रोज — पूरे, सरल, परीक्षा-तैयार नोट्स
कहानी क्या कहती है? (सीधी भाषा में)
- यह कहानी एक पहाड़ी कस्बे के घर में “रोज-रोज” की एकरस, यांत्रिक दिनचर्या और उससे पैदा हुई ऊब/खामोशी को पकड़ती है।
- कथावाचक (रिश्ते का भाई) सालों बाद मालती के घर आता है। बचपन में चंचल/उद्धत मालती अब शांत, बुझी हुई, यंत्रवत गृहिणी दिखती है।
- पति महेश्वर डॉक्टर है—सुबह-शाम डिस्पेंसरी; बीच में थोड़ा खाना/आराम—वही रोज का ढर्रा।
- घर में पानी देर से आता है; नौकर नहीं; बर्तन-मांजना, बच्चे को सँभालना, दरकते वक्त से जूझना—सब रोज का।
- “तीन बज गए”, “चार बज गए”, “ग्यारह बज गए”—घंटे गिनना मालती की मनःस्थिति है: समय पहाड़-सा भारी।
- डॉक्टर के पेशे में “गैंग्रीन” रोज का केस—काँटा-चुभना, घाव सड़ना, टांग काटना—जिंदगी की सड़ांध का प्रतीक।
- रात को आम लाने के साथ जो अखबार का टुकड़ा आता है, मालती उसे पढ़ने में डूब जाती है—अपनी सीमित दुनिया से बाहर झाँकने की छोटी-सी खिड़की।
कहानी का मर्म
- रोजमर्रा की एकरसता आत्मा को सुन्न कर देती है; लेकिन मन में एक छोटी लौ—जिज्ञासा/जीवनेच्छा—अब भी टिमटिमा रही है (अखबार का टुकड़ा)।
- अज्ञेय की शैली अंतर्मुखी, सूक्ष्म, प्रतीकात्मक है: “रोज” शब्द, घंटाघर की ध्वनियाँ, गैंग्रीन, सूखे चीड़—सब भीतर की स्थिति बताते हैं।
मुख्य पात्र/सेटिंग
- मालती: नायिका; बचपन से उच्छृंखल/चंचल—अब शांत, जिम्मेदार, भाव-रहित दिखती, पर भीतर जिज्ञासा जीवित।
- महेश्वर: पति/डॉक्टर; यांत्रिक ड्यूटी; थकान/ऊब का चेहरा; “गैंग्रीन” के रोजाना केस।
- बच्चा (टिटी): बार-बार गिरता/रोता—घर की अव्यवस्था/माँ की मजबूर दिनचर्या का दर्पण।
- कथावाचक: दूर का भाई; मालती की “पहले की वह” और “अब की यह” के बीच का पुल।
- जगह: पहाड़ी कस्बा—शांति है, पर घर के भीतर खामोशी/ऊब की छाया।
थीम/विचार-प्रतीक
- रोज (प्रतिदिन): एकरसता/यंत्रणा का की-वर्ड; हर जगह गूँजता है।
- घंटाघर की खड़खड़ाहट: समय का बोझ; हर घंटे के बाद “थोड़ी राहत”।
- गैंग्रीन: जीवन की उपेक्षा/अनास्था से जन्मा सड़न-रोग; घरेलू जीवन की सड़ांध का रूपक।
- अख़बार का टुकड़ा: दुनिया से संवाद की प्यास; जिजीविषा का चिन्ह।
- सूखे चीड़/मटमैला रंग: नीरसता; “कोमल राग पर करुण/उद्वेग नहीं”—समझौता-भरा संतुलन।
क्यों इसे “गैंग्रीन” के नाम से भी जाना गया?
- डॉक्टर-पति के अभ्यास में “गैंग्रीन” रोज का रोग—कँटीली चोट छोड़ देने से घाव सड़ना, अंग काटना। कथा में यह घर-परिवार के भीतर की धीरे-धीरे जमती सड़ांध/घुटन का प्रतीक है—उपेक्षा का परिणाम, जो अंततः “कटाव” तक ले जा सकता है।
अति-लघु उत्तरीय (12)
- लेखक — अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन)
- अज्ञेय का जन्म — 7 मार्च 1911, कसेया (कुशीनगर), उ.प्र.
- अज्ञेय मूलतः — कवि; साथ ही कथाकार/निबंधकार/पत्रकार
- “रोज” किस नाम से भी चर्चित — गैंग्रीन
- मालती के पति — महेश्वर (डॉक्टर)
- बच्चा — टिटी (दुर्बल/चिड़चिड़ा)
- “तीन/चार/ग्यारह बज गए” का संकेत — समय-गिनती/एकरसता का बोझ
- गैंग्रीन — घाव की सड़न; देर से इलाज में अंग काटना पड़ता है
- “रोज” की सेटिंग — पहाड़ी कस्बा
- कथावाचक का रिश्ता — दूर का भाई/मित्रवत
- “अख़बार का टुकड़ा” — मालती की जिज्ञासा/जिजीविषा
- अज्ञेय को — भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार
वस्तुनिष्ठ (MCQ — 15) उत्तर अंत में
- ‘रोज’ के लेखक — A) नामवर B) अज्ञेय C) मोहन राकेश D) उदय प्रकाश
- जन्म-तिथि — A) 7 मार्च 1911 B) 8 जनवरी 1910 C) 9 मार्च 1909 D) 7 मार्च 1908
- अज्ञेय को हिन्दी के अलावा किस भाषा का खास ज्ञान था? — A) उर्दू B) संस्कृत C) सिंहली D) फ्रेंच
- अज्ञेय की अभिरुचि — A) बागवानी B) पर्यटन C) अध्ययन D) उपर्युक्त सभी
- अज्ञेय को मिला — A) राजेन्द्र पुरस्कार B) पद्मश्री C) ज्ञानपीठ D) अर्जुन
- मालती के पति — A) महेश B) महेश्वर C) महेशचन्द्र D) महीपाल
- “रोज” का प्रमुख प्रतीक — A) तेज़ आँधी B) गैंग्रीन C) लोहे की रेल D) रेडियो
- “तीन/चार/ग्यारह बज गए” — A) मौसम B) कैलेंडर C) घंटाघर/समय-गिनती D) अलार्म
- कहानी का स्पेस — A) महानगर B) समुद्र-तट C) पहाड़ी कस्बा D) रेगिस्तान
- ‘रोज’ का टोन — A) हास्य B) करुण–नीरसता C) वीररस D) अद्भुत
- कथाशिल्प — A) लंबा उपन्यास B) संस्मरण C) अंतर्मुखी लघुकथा D) नाटक
- बच्चे का रोल — A) कॉमिक रिलीफ B) प्रतीक—अव्यवस्था/ममता C) विरोधी D) कथाकार
- “रोज” में बार-बार आता शब्द — A) आज B) अभी C) रोज D) कभी
- “अख़बार का टुकड़ा” — A) गंदगी B) खिलौना C) बाहरी दुनिया की खिड़की D) औज़ार
- अज्ञेय का स्वभाव — A) बहिर्मुखी B) अंतर्मुखी C) प्रहसनकार D) वाचाल
उत्तर: 1-B, 2-A, 3-B, 4-D, 5-C, 6-B, 7-B, 8-C, 9-C, 10-B, 11-C, 12-B, 13-C, 14-C, 15-B
रिक्त स्थान (10)
- मालती के पति का नाम … — महेश्वर
- अज्ञेय का जन्म-स्थान कसेया … में — कुशीनगर (उ.प्र.)
- अज्ञेय के पिताजी … शास्त्री थे — पं. हीरानंद
- अज्ञेय ने … में मैट्रिक पास की — 1925 ई.
- अज्ञेय का स्वभाव — एकांतप्रिय/अंतर्मुखी
- उनका व्यक्तित्व — सुंदर, लंबा, गठीला
- “रोज” कहानी में … रोग प्रतीकात्मक है — गैंग्रीन
- बच्चा बार-बार पलंग से … — गिर पड़ता है
- घंटाघर की ध्वनि — “तीन/चार/… … बज गए” — समय-गिनती
- मालती को … का टुकड़ा मिलते ही वह पढ़ने लगी — अख़बार
सत्य/असत्य (10)
- “रोज” हँसी–मज़ाक की कहानी है। — असत्य
- महेश्वर डॉक्टर है और रोज का एक जैसा रूटीन है। — सत्य
- गैंग्रीन—अमीरों की फ़ुर्सत की बीमारी है। — असत्य
- घंटाघर की खड़खड़ाहट—मालती के “समय-बोध” की प्रतीक है। — सत्य
- मालती को अख़बार से कोई दिलचस्पी नहीं। — असत्य
- कथाकार मालती का बड़ा भाई है—कठोर अनुशासन वाला। — असत्य (दूर का भाई/मित्रवत)
- अज्ञेय को ज्ञानपीठ मिला। — सत्य
- कहानी महानगर में घटती है। — असत्य
- मालती बचपन में पढ़ाई में तेज थी। — असत्य (किताब के पन्ने फाड़ने की स्मृति)
- “रोज” में भाषा सहज, संवादप्रधान और प्रतीकात्मक है। — सत्य
मिलान (8)
A) मालती — (i) गृहिणी/जीवनेच्छा
B) महेश्वर — (ii) डॉक्टर/गैंग्रीन-केस
C) टिटी — (iii) बच्चा/रोना–गिरना
D) कथावाचक — (iv) दूर का भाई
E) घंटाघर — (v) समय-गिनती/ऊब
F) अख़बार — (vi) बाहरी दुनिया
G) पहाड़ी कस्बा — (vii) शांत–नीरस सेटिंग
H) “रोज” — (viii) एकरसता/यंत्रणा
लघु उत्तरीय (8)
- मालती के घर का माहौल कैसा?
— औपचारिकता, खामोशी, ऊब; अपनापन/उत्साह कम; काम–काम–काम, पानी/नौकर की कमी—यांत्रिक जीवन। - “शाप की छाया” से क्या तात्पर्य?
— घर में प्रेम/उत्साह का अभाव; ऊब/नीरसता; संबंधों का निर्जीव हो जाना—कथावाचक भी उसके प्रभाव में सुन्न-सा। - लेखक–मालती का संबंध?
— दूर का भाई; पर बचपन से दोस्त-जैसा; साथ खेलना/लड़ना/पढ़ना—मित्रवत निकटता। - महेश्वर की छवि?
— मेहनती पर थका/यांत्रिक आदमी; रोज-का-ढर्रा; गैंग्रीन के केस—पेशे से पस्त। - “गैंग्रीन” क्या है?
— घाव की सड़न; देर से इलाज = अंग काटना; कहानी में उपेक्षा-जन्य सड़ांध का प्रतीक। - “तीन/चार/ग्यारह बज गए” का संबंध मालती से?
— घंटे गिनना = समय काटना; हर घंटे के बाद छोटी-सी राहत—फिर वही बोझ। - “सूखे चीड़—कोमल राग, करुण/उद्वेग नहीं”?
— वातावरण/जीवन का रूपक: नीरसता के बीच भी एक “कम-तीव्र” कोमलता—समझौते की शांति। - अख़बार के टुकड़े पर मालती का लट्टू होना क्यों?
— अपनी सीमित दुनिया से बाहर देखने की प्यास; जिजीविषा/जिज्ञासा अब भी जीवित।
दीर्घ उत्तरीय (3) — लिखने का टेम्पलेट
- “रोज” का केन्द्रीय विचार और प्रतीक-योजना
- एकरस दिनचर्या = ऊब; घंटाघर/गैंग्रीन/सूखे चीड़/अख़बार—सब प्रतीक हैं।
- निहित संदेश: घुटन के बीच भी जिजीविषा को थामे रखना—और समाज/परिवार को यह समझना कि “रोज” की जंजीरें ढीली करना जरूरी है।
- मालती का चरित्र-चित्रण
- पहले/अब का अंतर; गृह-कर्तव्य में दक्ष, पर भीतर सूखता मन; बच्चा+घर = दिन भर का बोझ; फिर भी जिज्ञासा (अख़बार) जीवित—यही उसका सौंदर्य।
- अज्ञेय की शैली
- अंतर्मुखी, प्रतीकप्रधान, प्रकृति-संवेदना, संवाद-संक्षेप, भीतर की उलझनों का सूक्ष्म अंकन; भाषा—सरल पर सधी हुई।
भाषा की बात — अभ्यास (सुधार सहित)
- “मय” प्रत्यय वाले पाँच शब्द
- जलमय, दयामय, ज्ञानमय, भक्तिमय, शान्तिमय
- कारक-चिह्न (सही भेद सहित)
- “थोड़ी देर में आ जाएँगे।” — में = अधिकरण (काल)
- “मैं कमरे के चारों तरफ देखने लगा।” — के = सम्बन्ध; “के चारों तरफ” = परसर्गीय समास
- “हम बचपन से इकट्ठे खेले हैं।” — से = अपादान (काल-आरम्भ/उत्पत्ति-बिंदु)
- “तभी किसी ने किवाड़ खटखटाए।” — ने = कर्ता
- “शाम को एक-दो घंटे फिर चक्कर लगाने के लिए जाते हैं।” — को = अधिकरण (काल); “के लिए” = सम्प्रदान/अभिप्राय
- “एक छोटे क्षण भर के लिए मैं स्तब्ध हो गया।” — “के लिए” = सम्प्रदान/अभिप्राय
- संयुक्त क्रिया (पाठ-रूप वाली) के उदाहरण
- उठकर बैठ गया; ले आया; दे दिया; चिल्लाने लगा; चला गया
- अव्यय छाँटना
- “तो, पर, यद्यपि, भी, ही, हीं”—ये अव्यय हैं (रूप नहीं बदलते)
- ‘पूस की रात’ बनाम ‘रोज’—शैली-अंतर (संक्षेप)
- ‘पूस की रात’: ग्रामीण परिवेश; देशज शब्दावली; सीधी कथन-शैली; सामाजिक यथार्थ का खुला चित्रण।
- ‘रोज’: शहरी/पहाड़ी मध्यवर्ग; अंतर्मुखी/प्रतीकप्रधान; संवाद-संक्षेप; मनःस्थिति का सूक्ष्म खाका।
लेखक-परिचय (अत्यंत संक्षेप)
- अज्ञेय (1911–1987): कवि–कथाकार–निबंधकार; पिता—पं. हीरानंद शास्त्री (पुरातत्ववेत्ता); शिक्षा—लखनऊ/लाहौर/मद्रास; स्वभाव—अंतर्मुखी; भाषाएँ—संस्कृत/अंग्रेजी/फ़ारसी/तमिल; ज्ञानपीठ/साहित्य अकादमी से सम्मानित; उपन्यास—शेखर: एक जीवनी, नदी के द्वीप; कथाएँ—छोड़ा हुआ रास्ता, आदि; नाटक—उत्तरप्रियदर्शी; पत्रकारिता—दिनमान/प्रतीक आदि।
छोटी सुधार-नोट (आपके ड्राफ्ट से हल्की दुरुस्तियाँ)
- कारक: “बचपन से” में ‘से’ = अपादान (आपने करण लिखा था)
- “शाम को” में ‘को’ = कालाधिकरण; “के लिए” = सम्प्रदान
- संयुक्त क्रिया के उदाहरण “दे दिया/बैठ गया/चिल्लाने लगा/चला गया” जैसे लिखना ज्यादा सटीक है
- “गैंग्रीन” की वर्तनी/परिभाषा सुधारी गई है