघन भी उचित — असत्य
- रूसी साहित्य दुःख-सहन की प्रेरणा देता है — सत्य
- “जब देश का भाग्य तय हो”—व्यक्ति-हित पहले — असत्य
- HSRA = भगत/आज़ाद का संगठन — सत्य
- भगत सिंह 1941 में गदर पार्टी से जुड़े — असत्य (वे 1931 में शहीद हुए)
- जालियाँवाला बाग ने उन्हें विचलित/संकल्पित किया — सत्य
- पत्र का स्वर भावुक-प्रधान — असत्य (तर्कप्रधान)
- विद्यार्थी सिर्फ परीक्षा-केन्द्रित रहें — असत्य
- “क्रांति” = सशस्त्र हिंसा ही — असत्य
मिलान (10)
A) करतार सिंह — (i) आदर्श/प्रेरणा
B) गदर पार्टी — (ii) प्रवासी क्रांतिकारी आंदोलन
C) HSRA — (iii) आज़ाद–भगत का संगठन
D) Naujawan Sabha — (iv) 1926, युवा संगठन
E) असेम्बली बम — (v) 1929, संदेशात्मक प्रतिरोध
F) लाहौर केस — (vi) 1931, फाँसी
G) “औचित्य” — (vii) न्यायपूर्ण साधन
H) “सुंदर मृत्यु” — (viii) जन-हित में शहादत
I) रूसी साहित्य — (ix) कष्ट-सहन/चरित्र-निर्माण
J) विद्यार्थी — (x) भावी कर्णधार
लघु उत्तरीय (10)
- छात्र राजनीति से दूर क्यों नहीं रहना चाहिए?
— क्योंकि राजनीति ही लोक-जीवन का निर्णय-मंच है; छात्र भविष्य के नीति-निर्माता हैं। - “औचित्य” का नियम क्या कहता है?
— विरोध न्यायपूर्ण हो; साधन/विधि जन-हितकारी/नैतिक हों। - आत्महत्या को कायरता क्यों?
— दुख से पलायन; अर्जित मूल्य नष्ट; समाजहित की सेवा नहीं। - “सुंदर मृत्यु” कब?
— जब शहादत जन-आंदोलन को धार दे और देशहित सर्वोपरि हो। - रूसी साहित्य क्यों पसंद?
— यथार्थ/दुःख-सहन/चरित्र-ऊँचाई के कारण प्रेरक। - क्रांतिकारी की आचार-संहिता?
— कष्ट-सहन, औचित्य, अनुशासन, जन-हित, दायित्व-स्वीकार। - “जब देश का भाग्य तय हो…”—मतलब?
— निजी लाभ भूलकर राष्ट्रीय हित को प्रधानता। - “राजनीति” का आशय उनके लिए?
— जन-जीवन के प्रश्नों पर सक्रिय भागीदारी। - असेम्बली बम का उद्देश्य?
— चेतावनी/प्रतिरोध—बिना जनहानि। - “क्रांति” उनके अनुसार?
— अन्याय-व्यवस्था का वैचारिक/नैतिक प्रतिरोध और रूपांतरण।
दीर्घ उत्तरीय (6) — मॉडल-बिंदु
- विद्यार्थी और राजनीति—भगत सिंह का दृष्टिकोण
- छात्र = भविष्य; राजनीति = जनता के प्रश्न; भागीदारी = अध्ययन+जागरूकता+लोक-कार्य; औपनिवेशिक “दूर रहो” का खंडन।
- आत्महत्या बनाम शहादत
- आत्महत्या = कायरता/पलायन; शहादत = जन-हित में आदर्श मृत्यु; उदाहरण—स्वयं की फाँसी को “सुंदर” कहने का तर्क।
- औचित्य का सिद्धांत
- न्यायपूर्ण साधन; जनहित; रूस/जारशाही का उदाहरण; प्रतिरोध हो पर नियम-सम्मत नैतिकता।
- रूसी साहित्य और कष्ट-सहन
- चरित्र-निर्माण; दुःख-सहन से ऊँचाई; भारतीय संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता।
- क्रांतिकारी की नैतिकता/अनुशासन
- जिम्मेदारी टालना नहीं; कष्ट/सजा स्वीकार; लक्ष्य-निष्ठा—इसी से जन-विश्वास।
- आज के भारत में इस पाठ की प्रासंगिकता
- छात्र-भागीदारी, नागरिक नैतिकता, वैचारिक स्पष्टता, जन-हित सर्वोपरि—लोकतंत्र की आत्मा।
प्रसंग/आशय स्पष्ट (5)
- “विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाने वाली होती हैं।”
— दुख-संघर्ष से ही धैर्य/कौशल/चरित्र बनता है; पलायन नहीं, सामना करो। - “जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो…”
— निजी हित पीछे; सार्वजनिक/राष्ट्रीय हित सर्वोपरि। - “आत्महत्या कायरता है।”
— पलायन; मूल्य-हानि; समाजहित की सेवा शून्य। - “औचित्य का ध्यान रखकर विधियों का उल्लंघन…”
— अन्यायपूर्ण कानून का नैतिक प्रतिरोध—जन-हित में न्यायोचित। - “हम तो केवल अपने समय की आवश्यकता की उपज हैं।”
— नायक को परिस्थितियाँ जन्म देती हैं; व्यक्ति से बड़ा समय/आवश्यकताएँ।
भाषा की बात — अभ्यास
- प्रत्यय पहचान
- कायर-ता, घृण-ित, पूर्ण-तया, दय-नीय, स्पृह-णीय, वास्तविक-ता, पारितोष-िक
- “आस्पद” प्रत्यय से शब्द
- हास्यास्पद, विवादास्पद, संदेहास्पद, घृणास्पद, प्रेरणास्पद
- संज्ञा पदबंध छाँटिए
- “राजनीतिक बंदियों की दशा” / “कुछ मुट्ठी भर कार्यकर्ता” / “साम्यवाद का जन्मदाता मार्क्स”
- पर्यायवाची
- वफादारी: निष्ठा/विश्वसनीयता; विद्यार्थी: छात्र; फायदेमंद: लाभदायक; खुशामद: मिन्नत/चापलूसी; दुनियादारी: सांसारिकता; अत्याचार: अन्याय; प्रतीक्षा: इंतजार; किंचित्: कुछ/थोड़ा
- विलोम
- सयाना–मूर्ख, उत्तर–प्रश्न, निर्बलता–सबलता, व्यवहार–सिद्धांत, स्वाध्याय–अध्यापन, वास्तविक–अवास्तविक, अकारण–कारण
- अव्यय/कारक/संयुक्त क्रिया (उदाहरण)
- अव्यय: भी, ही, केवल, परंतु, किन्तु, इसलिए
- कारक-चिह्न: ने (कर्ता), को/के लिए (सम्प्रदान), से (अपादान/करण), में/पर (अधिकरण), का/के/की (सम्बन्ध)
- संयुक्त क्रिया: सहन करना, हिस्सा लेना, पालन करना, त्याग देना, स्वीकार करना
लेखक-परिचय (संक्षेप)
- भगत सिंह (1907–1931): शहीद-ए-आज़म; परिवार स्वाधीनता-संग्राम में सक्रिय; नेशनल कॉलेज, लाहौर; 1926—नौजवान भारत सभा; HSRA में आज़ाद के साथ; 1929—असेम्बली बम (बिना जनहानि); 1931—लाहौर केस में फाँसी। लेखक के रूप में—तेज़, तर्कप्रधान, समाजवादी चेतना; प्रमुख लेख: विद्यार्थी और राजनीति, मैं नास्तिक क्यों हूँ, बम का दर्शन इत्यादि।
रेपिड रिविजन (4 पंक्तियाँ)
- छात्र राजनीति से क्यों? — क्योंकि वे भविष्य के नीति-निर्माता हैं; राजनीति = लोक-जीवन के प्रश्न।
- आत्महत्या vs शहादत — पलायन vs आदर्श मृत्यु (जन-हित में)।
- औचित्य — साधन/विधि न्यायपूर्ण/जन-हितकारी हो।
- विपत्ति — चरित्र/कौशल/धैर्य का विद्यालय; पलायन नहीं, सामना।