नाखून क्यों बढ़ते हैं – विस्तृत व्याख्या
नाखून – ये छोटे‑छोटे अंग हमारे शरीर के केवल सजावटी हिस्से नहीं हैं। इनके पीछे प्राचीन विज्ञान, मानव की प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ और विकास का इतिहास छुपा है। जब हम सोचते हैं कि नाखून क्यों बढ़ते हैं, तो यह सिर्फ शरीर की शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह हमें हमारे अतीत और हमारे विकास की ओर इशारा करता है।
1. प्राचीन काल में नाखूनों का महत्व
कई लाख साल पहले, जब इंसान जंगली जीवन जी रहा था, तब उसके पास किसी भी प्रकार के आधुनिक अस्त्र‑शस्त्र नहीं थे। उस समय इंसान की सुरक्षा, भोजन जुटाना और शिकार करना पूरी तरह उसके शरीर पर निर्भर था। उसके हाथ और पैर ही उसके सबसे महत्वपूर्ण हथियार थे। नाखून, इस संदर्भ में, सिर्फ छोटे अंग नहीं थे, बल्कि सशस्त्र अंग थे। ये शिकार के लिए मददगार होते थे – जानवर को पकड़ना, फल छीलना, या कभी‑कभी आत्मरक्षा करना।
नाक की तरह, नाखून भी उस समय इंसान के अस्त्र के रूप में काम करते थे। यदि इंसान की प्रवृत्ति पाश्विक और शिकार की थी, तो नाखून उसकी ताकत और बचाव का संकेत थे। यही कारण है कि नाखून प्राकृतिक रूप से लगातार बढ़ते रहते थे – जैसे प्रकृति ने इंसान को अपने अस्त्र बनाए रखने के लिए तैयार किया था।
2. नाखून और विकास की कहानी
समय के साथ इंसान ने अपने अस्त्र और हथियार बदल लिए। उसने पत्थर, लकड़ी और बाद में धातु से अस्त्र बनाए। अब उसके अस्त्र नाखून और दांत नहीं थे, बल्कि भाले, तलवार, और आधुनिक हथियार बन गए। फिर भी नाखून बढ़ते रहे।
यह संकेत है कि इंसान में प्राचीन समय की पशुवत प्रवृत्ति अब भी मौजूद है। भले ही हम सभ्य जीवन जीते हैं, तकनीक और विज्ञान का विकास कर चुके हैं, हमारे शरीर की कुछ प्राकृतिक वृत्तियाँ अब भी हमें याद दिलाती हैं – हम कभी न कभी अपने भीतर के जानवर को महसूस करते हैं।
3. नाखून की बढ़ने की प्रक्रिया
नाखून वास्तव में चमड़ी के ऊतक से बने होते हैं, जिन्हें केराटिन कहा जाता है। ये ऊतक लगातार नए कोशिकाएँ बनाते हैं। पुराने कोशिकाएँ कठोर होकर नाखून का रूप ले लेती हैं और धीरे‑धीरे बढ़ती हैं। यही कारण है कि नाखून कभी नहीं रुकते।
नाखून की वृद्धि हमारे स्वास्थ्य और पोषण से भी जुड़ी है। पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन और खनिज नाखून की स्वस्थ वृद्धि में मदद करते हैं। यह न केवल शरीर की जीवनशैली को दर्शाता है, बल्कि यह हमारे शरीर की सतत सक्रियता का प्रतीक भी है।
4. नाखून और मानवता का रिश्ता
आज नाखून सिर्फ अस्त्र या सुरक्षा के लिए नहीं हैं। मानव ने इसे सौंदर्य और व्यक्तित्व का हिस्सा बना दिया है। लोग अपने नाखूनों को काटते, रंगते और सजाते हैं। हालांकि यह एक आधुनिक बदलाव है, लेकिन नाखून की बढ़ने की प्रवृत्ति पुराने पशुवत अस्त्र की याद दिलाती है।
हमारे भीतर का जानवर कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। वह अब सजावटी नाखूनों और मैनीक्योर के रूप में दिखाई देता है। यह हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति और विकास के नियम हमेशा हमारे साथ रहते हैं।
5. नाखून और संस्कृति
भारत में नाखूनों की सजावट और देखभाल का इतिहास बहुत पुराना है। प्राचीन समय में नाखूनों को काटना, रंगना या सजाना केवल सौंदर्य की दृष्टि से नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक संकेत के रूप में किया जाता था। यह मानव की प्रवृत्ति को नियंत्रित करने और उसे सभ्य बनाने का तरीका था।
6. मनुष्य और नाखून – एक दार्शनिक दृष्टिकोण
नाखून हमें यह भी बताते हैं कि मनुष्य अपने अतीत से पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है। हम विज्ञान और सभ्यता में विकसित हुए हैं, लेकिन प्रकृति ने हमें कुछ ऐसे अंग दिए हैं जो लगातार हमें हमारे जीवन के मूल तत्वों की याद दिलाते हैं।
नाखून की वृद्धि एक प्रतीक है – यह बताती है कि मनुष्य हमेशा विकासशील है, कभी पूरी तरह स्थिर नहीं होता। नाखून बढ़ते रहना यह संकेत देता है कि हमारे भीतर की पाश्विक प्रवृत्ति और मानव प्रवृत्ति दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।
7. निष्कर्ष
नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह सवाल केवल शारीरिक कारणों से नहीं, बल्कि दार्शनिक और ऐतिहासिक कारणों से भी जुड़ा है।
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प्राचीन काल में नाखून अस्त्र थे।
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यह मानव की पाश्विक प्रवृत्ति और प्राकृतिक संरचना का प्रतीक है।
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आधुनिक समय में यह सजावट और सौंदर्य का हिस्सा बन गए हैं।
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नाखून की वृद्धि लगातार चलती रहती है, यह जीवन की सतत सक्रियता और विकास की पहचान है।
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यह हमें याद दिलाते हैं कि हमारे भीतर हमेशा कुछ पुराना और कुछ नया चलता है – प्राचीन पशु प्रवृत्ति और आधुनिक सभ्यता का संगम।
नाखून बढ़ते रहते हैं, और इसी में हमारी जीवन की सततता, प्रकृति का नियम और मानवता का इतिहास समाहित है।
नक़ल क्यों बढ़ते हैं लेखक हज़ारी आचार्य प्रसाद मंडल का जन्म सन् 1907 ई0 में आरत जॉय का छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में हुआ। डोडे जी का साहित्य कर्म भारतवर्ष के सांस्कृतिक इतिहास की प्रेरणा है। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, आदिम सागर और उनके साहित्य के साथ इतिहास, संस्कृति, धर्म, दर्शन और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की व्यापकता और गहनता पथकर में उनकी अगाध पांडित्य प्राचीन मानवीय रचना और आलोचना की क्षमता लेकर प्रकट हुई है। वे ज्ञान को बोध और पांडित्य की सहृदयता में डाल कर एक ऐसा रचना संसार हमारे सामने उपस्थित करते हैं जो विचार की तेजस्विता, सिद्धांत की लालित्य और बंधन की शास्त्रीयता का संगम है। इस प्रकार वे एकसाथ कबीर, तुलसी और विश्वनाथ एककार हो सकते हैं। उनकी सांस्कृतिक दृष्टि अपूर्व है। उनके अनुसार भारतीय संस्कृति किसी एक जाति की मांद नहीं है, बल्कि समय-समय पर उपस्थित अनेक शिखरों के श्रेष्ठ साधनांशों के लवण-नीर संयोग से विकसित हुए हैं। वेदजी की प्रमुख रचनाएँ हैं - 'अशोक के फूल', 'कल्पलता', 'विचार और वितर्क', 'कुटज', 'विचार-प्रवाह', 'अलोक पर्व', 'प्राचीन भारत के रचनात्मक विनोद' (निर्बन्ध संग्रह); 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'चारुचंद्रलेख', 'पुनर्वा', 'अनामदास का पोथा' (उपन्यास); 'सूर साहित्य', 'कबीर', 'मध्यकालीन बोध का स्वरूप', 'नाथ संप्रदाय', 'कालिदास की लालित्य योजना', 'हिंदी साहित्य का आदिकाल', 'हिंदी साहित्य की भूमिका', 'हिंदी साहित्य : शैली और विकास' (आलोचना-साहित्येतिहास); 'संदेशरस', 'पृथ्वीराजरासो', 'नाथ-सिद्धों की बानियाँ' (ग्रंथ संपादन): 'विश्व भारती' (शांति निकेतन) पत्रिका का संपादन। 'डॉक्टरीजी को आलोकपर्व' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारत सरकार द्वारा 'पद्मभूषण' सम्मान एवं नोएडा विश्वविद्यालय द्वारा डी0 लिट की डिग्री मिली। वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय, शांति निकेतन विश्वविद्यालय,। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में आदि प्रोफेसर एवं यूनिवर्सिटी स्टाफ पर रह रहे हैं। सन् 1979 में दिल्ली में उनका निधन हो गया। हज़ारी प्रसाद मण्डी पाठावली के लिए प्रस्तुत प्रस्तुत निबंध में अध्येता लेखक और निबंधकार का मानववादी दृष्टिकोण प्रकट होता है। इस ललित निबंध में लेखक ने बार-बार काटे पर भी वार किया, जाने वाले शहीद के बागानों में अत्यंत सहज शैली में सभ्यता और संस्कृति की विकम-गाथा उद्घाटित कर दिखाई है। एक ओर मानवता की मान्यता मानव की आदिम पाश्विक प्रवृत्ति और सांस्कृतिक अनुभूति को भी अस्वीकार करती है। लेखक ने सहयोगी के मनोरंजक शैली में मानव-सत्य का दिग्दर्शन करने का सफल प्रयास किया है। यह नई पीढ़ी में सौंदर्यबोध, इतिहास, अस्वीकरण और सांस्कृतिक आत्मगौरव का भाव जगाता है। नक़ल क्यों बढ़ते हैं Summary in Hindi पाठ का सारांश बच्चे-कभी-कभी चक्कर में दाल देने वाले प्रश्न कर सकते हैं। मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन पूछा.दिया कि आदमी के नखरे क्यों बढ़ रहे हैं, तो मैंने सोचा में पड़ गया, हर तीसरे दिन नकेल बढ़ जाते हैं, बच्चे कुछ दिन तक अगर उन्हें बढ़ाना चाहते हैं, तो माँ-बाप उन्हें डांटा करते हैं। कोई नहीं जानता कि ये अभागे नाक इस उन्नत प्रकार के क्यों होते हैं। कैट की ओर से दिए गए नामांकनों को स्वीकृत कर शेष पर निर्लज्ज अपराधी की बिरादरी को फिर से छूट ही सेंध पर छूट दी गई है। कुछ लाख वर्षों की बात है, जब मनुष्य जंगली था; वनमानुष जैसा। उसे नैक की जरूरत थी। उसकी जीवन-रक्षा के लिए नॉक बहुत जरूरी थे। असल में वही उसके अस्त्र थे। दाँत भी थे नाक के बाद भी उनका स्थान। उन दिनों उनके लिए सगाई की जरूरत थी, प्रतिद्वंदियों को बढ़ावा देना था, नॉक के लिए उन्हें अंग की आवश्यकता थी। फिर धीरे-धीरे वह अपने अंग से बाहर की कब्र का सहारा लेने लगी। पत्थर के ढेले और पेंड की डाली काम में लग गई। वह शेयरों के भी हथियार बनायें। मनुष्यं और आगे बढ़ा। वह धातु के हथियार बनाता है। पलीतेवाली बंदूकों ने, कार्टियों ने, तोपों ने, बमों ने, बमवर्षक विमानों ने इतिहास को किस अंतिम घाट पर खींचा है, यह आम तौर पर उल्लेखित है। नखधर इंसान अब एटम बम पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। पर उसकी नैक अब भी बढ़ रही थी। कुछ हज़ार साल पहले मैन ने नेक को सुकुमार विनोदों के लिए उपयोग में लाना शुरू किया था। वात्स्यायन के कामसूत्र से पता चलता है कि आज से दो हजार साल पहले भारतवासी आश्रम को जाम के संवरता था। उनकी कटर की कला काफी मनोरंजक बताई गई है। त्रिकोण, वर्टुलाकार, चंद्राकार दंतुल आदि विभिन्न शिखरों के नाक उनाय विलासी नागरिकों के एन। जाने किस काम आये थे। ओडे सिक्ख (माँ) और अलंक्तक (अल्ता) से यत्न डाँबाकर लाल और पतला बनाया गया था। भगवान देश के लोग उन दिनों बड़े-बड़े नाखों को, पसंद करते थे और दक्षिणात्य लोग छोटे-छोटे नाखों को। लेकिन सभी अधोगामिनी वृत्तियों को और नीचे खींची गई कब्रों को भारतवर्ष ने मनुष्योचित बनाया है, यह बात चाहो तो भी भूल नहीं सकते। 15 अगस्त को जब अंग्रेजी भाषा के पत्र 'स्वतंत्रता दिवस की घोषणा कर रहे थे, देशी भाषा के पत्र' स्वतंत्रता दिवस की चर्चा कर रहे थे। इंडिपेंडेंस का अर्थ है स्वाधीनता 'शब्द का - अर्थ है अपना ही अधीनस्थ' होना। उन्होंने अपनी स्वतंत्रता के संविधान का भी नामकरण किया, आज़ादी, स्वराज्य, स्वाधीनता-उन सबमें 'स्व' का बंधन शामिल है। अपने-अपने द्वारा स्थापित बंधन हमारी संस्कृति का बहुत बड़ा लाभ है। इंसानियत-डंटे को अपना आदर्श नहीं दिखाया गया है, टूटे हुए में गाइन चढ़ाया गया है - दौड़ने वाले अविवेकी को बुरा प्रभाव और वचन दिया गया है, मन और शरीर से गए असत्यचरण को गलत आचरण दिखाया गया है। यह किसी भी जाति या वर्ण या समुदाय का धर्म नहीं है। यह मनुष्य-मात्र का धर्म है। महाभारत में निर्वैर भाव, सत्य और अक्रोध को सभी गुणों का सामान्य धर्म कहा गया है - एतद्धि वितं श्रेष्ठं सर्वभूतेषु भारत! निर्वैरता महाराज सत्यमक्रोध एव च। अन्यत्र सतत दानशीलता को भी महत्व दिया गया है। गौतम ने ठीक ही कहा था कि मनुष्य-मनुष्यता यही है कि वह सबके दुःख-सुख को सहानुभूति के साथ देखता है। ऐसा कोई भी दिन हो सकता है, जबकि मनुष्य के पद पर नियुक्ति बंद हो जाएगी। शास्त्रियों का ऐसा अनुमान है कि मनुष्य का जीवाश्म अंग एक ही प्रकार का होता है, जिस प्रकार उसका पूँछ चिन्हित होता है। उस दिन मनुष्य की पशुता भी लुप्त हो जायेगी। शायद उस दिन वह मराणास्त्रों का प्रयोग भी बंद कर देगा। . शत्रु का सिद्धांत मनुष्य की वह अंध सहजता की प्राप्ति का परिणाम है, जो उसके जीवन में सफलता लेना चाहता है, उसे काट देना वह 'स्व'- आत्म-बंधन का पुल है, जो .. उसे चरित्रार्थ की ओर ले जाता है। बढ़ते बढ़ते हैं तो बढ़ते, इंसान बढ़ते नहीं बढ़ते। शब्दार्थ अल्पज्ञ : कम दर्शन वाला लेथ: नख को धारण करने वाला, नैक वाला दंतवलंबी : दांत का सहारा लेकर जीने वाला विचरण: घूमना, भटकना तत्:किम: क्या, इसके बाद क्या नहीं असह्य: न सह सकने योग्य पाश्वी वृत्ति: पशु प्रकृति एवं व्यवहार वर्तुलाकार: हाथी का सहारा लेकर, फिर से बाहर दक्षिणात्य: दक्षिण का (दक्षिण भारतीय) अभोगामिनि: नीचे की ओर जानेवाली सहजात वती: जन्म के साथ जन्मने वाली वृत्ति या प्रकृति वाक्: वाणी, निर्बोध: नासमझ, नादान अनुवर्तिता.: पीछे की भाषा आरक्षित: जो रक्षित न हो, खुला अनुसाहित्य: अनुसंधान की प्रबल इच्छा सरबस: सर्वस्व, कृससंचित: पहले से स्थापित या प्रकाशित समावेदना: दूसरे के दुख को भावना करना उद्भावित : प्रकट की उत्पत्ति, उत्पत्ति की उत्पत्ति असत्यचरण : असत्य आचरण, लोकविरुद्ध आचरण निर्वैर : बिना वैर-विरोध के उत्स : स्रोत, उद्गम, मूल आत्मतोष : अपने को समझना, अपनी को समझाना। चरितार्थ: सारता
