परंपरा का ज्ञान किनके लिए सबसे ज्यादा आवश्यक है और क्यों?
उत्तर-
जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन करना चाहते हैं, क्रांतिकारी साहित्य रचना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परंपरा का ज्ञान आवश्यक है। क्योंकि साहित्य की परंपरा से प्रगतिशील आलोचना का ज्ञान होता है जिससे साहित्य की धारा को मोड़कर नए प्रगतिशील साहित्य का निर्माण किया जा सकता है
परंपरा का आकलन बिहार बोर्ड कक्षा 10 प्रश्न 2.
परंपरा का आकलन साहित्य के ग्रेड आधार का विवेक लेखक में महत्व क्यों है?
उत्तर-
साहित्य की परंपरा का आकलन सबसे पहले हमने उस साहित्य का मूल्य निर्धारित किया है जो शोषक ग्रेड के श्रमिकों के हितों को प्रतिबिम्बित करता है। इसके साथ ही हम उस साहित्य पर ध्यान देते हैं, जिसमें साहित्यिक रचना का आधार शोषित जनता श्रम है। और यह देखने का प्रयास है कि वह वर्तमान काल में जनता के लिए कहां तक उपयोगी है और उसका उपयोग किस प्रकार हो सकता है।
परम्परा का मुल्यांकन प्रश्न उत्तर बिहार बोर्ड कक्षा 10 प्रश्न 3.
साहित्य का कौन-सा पक्ष प्रतिष्ठित होना है? इस संबंध में लेखक की राय स्पष्ट करें।
उत्तर-
साहित्य मनुष्य के संपूर्ण जीवन से जुड़ा है। आर्थिक जीवन के अलावा मनुष्य एक प्राणी के रूप में भी अपना जीवन व्यतीत करता है। साहित्य में उनकी बहुत-सी आदिम भावनाएँ प्रतिफलित होती हैं जो उन्हें व्यवसाय से बाहर कर देती हैं। इस को बार-बार देखने में कोई नुक्सान नहीं है कि साहित्य सादृश्य की बात नहीं है। मनुष्य का इन्द्रिय बोध, उसकी भावनाएँ भी विजित होती हैं। साहित्य का यह पक्ष विशिष्ट रूप से प्रतिष्ठित होता है।
"साहित्य में विकास प्रक्रिया एक जैसी नहीं होती जैसे समाज में 'लेखक का काम स्पष्ट होता है।
उत्तर- लेखक का कहना है कि साहित्य में
विकास प्रक्रिया एक जैसी नहीं होती है। सामाजिक विकास-क्रम में एक तरह से श्रेष्ठ और अधिक वैज्ञानिक कहा जा सकता है। लेकिन साहित्य के विकास में इस तरह की बात नहीं है।" श्रेष्ठ है.
कवि अपने-अपने पूर्ववर्ती शास्त्रीय सिद्धांतों का पालन-पोषण करते हैं, लेकिन सैमुअल नहीं करके स्वयं नई परंपराओं को जन्म देते हैं। औद्योगिक उत्पादन और कलात्मक सौंदर्य ज्यों-का-त्यों नहीं बने रहते। अमेरिका ने एटम बम शे बनाया, रूस ने भी एक्सपियर के नाटक जैसी चीजों का उत्पादन इंग्लैंड में नहीं किया। मूलतः साहित्य और समाज के विकास-क्रम में कोई समानता नहीं हो सकती।
प्रतिमान का आकलन पीडीएफ बिहार बोर्ड कक्षा 10 प्रश्न 5.
लेखक ने मानव निजी आर्थिक को प्रभावित किया है, क्या उसकी स्वाधीनता दृष्टांतों द्वारा प्रमाणित है?
उत्तर-
लेखक के अनुसार आर्थिक सम्बन्धों से प्रभावित होना एक बात है, उनका निजी होना और बात होना। परिस्थिति और मनुष्य दोनों का संबंध द्वन्द्वात्मक है। यही कारण है कि साहित्य के सापेक्ष स्वाधीनता होती है। अमेरिका और एथेंस दोनों में गुलामी थी यूरोप से प्रभावित एथेंस की सभ्यता और गुलामों के अमेरिकी अनैतिक ने मानव संस्कृति को कुछ भी नहीं दिया। सामंतवाद विश्व भर में शामिल इस सामंती विश्व में महान कविता के दो ही केंद्र थे- भारत और ईरान के पूंजीवादी विकास यूरोप के देशों में रैफेल, लियोनार्डो दा विंची और माइकेल एंजेलो इटली की मांद हैं। इन दृष्टांतों के माध्यम से कहा गया है कि सामाजिक विचारधारा में कला का विकास संभव है। साथ ही यह भी देखा गया है कि समान सामाजिक परिस्थितियाँ होने पर भी कला का समान विकास नहीं होता है।
बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी पुस्तक समाधान प्रश्न 6.
साहित्य के निर्माण में प्रतिभा की भूमिका स्वीकार करते हुए लेखक किन चिन्हों से आगाह करता है?
उत्तर-
लेखक साहित्य के निर्माण में वैज्ञानिक अध्ययन की भूमिका अलग-अलग बताई गई है। लेकिन उन्होंने इस संबंध में सावधान किया है कि जो मनुष्य जो कुछ करता है उसके लिए सब अच्छा ही होता है, इसकी आवश्यकता नहीं है। उनकी श्रेष्ठ रचना में दोष नहीं हो सकता ऐसी कोई बात नहीं। इनमें से एक कृतित्व को दोषमुक्त मान लिया गया साहित्य के विकास में खतरनाक सिद्ध हो सकता है। मानव निर्मित मानव निर्मित नमूनों के बाद नया कुछ और स्मारक बनाने की सुविधाएँ बनी रहती हैं।
बिहार बोर्ड सॉल्यूशन क्लास 10 हिंदी प्रश्न 7.
राजनीतिक लोकप्रियता से होते साहित्य के मूल्य अधिक प्रतिष्ठित कैसे हैं?
उत्तर-
लेखक का कहना है कि साहित्य के मूल्य राजनीतिक पदों से अधिक प्रतिष्ठित हैं। इसकी पुष्टि में लैटिन कवि वर्जिल द्वारा लिखित अंग्रेजी कवि टेनिस में उस कविता की चर्चा की गई है जिसमें कहा गया है कि रोमन साम्राज्य का वैभव समाप्त हो गया। वर्जिल के काव्य सागर की ध्वनि तरंगें हमें आज भी बुक करती हैं और दिल को आनंद-विह्वल कर देती हैं। कह सकते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य के पतन के बाद जब उनका नाम लेने वाला नहीं रहेगा तब भी शेक्सपियर, मिल्टन और शेली विश्व संस्कृति के आकाश में पूर्व की भाँति जगमगाते दर्शन और उनके प्रकाश की झलकियाँ पहले की तरह नई दिखाई देंगी। इस प्रकार के राजनीतिक मूल्य कालांतर में नष्ट हो जाते हैं। पर साहित्य के मूल्य उत्तरोत्तर विकासोन्मुख रहते हैं।
बिहार बोर्ड हिंदी पुस्तक कक्षा 10 पीडीएफ डाउनलोड करें प्रश्न 8.
जातीय अस्मिता के लेखक किस प्रसंग का उल्लेख करते हैं और उनके महत्वपूर्ण क्या बताते हैं?
उत्तर-
साहित्य के विकास में नायक की भूमिका विशेष है। जन समुदाय जब एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था में प्रवेश करता है, तब उसकी अस्मिता नष्ट नहीं होती। मानव समाज बदल रहा है और अपनी पुरानी अस्मिता का घटक है जो मानव समुदाय को एक जाति के रूप में जोड़ता है, उनका इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर निर्मित यह अस्मिता का ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण है। जातीय अस्मिता शास्त्र के ज्ञान का वाहक है।
कक्षा 10वीं हिंदी बिहार बोर्ड प्रश्न 9.
जातीय और राष्ट्रीय अस्मिताओं के स्वरूप का अंतर बताते हुए लेखक दोनों में क्या सामंजस्यपूर्ण संबंध हैं?
उत्तर-
लेखक ने जातीय अस्मिता एवं राष्ट्रीय अस्मिता के स्वरूप का उल्लेख करते हुए दोनों में कुछ समानता की चर्चा की है। जिस समय राष्ट्र की सभी शारीरिक समस्याएं आती हैं, तब राष्ट्रीय अस्मिता का ज्ञान अच्छा हो जाता है। उस समय साहित्य परंपरा का ज्ञान भी राष्ट्रीय भाव जागृत करता है। जिस समय हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया था, उस समय यह राष्ट्रीय असम जनता की स्वतंत्रता संग्राम की समर्थक शक्ति बनी थी। इस युद्ध के दौरान रूसी जाति ने बार-बार अपनी साहित्य परंपरा का स्मरण किया। समाजवादी व्यवस्था होने पर जातीय अस्मिता खंडित नहीं होता वर्ण और पुष्टि होती है।
गोधूलि भाग 1 कक्षा 10 पीडीएफ बिहार बोर्ड प्रश्न 10.
बहु जातीय राष्ट्रों की संस्कृति से कोई भी देश भारत का मुकाबला क्यों नहीं कर सकता?
उत्तर-
दुनिया का कोई भी देश बहुराष्ट्रीय राष्ट्रों के आँकड़ों से, इतिहास पर ध्यान दे, तो भारत का मुकाबला नहीं कर सकता। यहां राष्ट्रीयता एक जाति द्वारा अलग-अलग प्रबलित पर राजनीतिक प्रभुत्व की स्थापना नहीं की गई है। वह मुख्यत: संस्कृति और इतिहास की मांद है। इस देश की तरह अन्यत्र साहित्य परंपरा का आकलन महत्वपूर्ण नहीं है। अन्य देशों की तुलना में इस राष्ट्र के सामाजिक विकास में विशिष्ट भूमिका है।
बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी प्रश्न 11.
भारत की बहुजातीयता मुख्यत: संस्कृति और इतिहास की मांद है। कैसे?
उत्तर-
भारतीय सामाजिक विकास में व्यास और वाल्मिकी जैसे तत्वों की विशेष भूमिका रही है। महाभारत और रामायण भारतीय साहित्य की एकता की स्थापना की गई है। इस देश के बर्तनों ने अनेक जाति की अस्मिता के साथ यहां की संस्कृति का निर्माण किया है। भारत में विभिन्न मसालों का मिश्रण-जुला इतिहास चल रहा है। अर्थात भारत के बर्तन द्वारा निर्मित संस्कृति बहुजातीयता स्थापित करती है। साथ ही इतिहास यह भी बताता है कि यहां कभी भी एक जाति विशेष पर प्रभुत्व स्थापित नहीं किया गया। यहाँ की संस्कृति ने एकता का पाठ पढ़ाया है। समरसता स्थापित करना सिखाया जाता है। यही भाव राष्ट्रीयता की जड़ को मजबूत करता है।
प्रश्न 12.
किस प्रकार समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है? इस प्रसंग में लेखकों के विचारों पर प्रकाश डाला गया।
उत्तर-
लेखक के अनुसार कॉकरोचवादी व्यवस्था में शक्ति का अपव्यय होता है। देश के संगीतकारों का सबसे अच्छा उपयोग समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है। समाजवादी व्यवस्था के घटक दल पर ज़ारशाही रूस नवीन राष्ट्र के रूप में पुनर्गठित हुआ। कई छोटे-बड़े राष्ट्रों की समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के बाद पहले की क्षमताएं अधिक शक्तिशाली हो गईं। समाजवादी व्यवस्था जिस राष्ट्र में शामिल है, वहां की प्रगति की चरमपंथी देश की ताकत तेज है। भारत की राष्ट्रीय क्षमता का पूर्ण विकास समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है। वास्तव में समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है।
प्रश्न 13.
निबंध का समापन लेखक का कैसा स्वप्न है? उसकी परम्परा को साकार करने में क्या भूमिका हो सकती है? विचार करें.
उत्तर-
लेखक भारत में अधिक से अधिक लोगों के साक्षर होने का सपना देखते हैं। जब हमारे देश की जनता साक्षर होगी, साहित्य पढ़ने का उसे अवकाश मिलेगा, सुविधा होगी तब रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों के करोड़ों नए पाठक होंगे। इस देश में बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक परिवर्तन-प्रतिक्रिया होगी। की सीमा भाषा में लोग नहीं बढ़ेंगे बल्कि एक भाषा-भाषा दूसरी भाषा-भाषा की रचना को भी अभिरुचि लेकर जायेंगे। यहाँ की विभिन्न समुद्रों में साहित्यिक जातियाँ सीमा लाँधकर सारे देश की असंबद्ध रचनाएँ लिखी हुई हैं। मानव संस्कृति की विशद धारा में भारतीय साहित्य की गौरवशाली परंपरा का अभिनव योगदान होगा। साहित्य की परंपरा के योगदान से एशिया की सागर के साहित्य का गहन परिचय होगा।
प्रश्न 14.
साहित्य सापेक्ष रूप में स्वतंत्रता होती है। इस मत को प्रमाणित करने के लिए लेखक ने कौन-से तर्क और प्रमाण प्रस्तुत किये हैं?
उत्तर-द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद मनुष्य के अवैयक्तिक आर्थिक सम्बन्धों से प्रभावित अमेरिका सापेक्ष स्वतन्त्रता को स्वीकार करता है। भौतिकवाद का अर्थ भाग्यवाद नहीं है। सब कुछ रसेल द्वारा अनिवार्य रूप से निर्धारित नहीं किया जाता है। मानव और डायनासोर का संबंध द्वंद्वात्मक है। यही कारण है कि साहित्य के सापेक्ष स्वाधीनता होती है। इसे प्रमाणित करने वाले लेखक ने कहा है कि दासी अमेरिका और एथेंस दोनों में भी दासी एथेंस की सभ्यता ने पूरे यूरोप को प्रभावित किया और दासों के अमेरिकी असंबद्ध ने मानव संस्कृति को कुछ भी नहीं दिया। यूरोप के देशों में क्रांतिकारी विकास रैफेल, लियोनार्डो दा विंची और माइकेल एंजेलो इटली के डेन में हुए।
अंततः यहां पर उपयोगिता की भूमिका का निर्धारण किया जा सकता है। जब हम विचार करते हैं तो तय करते हैं कि साहित्य के निर्माण में वैज्ञानिक तकनीक की भूमिका कहीं तक सीमित नहीं है। साहित्य के क्षेत्र में हमेशा कुछ न कुछ नया करने की गुंजाइश बनी रहती है। मूलतः साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीनता होती है।
15. वर्णन करें।
विभाजित बंगाल से विभाजित पंजाब की तुलना, तो ज्ञात हो जाएगा कि साहित्य की परंपरा का ज्ञान कहां ज्यादा है, कहां कम है और इस नवीन ज्ञान के सामाजिक परिणाम क्या होते हैं।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारे सिद्धांतों के 'परंपरा का आकलन' नामक पाठ से ली गई हैं। इन पक्तियों का संदर्भ इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा से लिया गया है।
लेखक का कहना है कि जब मानव समाज बदल रहा है और वह अपनी पुरानी अस्मिता का सदस्य है तो जो तत्व मानव समुदाय एक जाति के रूप में जुड़ता है, उसका इतिहास और संस्कृति अद्भुत योगदान है। इतिहास और संस्कृति परंपरा के आधार पर निर्मित यह अस्मिता का ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बंगाल का विभाजन हो गया, पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के लोगों को जबतक अपनी शास्त्रीय परंपरा का ज्ञान रहेगा तब तक बंगाल जाति सांस्कृतिक रूप से अविभाजित रहेगी।
विभाजित बंगाल से विभाजित पंजाब की तुलना, तो ज्ञात हो जाएगा कि साहित्य की परंपरा का ज्ञान कहां ज्यादा है, कहां कम है और इस नवीन ज्ञान के सामाजिक परिणाम क्या होते हैं।
दोस्ती का मूल काम यह है कि इतिहास और संस्कृति में किसी भी जाति को शामिल करना और प्रगतिशील बनना सहायक होता है। सांस्कृतिक परंपरा से जुड़कर ही अस्मिता की रक्षा की जा सकती है।
भाषा की बात
प्रश्न 1.
पाठ से दस्यु शब्द चुनें और उनके वाक्यों में प्रयोग करें।
उत्तर-
इसका = इसका अर्थ बड़ा है।
यह = यह सुन्दर है।
ये = ये मनुष्य महान हैं।
ऐसी = ऐसी कला श्रेष्ठ है।
बाकी = इसी मोहन खेलता है।
कुछ = कुछ पुस्तक लाओ।
देखें=व्यक्ति की पूजा होती है।
काफी = काफी निंदा की जाती है।
बुरा = बुरा मदन व्यक्तिपूजा का प्रचार करते हैं।
= इसमें अच्छी कविता का संग्रह है।
प्रश्न 2.
निम्नांकित साहित्य में विशेष का परिवर्तन
प्रश्न उत्तर-
दर्शन श्रृंगार = दर्शन सुधार
विचारधारा
= अभ्युदय शील वर्ग = अभ्युदय शील समाज
समाजवादी व्यवस्था = समाजवादी
लोक श्रमिक समुदाय = श्रमिक शिक्षक
प्रगतिशील आलोचना = प्रगतिशील लेखक
विशिष्ट भूमिका = अद्वितीय उदाहरण
राजनीतिक मूल्य = राजनीतिक ज्ञान
प्रश्न 3.
पाठ से संज्ञाओं के भेदों के चार-चार उदाहरण चुनें।
उत्तर-
जातिवाचक संज्ञा = मनुष्य, साहित्य, इन्द्रिय, भाषा।
व्यक्तिवाचक संज्ञा = शेक्सपियर, अमेरिका, रूस, इंग्लैंड
समूहवाचक संज्ञा = समाज, वर्ग, कारखाना, जनसमुदाय।
भाववाचक संज्ञा = भावनाएँ, स्वाधीनता, भावना, सर्वोच्चता।
द्रव्यवाचक संज्ञा = लकड़ी, चावल, पानी, दूध।
प्रश्न 4.
निम्नलिखित सर्वनामों के प्रकार बताए गए हैं उनके वाक्य में प्रयोग करें-
उत्तर-
im
गद्यांशों पर आधारित अर्थवर्ग-संबंधी प्रश्नोत्तरी
1. जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन करना चाहते हैं, जो रूढ़ियों के क्रांतिकारी साहित्य रचना नहीं चाहते हैं, जो रूढ़ीवादी क्रांतिकारी साहित्य रचना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परंपरा का ज्ञान सबसे अधिक आवश्यक है। जो लोग समाज में भोजन व्यवस्था करके वर्गहीन शोषणमुक्त समाज की रचना करना चाहते हैं; वे अपने सिद्धांतों को ऐतिहासिक भौतिकवाद के नाम से पुकारते हैं। जो इतिहास के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भौतिकवाद का है, जो आलोचना के लिए साहित्य की परंपरा का है। साहित्य की परंपरा के ज्ञान से ही प्रगतिशील आलोचना का विकास होता है।
प्रगतिशील आलोचना के ज्ञान से साहित्य की धारा को मोड़ा जा सकता है और नये प्रगतिशील साहित्य का निर्माण किया जा सकता है। प्रगतिशील आलोचना किन्हीं सैद्धांतिक सिद्धांतों का संकलन नहीं है, वह साहित्य की परंपरा का आदर्श ज्ञान है और यह ज्ञान की परंपरा ही विकासमान है।
प्रश्न
(क) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है? और इसके रचनाकार कौन हैं?
(ख) साहित्य-परंपरा का ज्ञान किनके लिए अत्यंत आवश्यक है? (छ) नवीन प्रगतिशील साहित्य का निर्माण कैसे किया जा सकता है?
(घ) प्रगतिशील आलोचना क्या है?
उत्तर-
(क) प्रस्तुत गद्यांश 'परंपरा का आकलन' शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक चौधरी शर्मा हैं।
(ख) जो लोग शास्त्रीय युग परिवर्तन करना चाहते हैं, रूढ़ियों को क्रांतिकारी साहित्य का सृजन करना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परंपरा का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है।
(जी) नवीन प्रगतिशील साहित्य का निर्माण आलोचना के माध्यम से किया जा सकता है। जिस तरह ऐतिहासिक भौतिकवाद के लिए इतिहास का महत्व है उसी तरह की आलोचना के लिए साहित्य की परंपरा है।
(घ)साहित्य की परंपरा के ज्ञान से ही प्रगतिशील आलोचना का विकास होता है।साहित्य की परंपरा के ज्ञान से ही प्रगतिशील आलोचना का विकास होता है।
प्रश्न 2.
साहित्य मनुष्य के संपूर्ण जीवन से सम्बंधित है। आर्थिक जीवन के अलावा मनुष्य एक प्राणी के रूप में भी अपना जीवन व्यतीत करता है। साहित्य में उनकी अति-आदिम भावनाएँ प्रतिफलित होती हैं जो उन्हें प्राणिमात्र से दर्शाती हैं। इस को बार-बार देखने में कोई नुक्सान नहीं है कि साहित्य सादृश्य की बात नहीं है। मनुष्य का इन्द्रिय-बोध, उसकी भावनाएँ भी निहित हैं। साहित्य का यह पक्ष विशिष्ट रूप से प्रतिष्ठित होता है।
प्रश्न-
(क) साहित्य का कौन सा पक्ष प्रतिष्ठित होता है?
(ख)साहित्य मनुष्य के संपूर्ण जीवन से जुड़ा है। कैसे?
(छ) साहित्य में कौन-कौन से भाव व्यंजित होते हैं?
(घ) साहित्य समसामयिक मात्रा ही नहीं है। इसे स्पष्ट करें।'
उत्तर-
(क) साहित्य समाज का दर्पण है। साहित्य के समसामयिक साम्यवाद जिसमें इन्द्रिय बोध, भावनाएँ आदि सन्निहित रहते हैं वह साहित्य का प्रतिष्ठित पक्ष होता है।
(ख) साहित्य का महल समाज की पृष्ठभूमि पर ही प्रतिष्ठित होता है। जिस काल में जिस प्रकार की सामाजिक परिस्थितियाँ थीं। उसी के सेट पर साहित्य का सृजन हुआ। प्रत्येक युग के उत्तम एवं श्रेष्ठ साहित्य ने अपने-अपने प्रगतिशील दृष्टिकोण-संस्कार एवं भावात्मक संवेदनाओं का स्वरूप प्रस्तुत किया है।
(जी) साहित्य में इन्द्रिय बोध एवं भावनाओं का स्वरूप व्यजित होता है।
(घ) साक्सिक ब्रेन और हृदय रसायन विज्ञानी है। जब भी वह भावों और विचारों को प्रकट करना चाहता है, तब उसकी अभिव्यक्ति साहित्य के रूप में होती है। युगान्तकारी जीवन पत्रिका को प्रतिष्ठित कर, सुन्दरतम समाज की रेखाचित्र प्रस्तुत करता है। इसमें रंगीन कलाकारी जीवंतता प्रदान करती है जिसमें चित्रकार का कार्य होता है।
3. साहित्य में विकास-प्रक्रिया समाज की तरह एक जैसी नहीं होती। सामाजिक विकास-क्रम में सामांती सभ्यताओं की साम्यवादी सभ्यताओं को अधिक प्रगतिशील कहा जा सकता है और सामांती सभ्यताओं के सामुदायिक साम्यवादियों को। पुराने चरखे और करघे के कारखाने के व्यवहार से श्रम की कार्यक्षमता बहुत बढ़ गई है।
यह आवश्यक नहीं है कि सामंती समाज के कवि की प्रतिभा पूंजीवादी समाज का कवि श्रेष्ठ हो। यह भी संभव है कि आधुनिक संस्कृति का विकास कविता के विकास का विरोधी हो और कवि स्वयं बिकाऊ माल बन रहा हो। व्यवहार में यही देखा जाता है कि 19वीं और 20वीं सदी के कवि-कवि भारत में क्या यूरोप में पुराने स्मारकों को खोते जा रहे हैं और जहां भी उनके आस-पास पहुंचते हैं तो उन्हें धन्यवाद देते हैं। ये जो कवि अपने पूर्ववर्ती वैयक्तिक परम्पराओं को मनन करते हैं, वे उनके साथी नहीं करते, उनकी शिक्षा देते हैं, और स्वयं नई परम्पराओं को जन्म देते हैं।
जो साहित्यिक पुस्तक की नकल करके लिखी जाए, वह अधम कोटि का होता है और सांस्कृतिक असंबद्धता का सूचक होता है। जो महान वैज्ञानिक हैं, उनकी कलाकृतियां नहीं हो सकतीं, यहां कला तक एक भाषा से दूसरी भाषा में व्याख्या करने के लिए उनकी कलात्मक सौंदर्य ज्यों-का-त्यों नहीं बनीं। औद्योगिक उत्पादन और ऑटोमोबाइल उत्पादन में यह बहुत बड़ा अंतर है। अमेरिका ने एटमबम बनाया, रूस ने भी बनाया, शेक्सपियर के नाटकों जैसी चीजों का उत्पादन इंग्लैंड में भी नहीं हुआ।
प्रश्न
(क) औद्योगिक उत्पादन और व्यावसायिक उत्पादन में क्या अंतर है?
(ख) किस प्रकार का साहित्य अधमकोटि की श्रेणी में रखा गया है?
(छ) अनुदित भाषा का सौन्दर्य घट क्यों जाता है?
(घ) लेखक आज के बर्तन को बिकाऊ क्यों कहते हैं?
उत्तर-
(क) औद्योगिक उत्पादन एवं व्यावसायिक उत्पादन दोनों एक-दूसरे से सौन्दर्यबोध में भिन्न हैं। औद्योगिक उत्पादन में सौन्दर्य की प्रधानता नहीं रहती है जबकि सौन्दर्य में सौन्दर्य उसका ही सब कुछ है। औद्योगिक उत्पादन अपनी उत्पादन क्षमता प्रकट करता है तो व्यावसायिक उत्पादन सौन्दर्य एवं विस्तार प्रकट करता है।
(ख) नकल का लिखा हुआ साहित्य अधम कोटि होता है। वह सांस्कृतिक असुरक्षा का सूचक होता है।
(छ) भाषा की लावण्यता ही उसका सौंदर्यबोध है। अनुदित भाषा में लावण्यता क्षीण होती है। बार-बार पढ़ने पर नो-न-कोई एक नया रूप में दिखाई देता है। उस साहित्य की लावण्यता अक्षुण्ण होती है। अनुदित भाषा में ये गुण नहीं दिखते हैं। यही कारण है कि अनुदित भाषा की सुंदरता घट जाती है।
(घ) पुराने चरखे और करघे की जीवंतता में उत्पादन क्षमता बढ़ी है। ठीक इसी प्रकार आज के कवि सामाजिक परिदृश्य के अनुसार अपने उपन्यास का सृजन नहीं करते हैं बल्कि पूंजीपतियों को आधार बनाते हैं या किसी रचना का अनुकरण करते हैं। इसी कारण लेखक आज के कारखाने को बिकाऊ निशान है।
4. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद मनुष्य की स्वायत्तता को आर्थिक रूप से प्रभावित करता है तथा उसकी सापेक्ष स्वतंत्रता को स्वीकार करता है। आर्थिक प्रभावशाली से प्रभावित होना एक है, उनकी निजी तौर पर रखी गई बात और बात है। भौतिकवाद का अर्थ भाग्यवाद नहीं है। सब कुछ रेनॉल्ड - अनिवार्य रूप से निर्धारित नहीं किया जाता है। यदि मानवीयता का मानक नहीं है तो परिस्थितियाँ भी मानवीयता की मान्यता नहीं है। दोनों का संबंध द्वन्द्वात्मक है। यही कारण है कि साहित्य सापेक्ष रूप से स्वाधीनता प्राप्त करता है।
प्रश्न
(क) पाठ और लेखक का नामोल्लाख करें।
(ख)द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में मनुष्य की क्या स्थिति है?
(छ) मनुष्य की निजी आर्थिक खरीद से क्या निर्धारित होता है?
(घ) मानव और रूमानियत का संबंध कैसा है? इसका प्रभाव साहित्य पर क्या है?
उत्तर-
(क) पाठ-परंपरा का आकलन। लेखक-रामविलास शर्मा।
(ख) द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद मनुष्य की स्वायत्तता को आर्थिक रूप से प्रभावित करने वाले उसकी सापेक्ष स्वतंत्रता को स्वीकार करता है।
(छ) मनुष्य की निजी तौर पर केवल आर्थिक खरीद से निर्धारित नहीं होता।
(घ) मानवजाति का मानक है, न परिस्थितियाँ मानव का। दोनों का संबंध द्वन्द्वात्मक है। इस कारण साहित्य सापेक्ष रूप से स्वाधीनता होती है।
5. साहित्य के निर्माण में वैज्ञानिक अध्ययन की भूमिका अलग है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह मनुष्य जो कुछ करता है, उसमें सब कुछ अच्छा ही होता है, या उसकी श्रेष्ठ कृतित्व में कोई दोष नहीं होता। कला का पूर्णतः असंगत होना भी एक दोष है। ऐसा कला निर्जीव है। ऐसे ही किसी भी सामान की अनोखी दुकान के बाद कुछ नया और उल्लेखनीय करने की सुविधा बनी रहती है। इस व्यक्ति पूजा की काफी निंदा की जाती है। बुरा जो लोग सबसे ज्यादा व्यक्ति पूजा की निंदा करते हैं, वे सबसे ज्यादा व्यक्ति पूजा का प्रचार भी करते हैं।
प्रश्न-
(क) साहित्य के निर्माण में कौन सी भूमिका महत्वपूर्ण है?
(ख) कैसी कला निर्जीव है?
(जी) साहित्य का मूल्य राजनीतिक पुस्तकालय की विशिष्टता अधिक स्थायी क्यों है?
(घ) व्यक्तिगत पूजा का प्रचार कौन लोग करते हैं?
उत्तर-
(क) साहित्य निर्माण में साहित्य निर्माण की भूमिका महत्वपूर्ण है।
(ख) जिस कला में कोई दोष नहीं होता वह निर्जीव होता है। दोषरहित कला में लावण्यता नहीं रहती है।
(जी) राजनीतिक मूल्य जीवन के सम-विषम परिदृश्य से प्रतीत नहीं होते हैं। इनकी आलोचना सकारात्मक नहीं है। वे एकता एक-दूसरे का विरोध करते हैं, जो कि दोस्ती एक-दूसरे का विरोध करते हैं। शास्त्री मूल्य जीवन से स्थापित हुआ रहता है। जीवन से इसका घनिष्ठ संबंध होता है। इसकी आलोचना न हो तो जीवन की सार्थकता ही खत्म हो गई। यही कारण है कि साहित्य का मूल्य राजनीतिक परिदृश्य से अधिक प्रतिष्ठित है।
(घ) व्यक्तिगत पूजा की निंदा करने वाले लोग ही व्यक्तिगत पूजा का अधिक प्रचार-प्रसार करते हैं। वर्तमान परिस्थिति में यदि कोई महान गिरावट आई तो वह और कुछ नहीं किसी महान व्यक्ति की आलोचना शुरू हो गई। उनका आलोचनात्मक रूप ही महानता की सीढ़ी साबित होगा।
6. यदि कोई वैज्ञानिक आलोचना से परे नहीं है, तो यह दावा और भी नहीं किया जा सकता है, इसलिए साहित्य के मूल्य, राजनीतिक विचारधारा की आवश्यकता अधिक स्थिर है। ब्रिटिश कवि टेनिसन ने लैटिन कवि वर्जिल पर एक बड़ी अच्छी कविता लिखी थी। उन्होंने कहा है कि वर्जिल के काव्य-सागर की ध्वनि-तरंगें पर रोमन साम्राज्य का वैभव समाप्त हो गया था, हमें आज भी मजा आता है और दिल को आनंद मिलता है। कह सकते हैं कि जब ब्रिटिश साम्राज्य का कोई नामलेवा और पानीदेवा न रह जाएगा, तब शेक्सपियर, मिल्टन और शेली विश्व संस्कृति के आकाश में वैसे ही जगमगाते नजर आएंगे जैसे पहले और उनकी रोशनी पहले की गहराई में नई दिखती थी।
प्रश्न
(क) पाठ और लेखक का नाम सूची।
(ख) राष्ट्रवादी आलोचना से परे होने का दावा क्यों नहीं कर सकते?
(छ) टेनिसन कौन थे? उन्होंने क्या लिखा है?
(घ) गद्यांश का कार्य।
उत्तर-
(क) पाठ-परंपरा का आकलन। लेखक-रामविलास शर्मा।
(ख) ऐतिहासिक आलोचना से परे होने का दावा नहीं किया जा सकता।
(जी) टेनिसन अंग्रेजी कवि थे। उन्होंने लिखा है कि रोमन साम्राज्य का वैभव लैटिन वर्जिल की कविता-सागर की ध्वनि की तरंगों पर समाप्त हो गया है, जो आज भी दुकानों पर हैं और आनंद प्रदान करते हैं।
(घ) राजनीति की गहरी साहित्य के मूल्य अधिक प्रतिष्ठित होते हैं। आज रोमन साम्राज्य नहीं है यूरोपियन लैटिन कवि वर्जिल की कविता आज भी लोगों को आनंदित करती है। इसी प्रकार, ब्रिटिश राज्य दुनिया से मिट गए डुआ शेक्सपियर और मिल्टन और शेली विश्व-संस्कृति, के आकाश में जगमगा रहे हैं।
7. संसार का कोई भी देश हो, बहुजातीय राष्ट्रों की शिक्षा से, इतिहास पर ध्यान दिया जा सके तो, भारत का मुकाबला नहीं किया जा सकता। यहां राष्ट्रीयता एक जाति द्वारा अलग-अलग प्रबलित पर राजनीतिक प्रभुत्व की स्थापना नहीं की गई है। वह मुख्यत: संस्कृति और इतिहास की मांद है। इस संस्कृति के निर्माण में इस देश का सर्वोच्च स्थान है। इस देश की संस्कृति से रामायण और महाभारत को अलग कर दिया जाए तो भारतीय साहित्य की आंतरिक एकता टूट जाएगी। किसी भी बहु जातीय राष्ट्र के सामाजिक विकास में ऐसी विशिष्ट भूमिका नहीं रही, जैसे इस देश में व्यास और वाल्मिकी की है। इसलिए किसी भी देश के लिए साहित्य की परंपरा का महत्व महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इस देश के लिए है।
प्रश्न
(क) पाठ और लेखक का नाम सूची।
(ख) दुनिया का कोई भी देश बहुजातीय राष्ट्रों के इतिहास से भारत का मुकाबला क्यों नहीं कर सकता?
(छ) भारत की संस्कृति के निर्माण में किसका योगदान है?
(घ) गद्यांश का कार्य।
उत्तर-
(क) पाठ-परम्परा का मल्यीकरण। लेखक-रामविलास शर्मा।
(ख) बहुजातीय राष्ट्रों की संस्कृति से दुनिया का कोई भी देश भारत का मुकाबला नहीं कर सकता क्योंकि इसकी राष्ट्रीयता किसी अन्य जाति पर राजनीतिक प्रमुखों द्वारा नहीं, इतिहास और सांस्कृतिक सामंजस्य पर स्थापित हुई है।
(छ) भारत की संस्कृति के निर्माण में यहां के पवित्र-संतों का महत्वपूर्ण योगदान है। भारतीय पुरातन साहित्य की आन्त्रिक एकता के आधार रामायण और महाभारत हैं। बहुजातीय राष्ट्रों के सामाजिक विकास में वाल्मिकी और वेद व्यास की विशिष्ट भूमिका है। इसलिए यहां की शास्त्रीय परंपरा का आकलन सबसे अधिक है।
(घ) दुनिया का कोई भी बहुजातीय देश भारत का मुकाबला नहीं कर सकता क्योंकि यहां राष्ट्रीयता का आधार राजनीतिक प्रभुत्व नहीं है। यहां की राष्ट्रीय एकता इतिहास और संस्कृति की मांद है। इसके निर्माण में रामायण और महाभारत का तथा तीन रचयिताओं का महत्वपूर्ण योगदान है। इसलिए, यहां की शास्त्रीय परंपरा का आकलन बहुत महत्वपूर्ण है।
8. और साहित्य की परंपरा का पूर्ण ज्ञान समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है। समाजवादी संस्कृति पुरानी संस्कृति से नाता नहीं तोड़ती, उन्होंने उससे आगे बढ़कर प्रश्न पूछा। अभी हमारे देश की निरक्षर, निर्धन जनता नए और पुराने साहित्य की महान पाठ्यपुस्तकों के ज्ञान से प्रचलित है। जब वह साक्षर होगी, साहित्य पढ़ने का उसे अवकाश होगा, सुविधा होगी, टैब व्यास और वाल्मिकी के लाखों नए पाठक होंगे। वे यहां मौजूद नहीं हैं, उन्हें संस्कृत में भी पढ़ें।
और टैब इस देश में बड़े तीन पैमाने पर सांस्कृतिक उद्गम-जागरण होगा कि सुब्रह्मण्यम भारती की कविताएं मूलभाषा में उत्तर भारत के लोग और रवींद्रनाथ की रचनाएं मूलभाषा में तमिलनाडु के लोग। यहाँ की विभिन्न सागरों में साहित्यिक जातियाँ सीमा लाँघकर सारे देश की सम्पत्तियाँ लिखी हुई हैं। जिस की भाषा बोलनेवाले अधिकांश निरक्षर हैं और अपने सिद्धांतों का बहुत-से-बहुत नाम सुनाते हैं, वे तो रचनाएँ पढ़ते हैं। और टैब अंग्रेजी भाषाप्रभुत्व समुद्र की भाषा वास्तव में ज्ञान-अर्जन की भाषा नहीं होगी। और हम केवल अंग्रेजी नहीं, यूरोप की अनेक समुद्रों के साहित्य का अध्ययन करेंगे, और एशिया की अनेक समुद्रों के साहित्य से हमारा परिचय गहरा होगा। तब मानव संस्कृति की विशद धारा में भारतीय साहित्य की गौरवशाली परंपरा का अभिनव योगदान होगा।
प्रश्न-
(क) समाजवादी संस्कृति का क्या उपयोग है?
(ख) साहित्य परंपरा का पूर्ण ज्ञान कहाँ संभव है?
(जी) लेखक आशान्वित क्यों है?
(घ) एशिया की समुद्र तट से हमारा गहरा रिश्ता कब होगा?
उत्तर-
(क) समाजवादी संस्कृति पुरानी संस्कृति से अपना नाता बनाकर नहीं तोड़ती है बल्कि उसे आगे बढ़ाती है।
(ख) साहित्य परंपरा का पूर्ण ज्ञान समाजवादी व्यवस्था में संभव है। '
(जी) लेखिका भलीभंती जानती हैं कि भारत के अधिकांश लोग निरक्षर हैं। महान रचनाकारों के नाम जानिए, उनकी रचनाएं नहीं पढ़ें। जिस दिन ये साक्षत्र हो जाएगा उस दिन ही ब्यास, कालिदास आदि जैसे रचनाकारों को नहीं बल्कि समृद्ध भारत की परिकल्पना करेंगे। किसी एक भाषा का प्रत्युत् सभी समुद्रों का नारा कर भारतीय साहित्य के गौरवशाली परम्परा का यथेष्ट सम्मान दिया जाएगा।
(घ) जब हम साक्षर देश के सभी देशों में साहित्य का प्रचार करेंगे, अंग्रेजी प्रभुत्व की भाषा न साथ में ज्ञान-अर्जन की भाषा होगी, यूरोप आदिम की समुद्र का अध्ययन करेंगे टैब एशिया की लहर से हमारा घनिष्ठ संबंध स्थापित होगा।
9. यदि समाजवादी व्यवस्था व्यवस्था होने पर शाही रूस नवीन राष्ट्र के रूप में पुनर्गठित हो सकती है, तो भारत में समाजवादी व्यवस्था व्यवस्था होने पर यहां की राष्ट्रीय अस्मिता पहले से निश्चित रूप से स्थापित होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है। वास्तव में समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है। कैपिटलिस्ट व्यवस्था में शक्ति का इतना उपयोग होता है कि उसका कोई खाता नहीं है। देश के संगीतकारों की सबसे अच्छी उपभोक्ता समाजवादी व्यवस्था ही संभव है। कई छोटे-छोटे राष्ट्र, जो भारत से सबसे अधिक पिछड़े हुए थे, समाजवादी व्यवस्था की व्यवस्था करने के बाद पहले की तरह जहां कहीं भी बड़े पैमाने पर शक्तिशाली हो गए हैं, और उनकी प्रगति की धारणाएं भी पूंजीवादी देश की ताकत हैं। भारत की राष्ट्रीय क्षमता का पूर्ण विकास समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है।
प्रश्न
(क) पाठ और लेखक का नाम सूची।
(ख) किस व्यवस्था में शक्ति का अपव्यय होता है?
(जी) देश के संगीतकारों का सबसे अच्छा उपभोक्ता किस व्यवस्था में संभव है?
(घ) भारत की राष्ट्रीय क्षमता का पूर्ण विकास किस व्यवस्था में संभव है?
(ङ) समाजवादी व्यवस्था से अनेक पिछड़े राष्ट्रों को क्या लाभ हुआ?
उत्तर-
(क) पाठ का नाम- परम्परा का आकलन।
लेखक का नाम-रामविलास शर्मा.
(ख)शाही व्यवस्था में शक्ति का अतिशय अपव्यय होता है।
(जी) देश के संगीतकारों का सबसे अच्छा उपभोक्ता समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है।
(घ) समाजवादी व्यवस्था में ही भारत की राष्ट्रीय क्षमता का पूर्ण विकास संभव है।
(ङ) समाजवादी व्यवस्था से अनेक छोटे-बड़े राष्ट्र शक्तिशाली हो गये। उनका पतन दूर हो गया और उनकी प्रगति का प्रमाण पत्र बदल गया।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
I. सही विकल्प चुनें-
प्रश्न 1.
रामविलास शर्मा निम्नांकित में क्या हैं?
(क)
(ख) कवि (ग) नाटककार (घ) साहित्यकार उत्तर- (क)
प्रश्न 2.
'परंपरा का आकलन' के लेखक कौन हैं?
(क) नलिन विलोचन शर्मा
(ख) अशोक सावंत
(जी) चौधरी शर्मा
(घ) भीमराव अंबेडकर
उत्तर-
(जी) चौधरी शर्मा
प्रश्न 3.
'परंपरा का आकलन' निबंध किस किताब से है?
(क) भाषा और समाज
(ख) परंपरा का आकलन
(जी) भारत की भाषा समस्या
(घ) प्रेमचंद और उन का युग
उत्तर-
(ख) परंपरा का आकलन
प्रश्न 6.
शेक्सपियर कौन थे?
(क) नाटककार
(ख) कहानीकार
(ग) उपन्यासकार
(घ) निबन्धकार
उत्तर-
(क) नाटककार
द्वितीय. रिक्त स्थान की सूची
प्रश्न 1.
साहित्य का मनुष्य के साथ ………… जीवन से संबंध है।
उत्तर-
सम्पूर्ण
प्रश्न 2.
गुलामों के…………..मालिकों ने मानव संस्कृति को कुछ नहीं दिया।
उत्तर-
अमेरिकी
प्रश्न 3.
कला का पूर्णतः ……. होना भी एक दोष है.
उत्तर-
असंगति
प्रश्न 4.
मानव-समाज बदल रहा है और अपनी पुरानी.................. कायम है।
उत्तर -
अस्मिता
प्रश्न 5.
टॉलस्टाय………..समाज के लोकप्रिय है।
उत्तर-
रूसी, वैज्ञानिक
प्रश्न 6.
…………हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है।
उत्तर-
समाजवाद
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
साहित्य में युग-परिवर्तन चाहनेवालों के लिए क्या जरूरी है?
उत्तर-
साहित्य में युग-परिवर्तन चाहनेवालों के लिए साहित्य की परंपरा का ज्ञान आवश्यक है
प्रश्न 2.
प्रगतिशील आलोचना का विकास कैसे होता है?
उत्तर-
साहित्य की परंपरा के ज्ञान से प्रगतिशील आलोचना का विकास होता है।
प्रश्न 3.
साहित्य का कौन सा पक्ष विशिष्ट होता है?
उत्तर
साहित्य जिसमें मनुष्य का इन्द्रिय-बोध, उसकी भावनाएँ प्रदर्शित होती हैं, वह पक्ष विशेष रूप से प्रतिष्ठित होता है।
प्रश्न 4.
मनुष्य और रूढ़िवादी का संबंध कैसा है?
उत्तर-
मनुष्य और फ्लोरिडा का संबंध द्वंद्वात्मक है।
प्रश्न 5.
शेली और बायरन की मांद क्या है?
उत्तर-
शेली और बायरन ने 19वीं सदी में स्वाधीनता के लिए लड़ाईवाले यूनानियों की एकता की पहचान करने में बहुत मेहनत की।
प्रश्न 6.
इतिहास का प्रवाह क्या होता है? ,
उत्तर-
इतिहास का प्रवाह विच्छिन्न होता है और अविच्छिन्न भी।
प्रश्न 7.
भारतीय संस्कृति के निर्माण में सर्वाधिक योगदान किसका है?
उत्तर-
भारतीय संस्कृति के निर्माण में भारत का सर्वाधिक योगदान है।
प्रश्न 8.
शर्मा की दृष्टि से देश के संगीतकारों का सबसे अच्छा उपयोग किस व्यवस्था में होता है?
उत्तर-
रिचर्ड शर्मा की दृष्टि से देश के संगीतकारों का सबसे अच्छा उपयोग समाजवादी व्यवस्था में ही हो सकता है।
परंपरा का आकलन लेखक का परिचय
हिन्दी आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर डॉ0 रिचर्ड शर्मा का जन्म उन्नाव (उ0प्र0) के छोटे से एक गाँव ऊँचेगाँव सानी में 10 अक्टूबर 1912 ई0 में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से 1932 ई0 में बी ए0 तथा 1934 ई0 में अंग्रेजी साहित्य में एम0 ए0 किया। एम0 ए0 करने के बाद 1938 ई0 तक शोध कार्य में लगे रहे। 1938 से 1943 ई0 तक उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में अध्यापन कार्य किया। उसके बाद वे आगरा के बलवंत राजपूत कॉलेज चले आये और 1971 ई0 तक यहाँ अध्यापन कार्य करते रहे। बाद में आगरा विश्वविद्यालय के पिता के पद पर वे के0 एम0 हिंदी संस्थान के निदेशक बने और 1974 ई0 में सेवानिवृत्त हो गये। 1949 से 1953 ई0 तक शहीद भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक भी रहे। उनका निधन 30 मई 2000 ई0 को दिल्ली में हुआ।
हिंदी गद्य को स्मारक का योगदान ऐतिहासिक है। तर्क और सबूत से भरी हुई साभार धारीदार भाषा जी के गद्य की सुविधा है। उन्हें विज्ञान भाषा विषयक पारंपरिक दृष्टि को मार्क्सवाद की वैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषित करने तथा हिन्दी आलोचना को वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करने का श्रेय प्राप्त है। देशभक्त और मार्क्सवादी निजी विचारधारा वाले जी का केंद्र-बिंदु है। उनकी कृति वाल्मिकी और कालिदास से लेकर मुक्तिबोध तक की विचारधारा का आकलन प्रगतिवादी आत्मज्ञान के आधार पर हुई है। उन्हें न केवल प्रगतिशील आलोचना द्वारा उत्पन्न हिंदी आलोचना की कला एवं साहित्य विषयक भारतीयों की सुरक्षा का श्रेय प्राप्त है, बल्कि स्वयं प्रगतिशील आलोचना द्वारा उत्पन्न अंतरविरोधों के सम्मान का गौरव भी प्राप्त है।
ऑर्थोडॉक्स जी ने हिंदी में जीवनी साहित्य का एक नया आयाम दिया। उन्हें 'निराला की साहित्य साधना' पुस्तक पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। उनके अन्य प्रमुख नामों के नाम हैं - 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिंदी समालोचना', 'भारतेंदु हरिश्चंद्र', 'प्रेमचंद और उनका युग', 'भाषा और समाज', 'महावीर प्रसाद परिवार और हिंदी नवजागरण', 'भारत भाषा की समस्या', 'नयी कविता और अद्वैतवाद', 'भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद', 'भारत की प्राचीन भाषा और हिंदी', 'विरामएक', 'भारी भाई' आदि।
पाठ के रूप में यहां पाठ्यपुस्तक जी का निबंध प्रस्तुत है - 'परंपरा का आकलन'। यह निबंध इसी नाम की पुस्तक से किंचित संपादन के साथ है। यह समाज, साहित्य और परंपरा का सार है। परंपरा के ज्ञान, समझ और आकलन का विवेक जागता यह निबंध साहित्य के सामाजिक विकास में क्रांतिकारी भूमिका को भी स्पष्ट करता है। नई पीढ़ी में यह निबंध परंपरा और आधुनिकता की युगानुकूल नई समझ विकसित करने में एक सार्थक हस्तक्षेप है।
परंपरा का आकलन सारांश हिंदी में
पाठ का सारांश
जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन करना चाहते हैं, जो रूढ़ियों के क्रांतिकारी साहित्य रचना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य परंपरा का ज्ञान सबसे अधिक आवश्यक है। जो लोग समाज में भोजन व्यवस्था करके वर्गहीन शोषणमुक्त समाज की रचना करना चाहते हैं; वे अपने सिद्धांतों को ऐतिहासिक भौतिकवाद के नाम से पुकारते हैं।
प्रगतिशील आलोचना किन्हीं सैद्धांतिक सिद्धांतों का संकलन नहीं है, वह साहित्य की परंपरा का आदर्श ज्ञान है। और यह ज्ञान कीर्ति ही विकासमान है।
साहित्य की परंपरा का आकलन सबसे पहले हमने उस साहित्य के मूल्य को स्थापित करने के लिए किया था, जो शोषक कलाकारों के खिलाफ जनता के हितों को प्रतिबिम्बित करता है।
साहित्य में मनुष्य की बहुत-सी आदिम भावनाएँ प्रतिफलित हैं जो उसे प्रतिमा से मिलती हैं। मनुष्य का इन्द्रिय-बोध, उसकी भावनाएँ भी निहित है। साहित्य का यह पक्ष विशिष्ट रूप से प्रतिष्ठित होता है।
साहित्य के निर्माण में वैज्ञानिक साज-सामान की भूमिका अलग-अलग है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह मनुष्य जो कुछ करता है, उसमें सब कुछ अच्छा ही होता है, या उसकी श्रेष्ठ कृतित्व में कोई दोष नहीं होता। कला का पूर्णतः असंगत होना भी एक दोष है। साहित्य का मूल्य, राजनीतिक पुस्तकों की विशिष्टता अधिक है। ब्रिटिश कवि टेनिसन ने लैटिन कवि वर्जिल पर एक अच्छी बड़ी कविता लिखी थी। उन्होंने इसमें कहा कि रोमन साम्राज्य का वैभव वर्जिल के काव्य सागर की ध्वनि-तरंगें पर समाप्त हो गया था, हमें आज भी संकेत मिले हैं और दिल को आनंद-विह्वल कर रहे हैं। कह सकते हैं कि जब ब्रिटिश साम्राज्य का कोई नामलेवा और पानी देने वाला न रह जाएगा, तब शेक्सपियर, मिल्टन और शैली विश्व संस्कृति के आकाश में वैसे ही जगमगाते नज़र आएँगे जैसे पहले, और उनके प्रकाश की धारियाँ नई दिखाई देंगी।
दुनिया का कोई भी देश हो, बहुराष्ट्रीय राष्ट्रों की पहचान हो, इतिहास पर ध्यान दिया जाए तो भारत का मुकाबला नहीं किया जा सकता। यहां राष्ट्रीयता एक जाति द्वारा अलग-अलग प्रबलित पर राजनीतिक प्रभुत्व की स्थापना नहीं की गई है। वह मुख्य है: संस्कृति और इतिहास की मांद। इस संस्कृति के निर्माण में इस देश का सर्वोच्च स्थान है। इस देश की संस्कृति से रामायण और महाभारत को अलग कर दिया जाए तो भारतीय साहित्य की आंतरिक एकता टूट जाएगी। किसी भी बहु जातीय राष्ट्र के सामाजिक विकास में ऐसी विशिष्ट भूमिका नहीं रही, जैसे इस देश में व्यास और वाल्मिकी की है।
समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है। कैपिटलिस्ट व्यवस्था में शक्ति का इतना उपयोग होता है कि उसका कोई खाता नहीं है। देश के संगीतकारों का सबसे अच्छा उपयोग समाजवादी व्यवस्था बनाने के बाद पहले की जगहों पर बड़े शक्तिशाली हो गए और उनकी प्रगति की स्थिति किसी भी पूंजीवादी देश की क्षमता तेज है। साहित्य की परंपरा का पूर्ण ज्ञान समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है। समाजवादी संस्कृति पुरानी संस्कृति से नाता नहीं तोड़ती, उन्होंने उससे आगे बढ़कर प्रश्न पूछा।
अभी हमारा निरक्षर निर्धन समूह नए और पुराने साहित्य के महान अध्ययन के ज्ञान से जुड़ा है। जब वह साक्षर होगी, साहित्य पढ़ने का उसे अवकाश होगा, सुविधा होगी, टैब व्यास और वाल्मिकी के लाखों नए पाठक होंगे। तब मानव संस्कृति की विशद धारा में भारतीय साहित्य की गौरवशाली परंपरा का अभिनव योगदान होगा।
शब्दार्थ
आलोचनात्मक आलोचना: जो सामाजिक विकास के महत्वपूर्ण पहलुओं की आलोचना करता है,
वह है भौतिकवाद:
जो मूर्ति न हो, जो दिखाई न दे, भावमय
विकासमान: विकास करता है
लक्षण: झलकता हुआ, छाया दिखलाई पड़े
अभ्युदयशील: अध्ययन हुआ, राष्ट्रवादी
ह्रासमान: नष्ट हुआ, छता हुआ, मरता हुआ
यथास्थान: वैज्ञानिक
आत्मा: अतिप्राचीन, सबसे पहला
व्यजित: प्रकट, ध्वनित, अभिव्यक्त
: जो पहले से पहले से विद्यमान निवासकर्ता, पूर्वज मान्यता: निर्मित और
नियमबद्ध करने वाला
द्वंद्वात्मक : जिसमें दो समानताएं शामिल हैं । विस्तृत पुनर्रचना : फिर से सुरक्षा उपाय : फि जूलखर्ची साक्ष्य : अपना हिस्सा बनाना, अपने में सम्मिलित कर लेना