कवयित्री का “खिलौना” — उसका पुत्र (ममता के केंद्र का रूपक)।
असहाय/विवश क्यों? — गोद में सँभालना, लोरी, पूजा–मन्नत—सबके बाद भी पुत्र न बचा; नियति के आगे असमर्थता।
माँ पुत्र के लिए क्या करती है? — गोद में रखना, ठंड/रोग से बचाना, लोरियाँ सुनाना, पूजा–अर्चना/मन्नतें—सब कुछ।
“आज दिशाएँ भी हँसती हैं…” का भाव — संसार में उल्लास है, पर कवयित्री का “खोया खिलौना” (पुत्र) वापस नहीं—व्यक्तिगत शोक बनाम वैश्विक उल्लास का तीखा विरोध।
“मन समझाना कब/क्यों कठिन?” — पुत्र-वियोग में; ममता का अटूट रिश्ता, इसलिए हृदय नहीं मानता।
“छौना” का भाव — हिरण/शावक के लिए स्नेह-संबोधन; पुत्र की भोलापन/चंचलता/सुंदरता का रूपक।
पद-विश्लेषण (चुने अंश)
“आज दिशाएँ भी हँसती हैं…”—प्रकृति/समाज की खुशी और निजी शोक का टकराव; करुण रस की तीव्रता।
“थपकी दे दे जिसे सुलायी…”—ममता का स्वाभाविक, घरेलू, जीवंत चित्र—लोरी/थपकी/जागरण/मन्नत—सब यादें।
“फिर भी कोई कुछ न कर सका…”—मृत्यु-अनिवार्यता की स्वीकृति; शोक में तड़पती माँ का असहाय भाव।
“फिर भी रोता ही रहता है…”—बुद्धि जानती है (सच), हृदय नहीं मानता; जीवन “सूना–सूना”।
“मेरे भैया मेरे बेटे अब…”—आर्त विनती; “पिता/भाई-बहन भूल सकते हैं, पर ‘रात-दिन की साथिन’ माँ कैसे भूले?”
छन्द: छंदबद्ध तुकांत (परीक्षा में “छंदबद्ध तुकांत शैली” लिखना पर्याप्त)
कवयित्री-परिचय (संक्षेप)
सुभद्रा कुमारी चौहान (1904–1948): राष्ट्रीय–समाजिक चेतना और करुण–वात्सल्य की प्रखर कवयित्री; स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय; प्रमुख कृतियाँ—मुकुल (कविता), त्रिधारा (कविता-चयन), बिखरे मोती/सभा के खेल (कहानी-संग्रह)। सहज, आभूषणहीन, हृदयग्राही शैली उनकी विशेषता है।
सार-संक्षेप (कविता)
“पुत्र-वियोग” एक माँ के असामयिक शोक का सादगीभरा, सार्वभौम चित्र है। ममता की स्मृतियाँ (गोद, लोरी, मन्नतें) और मृत्यु की अनिवार्यता के बीच हृदय का द्वंद्व—जहाँ “जानना” और “मानना” अलग हो जाते हैं। माँ बार-बार पुत्र को निकट अनुभव करना चाहती है—यही कविता का करुण शिखर है।
झटपट रिविज़न (एक पेज)
की-वर्ड्स: खिलौना/छौना/थपकी/लोरी/रात-भर/मन्नत/असहाय—करुण रस
कॉन्ट्रास्ट लाइन: “दिशाएँ हँसती हैं” vs “मेरा खिलौना नहीं आया”