लेखक: पं. बिरजू महाराज
बिरजू महाराज भारतीय शास्त्रीय नृत्य के महान गुरु और कलाकार थे। उनका जन्म 4 फरवरी 1938 को लखनऊ के जाफरीन अस्पताल में हुआ। वे घर के अंतिम संतान थे। उनके परिवार में बड़ी बहन और छोटी बहन भी थीं। बड़ी बहन उनसे लगभग 15 वर्ष बड़ी थी। उनके पिता, जिन्हें हम बाबूजी कहते हैं, नृत्य में पारंगत थे और उन्होंने ही बिरजू को नृत्य की तालीम दी। पिता का प्रभाव उनके जीवन पर हमेशा रहा।
बचपन में ही बिरजू महाराज ने नृत्य के प्रति रुचि दिखाना शुरू किया। छह साल की उम्र में वे नवाब साहब के सामने नाचते थे। उस समय चूड़ीदार पजामा, साफा और अचकन पहनकर उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया। उनके प्रदर्शन की इतनी प्रशंसा हुई कि बाबूजी ने हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाने की परंपरा निभाई। यह इसलिए था क्योंकि नवाब साहब की नौकरी छूट जाने पर प्रसन्नता के रूप में यह किया जाता था।
बिरजू महाराज ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा निर्मल जी के स्कूल, दिल्ली में प्राप्त की। यहाँ उन्होंने हिंदुस्तानी डांस म्यूजिक के संपर्क में आने का अवसर पाया। उन्होंने अपने गुरु, बाबूजी से गहन शिक्षा प्राप्त की। गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार, जब बिरजू महाराज ने अपने शिष्य स्वीकार किए, तो उन्होंने गुरु दक्षिणा के रूप में 500 रुपये दिए। इसे “गंडा बंधना” कहा जाता है, जो शिष्य स्वीकार करने का पारंपरिक तरीका है।
गुरु-शिष्य और शिक्षा
बिरजू महाराज अपने शिष्यों के प्रति हमेशा उदार और निष्पक्ष रहे। उन्होंने किसी भी भेदभाव के बिना शिक्षा दी। उनके अनुसार, कला किसी जाति, लिंग या परिवार पर निर्भर नहीं करती। उनके शिष्य, चाहे पुत्र हों या अन्य छात्र, सभी को समान रूप से सिखाया गया। वे कहते थे कि उन्होंने कभी भी अपने शिष्यों से कुछ चोरी नहीं किया और न ही किसी के लिए अलग नियम बनाए। इस दृष्टिकोण से उनका व्यवहार अत्यंत पवित्र और शिक्षाप्रद था।
उनके गुरु शंभू महाराज उनके चाचा थे। बचपन से ही शंभू महाराज का मार्गदर्शन और सहयोग उन्हें मिलता रहा। उनके सहयोग से बिरजू महाराज की कला का विकास हुआ और उन्होंने विभिन्न मंचों पर प्रदर्शन करना शुरू किया।
पुरस्कार और पहचान
बिरजू महाराज को कोलकाता में अपना पहला प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। इस पुरस्कार ने उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया। कलकत्ते के दर्शकों की प्रशंसा और अखबारों में छपने के बाद उनका नाम पूरे देश में फैल गया। इसके बाद उन्हें मुंबई, मद्रास और विदेशों में प्रदर्शन का अवसर मिला। उन्होंने रूस, जर्मनी, जापान, हांगकांग, लाओस और बर्मा में भी नृत्य किया।
व्यक्तिगत जीवन और कठिनाइयाँ
बिरजू महाराज के जीवन में सबसे दुःखद समय तब आया जब उनके बाबूजी की मृत्यु हो गई। उस समय परिवार में आर्थिक कठिनाई थी। उन्हें दसवाँ करने के लिए दो कार्यक्रम आयोजित करने पड़े। इन कार्यक्रमों से 500 रुपये की आमदनी हुई। इस कठिन समय में भी उन्होंने नृत्य को कभी नहीं छोड़ा।
उनकी शादी 18 वर्ष की उम्र में हुई। वह विवाह उनके जीवन की कुछ मजबूरियों और परिस्थितियों का परिणाम था। हालांकि उन्होंने बाद में इसे अपनी गलती माना, लेकिन उनका मानना था कि शिक्षा और कला के प्रति उनका समर्पण हमेशा सर्वोपरि रहा।
मंच और प्रदर्शन की स्थितियाँ
बिरजू महाराज ने महलों, जमींदारों के घरों और सार्वजनिक स्थानों पर नृत्य किया। उस समय मंच की सुविधाएँ सीमित थीं – न तो एयर कंडीशनिंग थी, न चार्म लाइट, न वाद्य-यंत्रों की उन्नत व्यवस्था। इसके बावजूद पुराने नर्तक अपनी कला के प्रदर्शन में पूर्ण समर्पित थे। आज के कलाकारों की तुलना में उनके प्रदर्शन में आडंबर नहीं था, बल्कि कला और भावना का श्रेष्ठतम मिश्रण था।
कला और सम्मान
बिरजू महाराज हमेशा कहते थे कि “सम्मान मेरा नहीं, मेरे नृत्य का है।” उनके अनुसार, नृत्य और कला सर्वोपरी है। कलाकार केवल उसका सहायक है। यही दृष्टिकोण उन्हें अपने जीवन और कला में उच्चता प्रदान करता रहा।
वे अपने शिष्यों को मेहनत और पूरी निष्ठा से सिखाते थे। उनका मानना था कि यदि किसी शिष्य को पूर्ण रूप से नहीं सिखाया गया, तो वह कला का महत्व नहीं समझ पाएगा। इस कारण उन्होंने शिष्यों के प्रति हमेशा उदार और सटीक दृष्टिकोण रखा।
अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय योगदान
बिरजू महाराज ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य को विश्व स्तर पर फैलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके नृत्य ने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी भारतीय संस्कृति और कला का मान बढ़ाया। रूस, जापान, जर्मनी और अन्य देशों में उनके प्रदर्शन ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रतिष्ठा को विश्व स्तर पर मजबूत किया।
समापन
बिरजू महाराज का जीवन और उनकी कला इस बात का उदाहरण है कि समर्पण, मेहनत और गुरु-शिष्य परंपरा के आदर्शों का पालन करके कोई भी कलाकार महानता प्राप्त कर सकता है। उनके विचार और कार्य हमें यह सिखाते हैं कि कला का सर्वोच्च मूल्य सम्मान, निष्ठा और पूर्ण समर्पण में निहित है।
वे न केवल एक महान नर्तक थे, बल्कि अपने शिष्यों के लिए आदर्श गुरु भी थे। उनके जीवन और कार्य से यह स्पष्ट होता है कि कला और नैतिकता का संतुलन ही सफलता की कुंजी है।
शब्दार्थ
क्रोडस्थ: गोद या शरीर में स्थित
हलकार: संदेशवाहक, कारिंदा
साफा: सावा मोटा वस्त्र जिसमें डांस कंधे से लेकर कमर तक के कपड़े हैं
अचकन: पोशाक विशेष
प्रमुखता: नैप, माप नैप, माप
मस्का: मक्खन (मास्का पहनने या मक्खन व्यायाम मुहावरा भी है)
परान: टेबल के वे बोल जिन पर डांस नाचता और ताल देता है '
बंदिश: ठुमरी या अन्य प्रकार के गायन के बोल, स्थायी
दाल का शोले: मीठी दाल को मस्कारे।
गंडा बंधना: धार्मिक संबंध, शिष्य स्वीकारोक्ति करना
नजराना: अवशेष, उपहार, गुरुदक्षिणा
नागा: गुड़िया, हज नहीं होना, गायब होना
गिरहकट: पेंटारेबाज, बाजार कट लेने वाला, पाकेट मंच: धार्मिक मंच: चांद की एक विद्वान:
किसी पदमान की पंक्तियां : तीसरी मंडली: यूरोपीय नृत्य जिसमें विशेष नृत्यकला, भावभिनय और कला नृत्य शामिल होते हैं:
अरसा : समय, अवधि, प्लास्टिक: विशेष या प्लास्टिक जो फर्म हो मिज़ारब: सितार वादक का एक तरह का छल्ला बल: छंदमय आरोही गति जो भावप्रसंग के साथ हो। शागिर्द : शिष्य लाजवाब : जिसका जवाब न हो, अनोखा, अनो1.बिरजू महाराज: जन्म मेरा नेशनल के जाफरीन अस्पताल में 1938, 4 फरवरी, शुक्रवार, सुबह 8 बजे; वसंत पंचमी के एक दिन पहले हुआ। घर में आखिरी संतान। तीन साल की उम्र के बाद। सबसे छोटी बहन मेरी आठ नौ साल बड़ी। अमाम ताब 28 के लगभग रही। बबीता का जन्मस्थान में क्योंकि बाबूजी यहां 22 साल हैं। बड़ी बहन लगभग 15 साल बड़ी। उस समय बाबूजी रायगढ़ आदि राजाओं के यहाँ भी गये थे। मेरा विचार दो साल का था। उस समय राजा ने कुछ समय के लिए विभिन्न प्रकार की नौकरियाँ माँगीं। पहले भी गए थे पाटील. रायगढ़ दो प्रमुख साल रहेंगे। वैकल्पिक रिटर्न्सकर आये। पोर्टेबल काफी अरसे रह रहे हैं। जब पांच छह साल हुए तो नवाब को याद कर लिया गया। हलकेरे आ गए तो जाना ही हुआ। इच्छा जो भी समय हो।
प्रश्न
(क) पाठ और लेखक का नाम लिखें।
(ख) बिरजू महाराज का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
(छ) महाराज अपने माता-पिता के कौन-से संत थे?
(घ) महाराज की देवरानी का जन्म कहाँ हुआ था?
(ङ) बड़ी बहन महाराज से कितनी बड़ी थी?
(च) बाबूजी लैपटॉप में दिन कितने रहे थे?
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-जित-जित मैं निरखत हूं।
लेखक का नाम- पं. बिरजू महाराज.
(ख) बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी, 1938 को जाफरीन अस्पताल, लखनऊ में हुआ था।
(जी) महाराज अपने माता-पिता के अंतिम संत थे।
(घ) महाराज की मातृभूमि का जन्म हुआ था।
(ङ)बड़ी बहन महाराज से लगभग 15 वर्ष बड़ी थी।
(च) बाबूजी लैपटॉप में 22 साल रहे थे।
2. छह साल की उम्र में मुझे नवाब साहब बहुत पसंद थे। मैं नाचता था। पीछे पैरकर घुमाव वाला सामान था। चूड़ीदार पजामा साफा, अचकन पहने कर। अम्मा जी चावली फ़ीचर। उन्होंने हमारा तनख्वाह भी छोड़ दिया था। बाबूजी रोज हनुमानजी का प्रसाद मांगते थे कि 22 साल चले गए, अब नौकरी छूट जाएगी। नवाब साहब बहुत नाराज कि भाई-बहन नहीं होंगे तो तुम भी नहीं रह सकते। खैर बाबू जी बहुत खुश हुए और उनकी प्यारी बाँटी। हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया की जान छूटी।
प्रश्न
(क) पाठ और लेखक का नाम लिखें।
(ख) कितने वर्ष की आयु में महाराज नवाब को पसंद आ गये थे।
(छ) बचपन में नवाब के साथी क्या आसीन महाराज नाचते थे।
(घ) बाबूजी हनुमान जी का प्रसाद क्यों मांगते थे?
(ङ) बाबूजी हनुमान जी को प्रसाद क्यों चढ़ाये?
उत्तर-
(क)पाठ का नाम–जीत-जीत मैं निरखत हूं। लेखक का नाम-बिरजू महाराज.
(ख) छह साल की उम्र में बिरजू नवाब को पसंद आ गए थे।
(छ) बचपन में महाराज चूड़ी पजामा, साफा, अचकन बस्ती नवाबों के साथ नाचते थे।
(घ) बाबूजी चाहते थे कि नौकरी छूट जाए, इसलिए हनुमान जी का प्रसाद मांगते थे।
(ङ) नौकरी से जान छूटने की खुशी में हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया।
3. मेरी एक बड़ी बुरी आदत रही है, जैसे कि मेरे बाबूजी की भी थी कि जब शार्गिद को सिखाया जा रहा है तो पूरी तरह से मेहनत कर सिखाना और अच्छा बनाना है। ऐसा बना देना कि मैं खुद हूं। ये कोशिश है. पर अब भगवान की कृपा भी होनी चाहिए। मतलब कोशिश यही रहती है कि मैंने कोई चीज चोरी नहीं की है कि अपने बेटे के लिए ये रखना सिखाया है।
प्रश्न
(क) पाठ और वक्ता का नामोल्लेख करें।
(ख) बिरजू महाराज का यह कथन किस सन्दर्भ में है?
(छ) बिरजू महाराज अपने शिष्यों के बारे में कौन सी आदतें रखते हैं?
उत्तर-
(क) पाठ-जित-जित मैं निरखत हूं। वक्ता-बिरजू महाराज।
(ख) बिरजू महाराज का यह शिष्यों की शिक्षा का संदर्भ है।
(जी) बिरजू महाराज अपने शिष्यों को शिक्षा देने के संदर्भ में अपनी आदत का उल्लेख करते हैं - कहा जाता है कि उनके पिता की तरह उनकी खास आदतें शिष्यों को मेहनत करके सिखाना और उन्हें अपने जैसा अच्छा बनाना है। वे कहते हैं कि वे पुत्र और शिष्यों में 'भेद नहीं करते। वे जो अपने बेटे-बेटियों को सिखाते हैं, वह सब कुछ अपने शिष्यों को भी सिखाते हैं।
4. बि.म:-अम्माजी का बहुत बड़ा हाथ है। अम्माजी ने तो शुरू किया उन बुजुर्गों की प्रशंसा कर मेरे सामने हरदम की, बेटा वो ऐसे थे, कम-से-कम इतना नाम तो याद आया था उन बुजुर्गों का। अभी आपने किसी दूसरे से घर पर पूछा तो उनका नाम भी नहीं पता था कि कौन थे। चाची (शंभू महाराज की पत्नी) से आपने पहले पूछा था कि महाराज बिंदादीन के बाद और कौन थे तो नहीं देखा। तुमरियों ने भी मुझसे अपनी सीख ली। मेरी नियति में गुरुवाइन थी; वो माँ तो वही थी। गुरुवैन भी। और जब भी मैं नाचता था तो सबसे बड़े एक्जामिनर या जज को पीछे छोड़ दिया जाता था। जब भी वो नाचता था तो मैं उससे कहता था कि मैं कहीं गलत हूँ तो नहीं कर रहा हूँ। मतलब बाबूजी वाला असल में ना कहीं गड़बड़ी तो नहीं हो रही। तो कही नहीं बेटा नहीं. जवानी की तस्वीर हो। पर बैले वैले ये तो मेरा भैया क्रियेशन है। वो हरदम ऐसे ही रस्साकशी और नोएडा के जो बुजुर्ग थे उनका भी, शोषण ली मैंने। चांग तो नहीं लग रहा है। "नहीं बेटा जैसा दिखता है वैसा ही है। और क्लास बॉडी म्यूजिक टोटल दिखता है। बैठने का, उठने का, बात करने का। मतलब जैसा उनका था।"
प्रश्न
(क) बिरजू को आगे बढ़ाने में किसका हाथ है?
(ख) बिरजू ने अपनी माँ को गुरुवाइन क्यों कहा है?
(जी) नृत्य करते समय बिरजू अपना जज किसे मानते थे? और क्यों ?
(घ) बिरजू को गवाही देने के लिए क्या करना था?
उत्तर-
(क) बिरजू को आगे बढ़ाने में उनके माँ का हाथ है।
(ख) बिरजू की मां बार-बार का गुणगान करती हैं, उनका कहना पूरा करती हैं। किसी का नाम पैकेट पर झट से बताएं। नृत्य में, ग़लत पर समझ में आ रहा है बातें। अपनी माँ को गुरुवाइन ने कहा है।
(छ) जज का काम न्याय करना होता है। न्याय के मंच पर आबंटित व्यक्ति अपना-पराया नहीं देखता। बिरजूजी की मां ने डांस करते समय अच्छे-बुरे की ताकीद की थी। अच्छा होने पर ही वह अच्छा लगा।
(घ.) नृत्य अच्छा हुआ या इसके लिए बिरजू महाराज को अपनी माँ ने नियुक्त नहीं किया। गायन और नृत्य में आउटडोर कलाकार तो इसके लिए माँ से पूछताछ का उदाहरण नहीं लेते थे। इतने ही नहीं राष्ट्रवादी लोगों से भी हम भरवाते थे।
5.मकान के महल में भी नाचा हूं नेपाल महाराज के यहां भी नाचा हूं और जमीदारों के यहां भी नाचा हूं। जहां का मैं अक्सर तमाशा सुनाता रहता हूं। कि जहां महफिल भी लगी है कि लड़का नाचेगा जरा चारों तरफ थोड़ा स्लाइडकर जगह बनाओ तो सब खिसक जाएं तो नीचे की तरफ स्ट्रीटचा स्लैच पर स्मारिक और चांदनी ग्लाइचे के नीचे जमीन पर कहीं भी खाँचा है इसका मतलब यह है कि सब नहीं कौन खरीद करे। हमारे नए डांसर हैं कि स्टेज बड़ा बुरा है बड़ा टेढ़ा है बड़ा है। हम लोगों को यह सब देखने का मौका कहां मिला। अब गर्मी के दिनों में जरा सोचो न एयरकंडीशन; ना कुछ वो बड़े-बड़े बिहार लेकर जो नौकर-चाकर थे, वो युकाते रहते थे। उसका भी हाथ का सामान था। नाचने में वो न लड़कियाँ कहीं जाती हैं। दूसरा कि गैस लाइट जल रही है उसकी भी गर्मी।
प्रश्न
(क) बिरजूजी का नृत्य कहाँ-कहाँ हुआ है?
(ख) उस समय मंच की व्यवस्था कैसी थी?
(छ) पहले और आज के डांसर्स में क्या अंतर है?
(घ) सफल डांसर की पहचान क्या है?
उत्तर-
(के) बिरजूजी का नृत्य नृत्य नवाब महल में हुआ, नेपाल महाराज के भवन में, अनेक जमींदारों आदि के यहाँ है।
(ख) उस समय मंच की व्यवस्था थी। न तो चार्म लाइट की व्यवस्था थी और न ही समशीतोष्ण मशीनें आदि की थीं। नृत्य हो इसके लिए साधारण रूप से व्यवस्था दी गई थी।
(जी) पहले के डांसर अपनी कला का प्रदर्शन करना जानते थे। उन्हें वाद्य-संयंत्रों, बिजली आदि की व्यवस्था से वास्तु संबंध नहीं रहते थे। जो था उसी पर उन्होंने अपनी कला का चित्रण कर दिया था। आज के नृत्य कला, प्रदर्शनात्मक आडंबर का चित्रण नहीं किया गया है। आज के लिए उन्हें चकाचौंध मंच, उत्तम वाद्य-यंत्र चाहिए।
(घ) सफल कलाकारों की भूमिकाओं से प्रभावित नहीं होता है। बल्कि अपनी कला का निश्चय करना*चाहता है। कला प्रदर्शन की क्षमता ही सफल डांसर की पहचान है।