अर्द्धनारीश्वर — लम्बे, आसान, परीक्षा-तैयार नोट्स
क्यों पढ़ें?
- दिनकर इस निबन्ध में नर–नारी को एक-दूसरे का “पूरक” मानते हैं—अलग-अलग नहीं, आधे-आधे।
- संदेश साफ़ है: पुरुष स्त्रियोचित गुण अपना ले तो वह छोटा नहीं हो जाता, और नारी पुरुषोचित गुण सीख ले तो उसके नारीत्व का “बट्टा” नहीं लगता—दोनों की पूर्णता बढ़ती है।
- यही प्रतीक है “अर्द्धनारीश्वर”—शिव का आधा-आधा रूप (अर्ध–नारी–ईश्वर): मिलकर ही सम्पूर्णता।
मुख्य थीम/विचार
- समानता और पूरकता: नर–नारी प्रकृति की “एक ही धातु” के रूप हैं; जीवन-उद्देश्य भी एक है।
- गुणों का आदान-प्रदान: दया, माया, सहिष्णुता (स्त्रीगुण) + साहस, निर्णय, नेतृत्व (पुरुषगुण) = अर्द्धनारीश्वर आदर्श।
- वर्चस्ववाद की आलोचना: कृषि-युग से घर/बाहर का विभाजन बढ़ा; घर (स्त्री) सीमित, बाहर (पुरुष) विस्तृत—यहीं से पराधीनता पनपी।
- प्रवृत्ति/निवृत्ति: गृहस्थ-मान्य (प्रवृत्ति) परम्पराएँ स्त्री की मर्यादा बढ़ातीं; संन्यास-प्रधान (निवृत्ति) परम्पराओं में स्त्री को “बाधक” समझा गया—आलोचनात्मक दृष्टि।
- इतिहास/मत: बुद्ध–महावीर–कई संन्यास-धाराओं में स्त्री के प्रति दूरी/संदेह; दिनकर इसका प्रतिवाद करते हैं—नर–नारी दोनों में ईश्वर का प्रकाश समान है।
- साहित्यिक असहमति: दिनकर रवीन्द्रनाथ/प्रसाद/प्रेमचन्द के कुछ विचारों से असहमत हैं—जहाँ स्त्री को पुरुष-क्षेत्र से अलग रखने का संकेत दिखता है।
कहानी नहीं, विचारों का प्रवाह—एक पंक्ति में सार
- “जिस पुरुष में नारीत्व नहीं, वह अपूर्ण है; और जिस नारी में पौरुष नहीं, वह भी अपूर्ण है। दोनों के श्रेष्ठ गुण मिलकर ही मनुष्य ‘सम्पूर्ण’ बनता है।”
तेज़ याद रखने लायक उद्धरण-संकेत
- “जिस पुरुष में नारीत्व नहीं—अपूर्ण।”
- “प्रत्येक पत्नी—लता; पति—आश्रय-वृक्ष (दृष्टान्त)”
- “जिसे पुरुष अपना कर्मक्षेत्र मानता है, वह नारी का भी कर्मक्षेत्र है।”
- “यदि संधि वार्ता कुंती–गांधारी में होती—महाभारत टल सकता था” (स्त्री-हृदय की शांति-प्रवृत्ति)
सारांश (सरल भाषा में)
- दिनकर कहते हैं: समाज ने स्त्री–पुरुष के गुणों को कृत्रिम दीवार से बाँट दिया—स्त्री के गुण अपनाने पर पुरुष ‘स्त्रैण’ कहलाता है और पुरुष के गुण सीखने पर नारी पर ‘बट्टा’ लगने की बात कही जाती है। यह गलत है। “अर्द्धनारीश्वर” की कल्पना बताती है कि जब तक दोनों के श्रेष्ठ गुण एक-दूसरे में नहीं समाते, व्यक्ति और समाज दोनों अधूरे रहेंगे। वर्चस्ववाद, संन्यास-प्रधान परम्पराओं की संकीर्णता, और स्त्री के ऐतिहासिक शोषण की आलोचना करते हुए वे कहते हैं—जीवन की हर बड़ी घटना में स्त्री की भागीदारी बढ़ेगी तो मानवीय संबंधों में कोमलता/न्याय भी बढ़ेगा। यही आधुनिक समाज की ज़रूरत है।
अति-लघु उत्तरीय (12)
- ‘अर्द्धनारीश्वर’ के लेखक कौन? — रामधारी सिंह ‘दिनकर’
- दिनकर किस युग के कवि हैं? — छायावादोत्तर
- अर्द्धनारीश्वर का केन्द्रीय भाव? — नर–नारी के गुणों का समन्वय/पूरकता
- “कुरुक्षेत्र” किस विधा की रचना है? — काव्य
- “संस्कृति के चार अध्याय” किस विधा में? — गद्य (आलोचना/निबन्ध–विद्या)
- दिनकर किस सदन के सांसद रहे? — राज्यसभा
- उर्वशी पर मिला पुरस्कार — भारतीय ज्ञानपीठ
- दिनकर का जन्म-स्थान — सिमरिया (बेगूसराय, बिहार)
- पिता का नाम — रवि सिंह
- प्रारंभिक शिक्षा — गाँव/आस-पास
- “अर्द्धनारीश्वर” का प्रतीक क्या कहता है? — दोनों अलग-अधूरे; समन्वय से पूर्णता
- दिनकर को साहित्य अकादमी किस कृति पर? — संस्कृति के चार अध्याय
वस्तुनिष्ठ (MCQ — 15) उत्तर अंत में
- “कुरुक्षेत्र” —
A) नाटक B) काव्य C) उपन्यास D) निबन्ध - “संस्कृति के चार अध्याय” —
A) कविता B) कहानी C) गद्य-आलोचना D) नाटक - ‘अर्द्धनारीश्वर’ के लेखक —
A) प्रेमचन्द B) दिनकर C) प्रसाद D) निराला - दिनकर किस सदन में थे?
A) लोकसभा B) राज्यसभा C) विधान परिषद् D) विधान सभा - दिनकर को मिला अलंकरण —
A) भारत रत्न B) पद्मभूषण C) पद्मश्री D) पद्मविभूषण - “उर्वशी” पर मिला —
A) ज्ञानपीठ B) नोबेल C) मैग्सेसे D) नेहरू पुरस्कार - “प्रेमचन्द ने कहा—पुरुष नारी के गुण ले तो…”
A) राक्षस B) देवता C) संन्यासी D) मूर्ख - अर्द्धनारीश्वर का मूल संकेत —
A) प्रतियोगिता B) विरोध C) पूरकता D) पराजय - नारी-पराधीनता का आरम्भ—दिनकर के अनुसार—
A) औद्योगिक-युग B) कृषि-आविष्कार C) वेद-युग D) उपनिषद-युग - “प्रवृत्तिमार्ग” का अर्थ —
A) संन्यास B) गृहस्थ-स्वीकृति C) भिक्षाटन D) वनवास - “निवृत्तिमार्ग” —
A) गृहस्थ आदर्श B) राज्य-व्यवस्था C) संन्यास-प्रधान मार्ग D) उद्योग-धर्म - “जिसे पुरुष कर्मक्षेत्र मानता है…” —
A) सिर्फ पुरुष का B) सिर्फ स्त्री का C) दोनों का D) किसी का नहीं - “पत्नी–लता, पति–वृक्ष”—इसका भाव —
A) समानता B) एक-दूसरे पर आश्रय/संबंध C) द्वेष D) दूरी - दिनकर को साहित्य अकादमी —
A) रश्मिरथी B) कुरुक्षेत्र C) संस्कृति के चार अध्याय D) हारे के हरिनाम - “अर्द्धनारीश्वर” प्रकाशित —
A) 1952 के आसपास B) 1932 C) 1961 D) 1974
उत्तर: 1-B, 2-C, 3-B, 4-B, 5-B, 6-A, 7-B, 8-C, 9-B, 10-B, 11-C, 12-C, 13-B, 14-C, 15-A
रिक्त स्थान (12)
- ‘दिनकर’ — रामधारी सिंह का … उपनाम था। — दिनकर
- दिनकर का जन्म … गाँव में हुआ। — सिमरिया
- पिता का नाम … था। — रवि सिंह
- प्रारंभिक शिक्षा … में हुई। — गाँव/नज़दीक
- “उर्वशी” पर … पुरस्कार मिला। — भारतीय ज्ञानपीठ
- “संस्कृति के चार अध्याय” पर … पुरस्कार। — साहित्य अकादमी
- दिनकर … सभा के सांसद थे। — राज्य
- “अर्द्धनारीश्वर” में … के गुणों का समन्वय है। — स्त्री–पुरुष
- प्रवृत्तिमार्ग … जीवन-स्वीकृति का मार्ग है। — गृहस्थ
- निवृत्तिमार्ग … को प्रधान मानता है। — संन्यास
- “स्त्री को भोग्या” मानने वाली सोच — … की उपज है। — वर्चस्ववादी/संकीर्ण
- “जिस पुरुष में नारीत्व नहीं—वह … है।” — अपूर्ण
सत्य/असत्य (10)
- अर्द्धनारीश्वर स्त्री–पुरुष विरोध का प्रतीक है। — असत्य
- दिनकर के अनुसार स्त्री–पुरुष समान और पूरक हैं। — सत्य
- प्रवृत्तिमार्ग संन्यास को सर्वोच्च मानता है। — असत्य
- “पत्नी–लता” दृष्टान्त आश्रय-संबंध को दिखाता है। — सत्य
- कृषि-युग से घर/बाहर का विभाजन बढ़ा। — सत्य
- स्त्रियोचित गुण अपनाने से पुरुष “स्त्रैण” हो जाता है—दिनकर यही कहते हैं। — असत्य (दिनकर इसका खंडन करते हैं)
- बुद्ध ने भिक्षुणी-परम्परा का स्वागत किया और कहा—धर्म की आयु बढ़ेगी। — असत्य (कथन के अनुसार, घटेगी)
- “कुरुक्षेत्र” गद्य-कृति है। — असत्य (काव्य)
- “उर्वशी” पर ज्ञानपीठ मिला। — सत्य
- “जिसे पुरुष कर्मक्षेत्र मानता है, वह नारी का नहीं है”—दिनकर का विचार। — असत्य
लघु उत्तरीय (8)
- अर्द्धनारीश्वर की कल्पना क्यों?
— ताकि स्त्री–पुरुष के श्रेष्ठ गुण मिलें; दोनों अलग-अधूरे हैं, समन्वय से ही पूर्णता और मानवीयता बढ़ती है। - “कुंती–गांधारी” संधि-वार्ता संदर्भ?
— स्त्री-हृदय की शान्ति/समझौतापरक प्रवृत्ति से युद्ध रोका जा सकता था—इसी संकेत के लिए यह कल्पना। - नारी-पराधीनता का संक्षिप्त इतिहास?
— कृषि-आविष्कार के बाद घर/बाहर का विभाजन; घर सीमित—स्त्री; बाहर विस्तृत—पुरुष; परिणाम—वर्चस्व, पराधीनता। - प्रवृत्ति बनाम निवृत्ति?
— प्रवृत्ति: गृहस्थ आदर्श, स्त्री-मान; निवृत्ति: संन्यास-प्रधान, स्त्री से दूरी—आलोच्य। - “पत्नी–लता, पति–वृक्ष”—कहना क्या चाहते हैं?
— संबंध/आश्रय का रूपक—पर दिनकर चाहते हैं यह आश्रय ‘निर्भरता’ न बने; बराबरी हो। - साहित्यिक असहमति (रवीन्द्र/प्रसाद/प्रेमचन्द) क्यों?
— जहाँ-जहाँ स्त्री की सीमाबद्ध भूमिका/पुरुष-क्षेत्र से अलगाव का संकेत मिला—दिनकर उससे असहमत हैं। - “जिस पुरुष में नारीत्व नहीं—अपूर्ण”—कैसे?
— कोमलता/करुणा/सहिष्णुता के बिना शक्ति कर्कश हो जाती है; समन्वय ही पूर्णता है। - आज “अर्द्धनारीश्वर” की सार्थकता?
— शिक्षा, प्रशासन, राजनीति—हर क्षेत्र में समान भागीदारी/संवेदनशीलता की ज़रूरत; समाज का संतुलन इसी से बनेगा।
दीर्घ उत्तरीय (4) — लिखने का ढाँचा
- निबंध का केन्द्रीय तर्क और आज की उपयोगिता
- पूरकता, समन्वय, वर्चस्व-विरोध; कार्यस्थलों/नीति/परिवार में समान साझेदारी; लैंगिक न्याय = सामाजिक न्याय।
- प्रवृत्ति–निवृत्ति का तुलनात्मक विवेचन
- गृहस्थ बनाम संन्यास; स्त्री की मर्यादा बनाम दूरी; ऐतिहासिक सन्दर्भ; दिनकर का पक्ष—प्रवृत्ति/मानवीयता।
- “कर्मक्षेत्र” की साझेदारी
- घर-बाहर की दीवारें तोड़ना; शिक्षा–रोज़गार–नेतृत्व; स्त्री-भागीदारी से कोमलता/न्याय; उदाहरण/समकालीन सन्दर्भ।
- “अर्द्धनारीश्वर” का प्रतीक और निष्कर्ष
- अर्ध-नारी/अर्ध-ईश्वर: ईश्वरीय स्तर पर भी समन्वय; उसी का सामाजिक संस्करण = समानता/सम्मान/सहभागिता।
भाषा की बात — अभ्यास (सुधार सहित)
- निम्न से संज्ञा बनाइए
- कल्पित → कल्पना
- शीतल → शीत/शीतलता
- अवलम्बित → अवलम्बन [सुधार]
- मोहक → मोह
- आकर्षक → आकर्षण
- वैयक्तिक → व्यक्ति/व्यक्तित्व (प्रसंगानुसार)
- विधवा → वैधव्य [सुधार]
- साहसी → साहस
- वाक्य से लिंग-निर्णय (और यदि लागू हो)
- संन्यास — पुं. (उसने संन्यास ले लिया)
- आयुष्मान — पुं. (आयुष्मान भव)
- अंतर्मन — पुं. (अंतर्मन से पूछो)
- महाऔषधि — स्त्री. (संजीवनी जैसी महाऔषधि)
- यथेष्ट — अव्यय/विशेषण-सदृश (लिंग-निर्धारण नहीं; यथेष्ट प्रयास) [सुधार]
- मनोविनोद — पुं. (मनोविनोद अच्छा है) [सुधार]
- अर्थ की दृष्टि से वाक्य-प्रकृति (विधान/निषेध/आश्चर्य आदि)
- “संसार में सर्वत्र पुरुष पुरुष हैं और स्त्री स्त्री।” — विधानवाचक [सुधार]
- “किन्तु… नहीं आता।” — निषेधात्मक
- “कामिनी… शांति लाती है।” — विधानवाचक [सुधार]
- “यहाँ से जिन्दगी दो टुकड़ों में बँट गई।” — विधानवाचक [सुधार]
- “विचित्र बात तो यह है कि…” — विधान + विस्मय/आश्चर्य-टोन [सुधार]
- मुहावरा
- “बट्टा लगाना” — घाटा/कमी कर देना
लेखक-परिचय (संक्षेप)
- रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (1908–1974): राष्ट्रकवि; जन्म—सिमरिया (बेगूसराय), पिता—रवि सिंह; राज्यसभा सदस्य; प्रमुख कृतियाँ—कुरुक्षेत्र (काव्य), रश्मिरथी, उर्वशी (ज्ञानपीठ), संस्कृति के चार अध्याय (साहित्य अकादमी), अर्द्धनारीश्वर (गद्य) आदि; पद्मभूषण से सम्मानित; ओज/पौरुष/उत्साह और सामाजिक न्याय-बोध के कवि–गद्यकार।
छोटी सुधार-नोट
- संज्ञा-निर्माण: अवलम्बित → अवलम्बन; विधवा → वैधव्य
- “मनोविनोद” पुं.; “यथेष्ट” अव्यय (लिंग लागू नहीं)
- वाक्य-प्रकार: “विधानवाचक” (घोषणात्मक) और “विधिवाचक” (आज्ञा/कामना) अलग-अलग हैं—यहाँ ज़्यादातर विधानवाचक वाक्य हैं
- “दिनकर—एकांकीकार” के बजाय “दिनकर—उत्कृष्ट गद्यकार” कहना अधिक उपयुक्त मानक है (एकांकी उनकी प्रमुख विधा नहीं मानी जाती)